Deoria news, साधु रत्न ब्रह्मचारी सत्यव्रत जी महाराज की जयंती पर विशेष
साधु रत्न ब्रह्मचारी सत्यव्रत जी महाराज की जयंती पर विशेष।
देवरिया।
अनंत आध्यात्मिक साधना और बाबा जी के संकल्पों से निर्मित सिद्ध योगी साधु रत्न ब्रह्मचारी परमहंस सत्यव्रत जी महाराज जिनकी आध्यात्मिकता में शाश्वत गति व जन कल्याण की भावना अंतर्निहित है बरहज आश्रम के तृतीय पीठाधीश्वर श्री सत्यव्रत जी महाराज देश में धार्मिक जगत के कार्यकर्ताओं के सिरमौर भारतीय संस्कृति के उपासक संरक्षक और संवर्धक, जीवन को कठिन तप में तपकर कठोर से कठोर परिस्थितियों में भी परम शुद्ध रामायण गीता श्रीमद् भागवत का अध्ययन चिंतन मनन गौ सेवा देववाणी संस्कृत का जन समुदाय में प्रचार यही थी उनकी दिनचर्या । हरे राम हरे कृष्ण के नाम की गूंज घर-घर में कर देने वाले श्री सत्यव्रत जी महाराज आज अपने धार्मिक सांस्कृतिक कार्यों नकी वजह से देश में जाने जाते हैं छोटा कद, श्याम वर्ण, एव काले बाल ,छोटी दाढ़ी ,घनी मूंछ, चमकती आंखें, चेहरे पर तेज, वाणी पर सरस्वती का वास सतत चिन्तन और मनन क्रोध और मुस्कुराहट का अपूर्व संगम कठोर समस्याओं और उलझन का पल में समाधान सुखी, दुखी, अमीर गरीब सबके साथ में पूर्ण व्यवहार उनकी शाश्वत विशेषताएं रही। घुटने तक कोपीन वाले बाबा पर जिनकी दृष्टि एक बार पड़ी और सौभाग्य बस उनके मुखारविंद से करुणा भरी बोली सुनने का अवसर प्राप्त हुआ वह बिना प्रभावित हुए नहीं रहा वे कट्टर सनातनी धर्म संसद के अनुयाई यज्ञ भजन कीर्तन पूजा पाठ सनातनी आचार्य व्यवहार के पोशाक थे । आपका जन्म बसंत पंचमी 1900 में बड़हलगंज गोरखपुर के बुढ़नपुरा गांव में हुआ था, उनके पिता का नाम पंडित जमुना प्रसाद पांडे जो स्वयं एक धर्मनिष्ट महात्मा थे सत्यव्रत जी के बचपन का नाम सत्यनारायण था वह तीन भाई थे सूर्य नारायण पांडे हरदत पांडे और सत्यनारायण पांडे सत्यनारायण पांडे का नाम आगे चलकर सत्यव्रत जी महाराज हो गया जो भक्ति आंदोलन को जगाने के लिए 1926 में सोहनाग धाम में रुद्र महायज्ञ, 1934 में बरहज में विष्णु महायज्ञ, 1939 में भारतीय रूपकला हरि नाम संकीर्तन, 1944 में बरहज में देव भाषा परिषद का अखिल भारतीय सम्मेलन ,1955 में भारतीय रामचरितमानस सम्मेलन का सफल आयोजन सत्यव्रत जी महाराज ने कराया तो बरहज भारतवर्ष के धार्मिक जगत में चर्चा का विषय बन गया 1950 में बरहज आश्रम में अभयद राघव मंदिर का निर्माण, उनके ही देखरेख में संपन्न हुआ 1935 से 1950 तक अखंड संकीर्तन आश्रम बरहज में चलता रहा ।8 अगस्त 1942 को प्रारंभ भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय सहभागिता के चलते देश में सबसे पहले भारत आश्रम और नेशनल हेराल्ड अखबार का कार्यालय जप्त कर लिया गया बरहज आश्रम की सभी संस्थाएं वर्षों तक बंद रही उस समय सत्यव्रत जी ने अपने भगीरथ प्रयास से फिर सभी शिक्षण संस्थाओं का संचालन कराया सत्यव्रत जी महाराज की भागीरथ यात्रा के क्रम में ग्रामे ग्रामे सभा कार्या, ग्रामे ग्रामे कथा शुभा। उनका कहना था कि गांव-गांव में कथाओं का आयोजन होना चाहिए धार्मिक सामाजिक , कार्य कार्यक्रमों के कारण आप पूर्वांचल की जनता के हृदय सम्राट बन गए थे यह वैष्णव संत 60 वर्ष का जीवन जीकर 1961 में महाप्रयाण को निकल गए।
ऐसे महान संत श्री सत्यव्रत जी महाराज की जयंती पर समस्त आश्रम परिवार महाराज श्री के चरणों में शत-शत नमन करता है ।



