सार्वजनिक कोयले की कॉर्पोरेट लूट : क्या संथाल परगना की आवाज सुनी जाएगी?

Corporate loot of public coal: Will the voice of Santhal Pargana be heard?

(आलेख : प्रतीक मिश्रा, अनुवाद : संजय पराते)

झारखंड के संथाल परगना के जंगली पठार में, एक बहुत बड़ा और हिंसक बदलाव हो रहा है। इस इलाके की पहाड़ियों और खेती की ज़मीन के नीचे, पूर्वी भारत के कुछ सबसे कीमती कोयला भंडार दबे हुए हैं। पिछले दो दशकों में, पाकुड़-दुमका इलाके में फैले राजमहल कोयला क्षेत्र में स्थित पचवारा कोयला बेल्ट के आस-पास के तीन ब्लॉकों को विकसित करके, इन भंडारों से कोयला निकालने का काम शुरू किया गया है। इन ब्लॉकों के नाम हैं.पचवारा नॉर्थ, पचवारा सेंट्रल और पचवारा साउथ। लेकिन यह कहानी है उस सार्वजनिक संपत्ति की, जिसे कॉर्पोरेट मुनाफ़े के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है ; और यह कहानी है उन आदिवासी समुदायों के दुख और उनके मज़बूत इरादों की, जो अपने अस्तित्व के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।कागज़ों पर, ये खदानें भारत सरकार द्वारा सरकारी बिजली कंपनियों को आबंटित की गई थीं, जिनका मकसद पश्चिम बंगाल, पंजाब और उत्तर प्रदेश के थर्मल पॉवर प्लांटों को कोयला सप्लाई करना था। लेकिन वास्तव में यह कोयला निजी अधोसंरचना वाली बड़ी कंपनियों के एक समूह द्वारा निकाला जाता है, जो ‘माइन डेवलपर्स एंड ऑपरेटर्स’ (एमडीओ) के रूप में काम करते हैं। यह एक ऐसा ठेका मॉडल है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के मालिकों की तरफ से निजी कंपनियाँ खनन के सभी काम करती हैं। इसका नतीजा एक ऐसी लालची खनन व्यवस्था के रूप में सामने आता है, जहाँ कोयले के सार्वजनिक भंडार निजी कंपनियों की दौलत बढ़ाते हैं, जबकि इसके सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान की भारी कीमत लगभग पूरी तरह से संथाल और पहाड़िया जनजातियों को ही चुकानी पड़ती है, जो इस ज़मीन को अपना घर मानते हैं।यहां उन सवालों के जवाब तलाश करने की जरूरत है, जो पचवारा से उठ रही है। यहाँ कथित तौर पर कौन-सी पुनर्वास नीति लागू होनी चाहिए? क्या उसे लागू किया जा रहा है? क्या विस्थापित लोगों तक नौकरी, ज़मीन और मुआवज़े जैसे ठोस लाभ वास्तव में पहुँचे हैं? और पर्यावरण तथा आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए बनी संस्थाओं को कार्रवाई करने के लिए कैसे बाध्य किया जा सकता है? यही वे सवाल हैं, जिन पर प्रतिरोध की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए।

भू-विज्ञान और निर्मम लूट

पचवारा कोयला ब्लॉक राजमहल स्थित भू-गर्भीय बेसिन के भीतर स्थित हैं. जो कोयला-युक्त एक प्रमुख संरचना है. और यहाँ के आँकड़े चौंकाने वाले हैं। पचवारा नॉर्थ (40 करोड़ टन), पचवारा सेंट्रल (38.2 करोड़ टन) और पचवारा साउथ (26.4 से 27.9 करोड़ टन) मिलकर एक विशाल खनन क्षेत्र बनाते हैं, जिसमें एक अरब टन से अधिक का भू-गर्भीय कोयला भंडार मौजूद है। इससे उत्तरी और पूर्वी भारत के बिजली संयंत्रों को दशकों तक ऊर्जा प्रदान करने के लिए कोयले की आपूर्ति की जा सकती है।इन कोयला ब्लॉकों का कानूनी सफ़र भारत के खनन क्षेत्र में हुई अव्यवस्थित विनियमन को दर्शाता है। वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में ये ब्लॉक सबसे पहले सरकारी बिजली कंपनियों को आबंटित किए गए थे, लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फ़ैसले ने इन आबंटनों में भारी उथल-पुथल मचा दी। इस फ़ैसले के तहत 200 से ज़्यादा कोयला ब्लॉकों का आबंटन रद्द कर दिया गया था। इसके बाद, ‘कोयला खदान (विशेष प्रावधान) अधिनियम 2015’ के तहत हुए पुनराबंटन में, ये ब्लॉक एक बार फिर उन्हीं सरकारी बिजली कंपनियों को सौंप दिए गए : पचवारा नॉर्थ डब्ल्यूबीपीडीसीएल (पश्चिम बंगाल) को, पचवारा सेंट्रल पीएसपीसीएल (पंजाब) को, और पचवारा साउथ एनयूपीपीएल को जो उत्तर प्रदेश और एनसीएल इंडिया लिमिटेड का एक संयुक्त उपक्रम है।भले ही कागज़ों पर मालिक सार्वजनिक ही रहे, लेकिन इसका प्रसंचालन मॉडल कुछ और ही कहानी कहता था। इनमें से कोई भी उपयोगिता संस्था खुद कोयला नहीं निकालती। इसके बजाय, उन्होंने ‘कोयला खनन समझौतों’ के ज़रिए इसकी बागडोर निजी कंपनियों के हाथों में सौंप दी है। इस व्यवस्था के तहत, काम शुरू होने से पहले की सभी गतिविधियाँ  जैसे ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और परमिट हासिल करना — इन आबंटियों द्वारा की जाती हैं ; जबकि ‘माइन डेवलपर्स एंड और ऑपरेटर्स’ खनन से जुड़ी अधोसंरचना का निर्माण और विकास करते हैं। साथ ही, वे खदान के पूरे जीवनकाल के दौरान कोयले की खुदाई और उसके परिवहन का काम भी संभालते हैं. और इन सभी सेवाओं के बदले उन्हें निकाले गए कोयले की प्रति टन मात्रा के आधार पर एक ‘खनन शुल्क’ मिलता है। संक्षेप में कहें तो, एमडीओ मॉडल निजी कंपनियों को खनन कार्यों के हर पहलू पर नियंत्रण रखने की अनुमति देता है. सिवाय इसके नियामक पहलू के।पचवारा नॉर्थ का संचालन एनसीसी-बीजीआर करता है, जो हैदराबाद स्थित एक कंसोर्टियम है। इसे 2016 में यह परियोजना सौंपी गई थी, जिसकी अनुमानित कीमत 30 वर्षों में लगभग 35,000 करोड़ रुपये है। इस ब्लॉक के लिए पुनर्वास और पुनर्स्थापन कॉलोनियों का निर्माण निजी ठेकेदारों द्वारा किया जा रहा है। पचवारा सेंट्रल का संचालन डीबीएल पचवारा कोल माइंस प्राइवेट लिमिटेड करता है, जो दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड (भोपाल) और वीपीआर माइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (हैदराबाद) का एक विशेष उद्यम है। पैनेम कोल (जो पीएसपीसीएल और ईएमटीए का एक संयुक्त उद्यम है) के साथ वर्षों तक चले कानूनी विवाद के बाद, आखिरकार पिछला अनुबंध रद्द हुआ है और 2022 के अंत में यहाँ खनन का काम पूरी गंभीरता से फिर से शुरू हुआ है। पचवारा साउथ का संचालन एमआईपीएल-जीसीएल इंफ्राकांट्रैक्ट प्राइवेट लिमिटेड करता है, जो अहमदाबाद स्थित एक संस्था है।यह भारतीय कोयले का नया चेहरा है : सार्वजनिक स्वामित्व, एमडीओ मॉडल के ज़रिए निजी खनन, और स्थानीय समुदायों द्वारा उठाया जाने वाला सार्वजनिक जोखिम। पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) ने हाल ही में गर्व से बताया है कि दिसंबर 2022 में पचवारा सेंट्रल के फिर से शुरू होने के बाद से, इस खदान ने 115 लाख टन कोयले की आपूर्ति की है, जिससे कोल इंडिया लिमिटेड से खरीदे गए कोयले की तुलना में अनुमानित 950 करोड़ रुपये की बचत हुई है। फिर भी, पैनेम की पिछली कारगुज़ारियों के कारण यह कहानी है — विस्थापित हुए परिवारों के लिए न चुकाई गई मज़दूरी की और किए गए वादों से मुकरने की।

खदान पर मानव : निशाने पर गाँव

पचवारा बेल्ट में खनन के विस्तार के लिए पाकुड़ और दुमका ज़िलों में बड़े पैमाने पर ज़मीन अधिग्रहण की ज़रूरत पड़ी है, जिसमें से ज़्यादातर ज़मीन आदिवासियों की है। हज़ारों एकड़ ज़मीन पहले ही अधिग्रहित की जा चुकी है, जिसके कारण कृषि भूमि और वन संसाधनों का नुकसान हुआ है और कई गाँव विस्थापित हो गए हैं।ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले, खनन परियोजनाएँ आमतौर पर प्रभावित गाँवों में सर्वेक्षण शुरू करती हैं। पचवारा क्षेत्र के ग्रामीणों ने बताया कि खनन कंपनियों और उनके ठेकेदारों से जुड़ी टीमों ने पूरे खनन क्षेत्र में ज़मीन के मालिकाना हक़, बस्तियों और बुनियादी ढाँचे का नक्शा तैयार किया। ये सर्वेक्षण खुले (ओपन-कास्ट) खदानों, खदान से निकले अतिरिक्त मलबे (ओवरबर्डन) को फेंकने की जगहों, पहुँच मार्गों और कोयला परिवहन गलियारों के लिए ज़रूरी ज़मीन की पहचान करने का आधार बनते हैं। बहरहाल, यहां के निवासियों ने बताया कि उन्हें इन गतिविधियों के उद्देश्य के बारे में साफ़ तौर पर जानकारी नहीं दी गई और ये सर्वेक्षण अक्सर ग्राम सभा के साथ किसी औपचारिक परामर्श से पहले ही कर लिए जाते थे ; जिससे आदिवासी क्षेत्रों में ज़मीन अधिग्रहण को नियंत्रित करने वाले कानूनी सुरक्षा उपायों के पालन और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

कानूनी सुरक्षा उपाय और ग्राम सभा की सहमति का प्रश्न

जिस तरह से सर्वेक्षण और ज़मीन की पहचान का काम आगे बढ़ा है, उससे आदिवासी क्षेत्रों पर लागू होने वाली विशेष सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण कानूनी सवाल खड़े होते हैं। संथाल परगना में ज़मीन का प्रबंधन सुरक्षात्मक काश्तकारी कानूनों के तहत होता है, जिनमें सबसे प्रमुख है संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 — यह अधिनियम आदिवासी ज़मीन का गैर-आदिवासियों को हस्तांतरण प्रतिबंधित करता है। इसके अतिरिक्त, पंचायतें (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) — पेसा अधिनियम, 1996 यह अनिवार्य करता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में ज़मीन अधिग्रहण या विकास परियोजनाएं शुरू करने से पहले ग्राम सभा से परामर्श किया जाए। इसके अलावा, वन अधिकार अधिनियम, 2006 यह आदेश देता है कि औद्योगिक उद्देश्यों के लिए, वन भूमि का किसी भी प्रकार से उपयोग बदलने से पहले, वनों में रहने वाले समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता दी जानी चाहिए।फिर भी, पचवारा खदानों से प्रभावित कई बस्तियों के ग्रामीणों ने बताया कि सर्वेक्षण और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाओं से पहले ग्राम सभा के साथ कोई सार्थक परामर्श नहीं किया गया था।

पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीति और उसका अधूरा क्रियान्वयन

पचवारा क्षेत्र में किसी भी तरह की राहत पाने के लिए एक अहम सवाल यह होना चाहिए : यहाँ कौन सी पुनर्वास और पुनर्स्थापन (आर एंड आर) नीति लागू है, और क्या उसे ठीक से लागू किया जा रहा है? कोयला खनन परियोजनाओं में पुनर्वास और पुनर्स्थापन को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढाँचा समय के साथ विकसित हुआ है। पैनेम के समय में, विस्थापन को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और ‘कोयला क्षेत्र (अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957’ के तहत नियंत्रित किया जाता था, जिसमें पुनर्वास और पुनर्स्थापन पैकेज हर परियोजना के हिसाब से अलग-अलग तय किए जाते थे। 2013 के ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम’ के बाद, एक ज़्यादा व्यापक ढाँचा लागू हुआ, जिसमें न सिर्फ़ ज़मीन के लिए मुआवज़ा देने की बात कही गई, बल्कि पुनर्वास के अधिकार — जैसे कि आवास, रोज़गार और सामुदायिक बुनियादी ढाँचा आदि — भी शामिल किए गए।लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। पचवारा सेंट्रल ब्लॉक में, पैनेम कोल के साथ काम करने वाले मज़दूरों को मझधार में ही छोड़ दिया गया है। मार्च 2015 में माइनिंग (खनन) रुकने के बाद, सैकड़ों मज़दूरों को नौ महीनों तक कोई वेतन नहीं मिला। जब वे दुमका के डिप्टी लेबर कमिश्नर के पास गए, तो उन्होंने अपनी बेबसी ज़ाहिर करते हुए कहा कि यह मामला केंद्रीय श्रम विभाग से जुड़ा है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें पटना में क्षेत्रीय श्रम आयुक्त के पास भेजा, लेकिन वहाँ जाकर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। ब्लॉक के पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) को दोबारा आबंटित होने के बाद, उनकी एक टीम अमरापारा गई और “कर्मचारियों तथा विस्थापित निवासियों को यह भरोसा दिलाया कि कोयला निकालने के लिए नई कंपनी के साथ समझौता होने के बाद उन्हें मिलने वाले लाभ फिर से शुरू कर दिए जाएँगे”। बहरहाल, विस्थापित लोगों के नज़रिए से यह समझौता अभी तक लागू नहीं हो पाया है।

बेदखली का गणित : मुआवज़ा और उससे जुड़ी असंतोष की भावनाएँ

पचवारा कोयला खदानों के लिए ज़मीन का अधिग्रहण कानूनी प्रक्रियाओं और परियोजना-विशेष पुनर्वास नीतियों की संगति से किया गया है। ज़्यादातर कोयला परियोजनाओं में, ज़मीन का अधिग्रहण ‘कोयला क्षेत्र (अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957’ के तहत, या फिर ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़े और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ के मुआवज़ा ढांचे के माध्यम से किया जाता है। मुआवज़े की गणना आमतौर पर ज़मीन के आधिकारिक रूप से अधिसूचित बाज़ार मूल्य के आधार पर की जाती है ; इस मूल्य को एक ‘ग्रामीण कारक’ से गुणा किया जाता है, और इसमें अतिरिक्त अनुग्रह राशि (‘सोलेशियम’) तथा पुनर्वास लाभों को भी जोड़ा जाता है।मैदानी रिपोर्ट से पता चलता है कि ज़मीन के वर्गीकरण और औपचारिक मालिकाना हक़ (टाइटल) की मौजूदगी के आधार पर असल भुगतान में काफ़ी फ़र्क होता है। जिन परिवारों के पास कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त पट्टे (ज़मीन के रिकॉर्ड) होते हैं, वे आम तौर पर मुआवज़े के हकदार होते हैं ; वहीं, जंगल में रहने वाले लोग और वे लोग, जिनके नाम पर ज़मीन के अधिकार औपचारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होते, उन्हें अक्सर अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। संथाल परगना में इस फ़र्क के नतीजे काफ़ी गंभीर होते हैं, क्योंकि वहाँ कई समुदाय ज़मीन के इस्तेमाल की उन पारंपरिक प्रणालियों पर निर्भर होते हैं, जो औपचारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होतीं।यह खामी जनजातीय आधार पर स्पष्ट रूप से बंटी हुई है। संथाल परिवारों के पास अक्सर औपचारिक पट्टों के साथ बड़ी ज़मीनें होती हैं। दूसरी ओर, पहरिया समुदाय की स्थिति कहीं अधिक अनिश्चित है। जिन वन-भूमियों पर वे निर्भर हैं, उन पर औपचारिक मालिकाना हक़ न होने और अक्सर ‘वन अधिकार अधिनियम 2006’ के तहत मालिकाना हक़ से वंचित रखे जाने के कारण, मुआवज़ा देने वाली व्यवस्था की नज़र में वे लगभग अदृश्य हो जाते हैं।

रोज़गार : एक केंद्रीय माँग, जिसे पूरा नहीं किया गया

कानूनी ढाँचा यह अनिवार्य करता है कि प्रत्येक विस्थापित परिवार के एक सदस्य को परियोजना में रोज़गार प्रदान किया जाए, बशर्ते वह पद के लिए उपयुक्त हो और रिक्तियाँ उपलब्ध हों। पचवारा क्षेत्र में इस प्रावधान का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया गया है।पैनेम के समय में, मज़दूरों को ठेकेदारों के ज़रिए काम पर रखा जाता था। नतीजन, जब खनन का काम बंद हुआ, तो उनके पास न तो नौकरी की सुरक्षा थी और न ही कोई बचाव। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद जिसमें पर्याप्त पुनर्वास और पुनर्स्थापन पैकेज का आश्वासन दिया गया था  मज़दूरों को नौ महीने तक बिना वेतन के रहने से नहीं बचाया जा सका। जब नए एमडीओ के ठेकेदारों ने काम संभाला, तो विस्थापित या पहले से कार्यरत मज़दूरों को अपने काम पर वापस नहीं लिया गया।पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की हालिया घोषणा में इस बात का जश्न मनाया गया है कि खदान ने “115 लाख टन कोयले की आपूर्ति” की है और “पीक रेटेड क्षमता” हासिल कर ली है। बचत और दक्षता के इस हिसाब-किताब में कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं है कि कितने स्थानीय आदिवासी युवाओं को रोज़गार मिला है, कितने परियोजना-प्रभावित परिवारों (पीएएफ) को नौकरियाँ मिली हैं, या खदानों में काम करने वालों के लिए रोज़गार की शर्तें क्या हैं। एमडीओ मॉडल निजी ठेकेदारों को फ़ायदा पहुँचाता है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की उपयोगिता संस्थाओं को पुनर्वास की ज़िम्मेदारी से मुक्त रखता है।

पुनर्वास और सुधार के वादों के साथ छल

जो लोग पहले ही विस्थापित हो चुके हैं, उनका हश्र उन लोगों के लिए एक चेतावनी है, जो अभी भी खदानों के क्षेत्र में रहते हैं। पुराने गाँव से बेदखल किए गए परिवारों के लिए बनाई गई पुनर्वास बस्ती, ‘न्यू कथलडीह’ का दौरा करने पर पुनर्वास के खोखले वादे की सच्चाई सामने आ गई। ग्रामीणों ने बताया कि उनके लिए बनाए गए घर बहुत ही घटिया ढंग से बनाए गए हैं और अभी से ही ढहने लगे हैं। कंपनी की ओर से इन घरों की मरम्मत या रख-रखाव का काम तो बस मुट्ठी भर घरों में ही किया गया है।कॉलोनी में गहरे अविश्वास का माहौल छाया हुआ है। कुछ निवासियों ने अपने नए प्लॉटों के लिए स्थायी मालिकाना हक स्वीकार करने से इनकार कर दिया है ; वे इस धुंधली उम्मीद से चिपके हुए हैं कि खनन बंद होने के बाद शायद एक दिन वे अपनी मूल ज़मीन पर लौट पाएँगे। बहरहाल, यह उम्मीद अब व्यवस्थित रूप से सचमुच में दफ़नाई जा रही है। कोयला मंत्रालय ने खदान बंद करने के लिए एक ढाँचा तैयार किया है, जिसके तहत यह ज़रूरी है कि “सुरक्षा, ज़मीन की बहाली और पुनर्वास के प्रयास” स्वीकृत खनन योजनाओं के अनुसार पूरे किए जाएँ। लेकिन पचवारा में, गाँव वालों का कहना है कि ओवरबर्डन के ढेर कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं। जिस ज़मीन को खेती या रहने के लिए वापस दिया जाना था, उसका इस्तेमाल इसके बजाय लगातार कचरा फेंकने के लिए किया जा रहा है।

प्रदूषण और नियामक शून्यता

खुली खदानों से खनन के पर्यावरणीय परिणाम बहुत गंभीर हैं और उनके बारे में काफ़ी जानकारी उपलब्ध है। लगातार विस्फोट, ड्रिलिंग और खुदाई के ज़रिए ज़मीन के ऊपर की मिट्टी और चट्टानों की भारी परतें हटाई जाती हैं, जिससे हवा में भारी मात्रा में धूल और महीन कण फैल जाते हैं। खनन क्षेत्र के पास बसे गाँवों के लोगों का कहना है कि धूल खेती की ज़मीन, पेड़ों और पानी के स्रोतों पर जम जाती है, जिससे समय के साथ फ़सलों की पैदावार और मिट्टी की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता है। कई बस्तियों के किसानों ने बताया कि उनके खेतों पर कोयले की धूल और खनन के मलबे के लगातार जमने के कारण उनकी फ़सलों की पैदावार में गिरावट आई है। हवा में मौजूद इन महीन कणों के संपर्क में आने से स्थानीय निवासियों में साँस की तकलीफ़ें, आँखों में जलन और त्वचा संबंधी बीमारियाँ भी बढ़ी हैं।खनन के गड्ढों के अलावा, प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत खदानों से कोयले को रेलवे लोडिंग पॉइंट्स तक पहुँचाना है। इस रास्ते पर रहने वाले लोगों का कहना है कि कोयले से भरे खुले ट्रक जब इस इलाके से गुज़रते हैं, तो हवा में बारीक धूल छोड़ते हैं। कोयले की धूल की परतें रोज़ाना घरों, फसलों और पानी के स्रोतों पर जम जाती हैं। किसानों की शिकायत है कि इस प्रदूषण से उनकी फ़सलों को नुकसान पहुँचता है और उनके पशुओं की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है। भारी डंपरों की लगातार आवाजाही से स्थानीय सड़कें भी बुरी तरह खराब हो गई हैं, जिन्हें असल में हल्के ग्रामीण यातायात के लिए बनाया गया था।फिर भी, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) के हस्तक्षेप के बहुत कम प्रमाण मिलते हैं। ग्रामीणों द्वारा दर्ज की गई शिकायतें मानो प्रशासनिक शून्यता में कहीं गुम हो जाती हैं। समुदायों की सुरक्षा के लिए गठित नियामक संस्थाओं पर या तो कब्ज़ा कर लिया गया है, या फिर उन्हें पूरी तरह से अप्रासंगिक बना दिया गया है।

राहत के लिए मांगों का सूत्रीकरण

पचवारा क्षेत्र में राहत दिलाने की कोशिश कर रहे संगठनों के लिए, यह रिपोर्टिंग स्पष्ट रूप से कुछ मांगों को सामने लाती हैं। सबसे पहली और ज़रूरी मांग है पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीति का पूरी तरह से लागू होना, जिसमें पैनम के समय में विस्थापित हुए लोगों पर भी इसे पिछली तारीख से लागू करना शामिल है। दूसरी मांग है प्रभावित लोगों को कानून के अनुसार रोज़गार देना  अस्थिर ठेका व्यवस्थाओं के ज़रिए नहीं, बल्कि अधिकारों और सुरक्षा के साथ स्थायी कर्मचारियों के तौर पर। तीसरी मांग है वन अधिकार अधिनियम के तहत पहरिया और वन पर निर्भर रहने वाले अन्य समुदायों के लिए ज़मीन के मालिकाना हकों को नियमित करना। चौथी मांग है खदानों के सुधार के लिए एक व्यापक योजना, जो ज़मीन को खेती और रहने लायक स्थिति में वापस लाए। पांचवीं मांग है एनजीटी और एसपीसीबी के ज़रिए प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण लागू करना, जिसमें मापने योग्य मानक और समुदाय की निगरानी शामिल हो। छठी मांग है भविष्य में ज़मीन के किसी भी अधिग्रहण और खनन के विस्तार के लिए ग्राम सभा की सहमति लेना, जो पेसा और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम के अनुरूप हो।

निष्कर्ष

पचवारा की लड़ाई असल में संथाल परगना के भविष्य की ही लड़ाई है। संथाल परगना के आदिवासी समुदायों के लिए, पचवारा को लेकर चल रहा यह संघर्ष महज़ किसी खनिज के बारे में नहीं है। यह ज़मीन, आजीविका, गरिमा और अपने अस्तित्व के अधिकार से जुड़ा मामला है। जैसे-जैसे खुदाई करने वाली मशीनें ज़मीन में और गहराई तक उतर रही हैं और कोयले से लदे ट्रक आगे बढ़ते जा रहे हैं, इस सवाल की प्रासंगिकता भी बढ़ती जा रही है : क्या उनकी ज़मीन हमेशा के लिए छिन जाने से पहले, उनकी आवाज़ सुनी जाएगी?

[लेखक झारखंड के वामपंथी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता हैं,  अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं,

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