बर्बरता को धर्म का चोगा ओढ़ाने का ट्रंपियापा

The Trumpian way of dressing up barbarism in the garb of religion

(आलेख : बादल सरोज)

डोनाल्ड ट्रम्प संभवतः ऐसे अकेले राष्ट्र प्रमुख है, जिनके लिए कार्टून्स या आज की प्रचलित मजाहिया मीम्स बनाने के लिए कल्पनाशीलता या कुछ रचने की जरूरत नहीं पड़ती। इतने जबर नज़ारे और नारे उछालते हैं कि हमारे वाले पर कमतरी का अहसास तारी हो जाता है। दिन में कम-से-कम एक, आजकल औसतन आधा दर्जन ऐसे कारनामे दिखा रहे हैं कि बड़े से बड़े कार्टूनिस्ट को उनसे रश्क होने लगा है। भारत छोड़ दुनिया का मीडिया इनसे भरा हुआ है और मुश्किल दौर में भी बिना किसी अतिरिक्त खर्च के मनोरंजन उपलब्ध करा रहा है।

 

हाल में कुछ ख़ास ईसाई पादरियों को बुलाकर राष्ट्रपति भवन में ट्रम्प ने एक विशेष प्रार्थना कराई। ईरान पर इजरायल के साथ मिलकर किए गए हमले का पहला सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ था कि अपनी और अपने सैनिकों की सुरक्षा, मध्य-पूर्व में फैले तनाव में ईश्वर कृपा और ज्ञान इत्यादि-इत्यादि प्राप्त करने के लिए संपन्न कराई गयी इस प्रार्थना मे पादरियों ने ट्रम्प के कंधों पर हाथ रखकर “लेइंग ऑन ऑफ हैंड्स” नामक ईसाई रीति से प्रार्थना की। ईसाई धर्म की प्रार्थनाओ में यह चंगाई – किसी बीमार व्यक्ति को चंगा करने – वाली प्रार्थना होती है : कुछ-कुछ उसी तरह की जैसी किसी व्यक्ति की लाइलाज बीमारी को ठीक करने, उस पर चढ़े भूत-प्रेत को उतारने के लिए ओझा और गुनिया करते है। पवित्र जल – होली वाटर – में डुबकी भर नहीं लगवाई, बाकी शैतान का बप्तिस्मा करने के जितने भी धतकरम थे, वे किये गये। ईस्टर के दिन तो हद ही कर दी, जब व्यंजना में, फिर अमिधा में खुद की तुलना ईसा मसीह से ही कर दी। इन सब कर्मकांडो की पुरोहिताई उन इवेंजेलिकल पादरियों ने की, जिन्हें ईसाई मान्यताओं के हिसाब से मोटा-मोटी राजनीतिक पादरी माना जाता हैं और जो दुनिया के कई हिस्सों में, जैसे अमेरिका और ब्राजील में, ये पादरी सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सियानपट्टी दिखाते रहते हैं।

 

युद्ध के बीचों बीच लाइव किये गए इस ट्रम्पियापे का मकसद न धार्मिक था, न आध्यात्मिक था। ट्रम्प कितना धार्मिक, सात्विक और पक्का ईसाई है, इस बात का प्रमाण मासूम स्कूली बच्चियों की जघन्य हत्याओं से और नरसंहारी इजरायल के हर अपकर्म को संरक्षण देकर वह दिखा चुका था। यह पूरी तरह से सार्वजनिक दिखावे के लिए किया गया पाखंड था : उस पटकथा का हिस्सा था, जिसे अमरीकी साम्राज्यवाद के मौजूदा नेतृत्व ने अपने फौरी और दूरगामी दोनों मकसदों के लिए तैयार किया है। धर्म की आड़ लेकर उस के बहाने अपनी दुष्ट कार्यवाहियों को सही ठहराना, अपने किये को पादरियों के लबादे से ढांपना और अन्तत: पश्चिमी प्रभुत्व वाली उस दुनिया को पुनर्स्थापित करना, जिसका खाका 13 फरवरी को म्यूनिख में हुयी बैठक में ट्रम्प का विदेश मंत्री मार्को रुबियो साफ़-साफ़ शब्दों में रख चुका है। जनता की निर्मम लूट को पुण्य और धर्मसम्मत बताने के लिए जो काम पाकिस्तान सहित कई देशों में काफी पहले से किया जाता रहा है, जिसे हाल के वर्षों में भारत के हुक्मरान पूरी लगन के साथ कर रहे हैं : दुनिया के रंगमंच पर वही धूर्तता इस पाखंड में दिखाई जा रही थी।

 

यह पहली बार था, जब ट्रम्प को सार्वजनिक रूप से व्हाइट हाउस के कार्यालय में इस तरह प्रार्थना सभा करते देखा गया। मगर यह सिर्फ उनकी प्रार्थना तक सीमित नहीं था। ईरान पर हमले के बाद से ही इस सरासर अवैधानिक युद्ध को धर्मयुद्ध – क्रूसेड – बताने और उसके साथ सभी ईसाई धर्मानुयायियों को भरमाने की की मुहिम भी युद्धस्तर पर छेड़ दी गयी। इसका मकसद जहां, जैसा कि रुबियो ने साफ़-साफ़ कहा, बाकी ईसाईबहुल साम्राज्यवादी देशों को भविष्य में फिर से दुनिया को लूटने का सपना दिखाकर साथ लाने का था, वहीँ खुद अपने देश अमरीका में तेजी पकड़ते युद्ध विरोधी वातावरण को चर्च की घंटा-ध्वनि में डुबोने का भी था। अनेक ईसाई और जो यहूदीवादी नहीं है, वे यहूदी भी, इस युद्ध की मुखालफत कर रहे हैं, उनसे भी निबटना था। इसके लिए अमरीका में काम करने वाले ज्यादातर चर्चों और उनके पादरियों को मोर्चे पर लगाया गया। शुरुआत ईसाई यहूदीवादी पंथ से कराई। इवेंजेलिकल ईसाई इनमें से एक है, जो इजरायल का दृढ़ समर्थन करते हैं, बाइबिल का अपने तरीके से पाठ कर इजरायल की सुरक्षा को आध्यात्मिक काम मानते हैं। ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट में लिखी बातों को नोस्त्रादमस की भविष्यवाणियों की किताब की तरह पढ़ते है और उसकी ट्रम्पानुकूल व्याख्या करते है। कुछ अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने भी इस संघर्ष को भगवान की योजना का हिस्सा बताया और बाइबिल की भाषा में इसे वह ‘आर्मागेडन’ — अंतिम युद्ध – बताया, जिसके बाद यीशु मसीह की वापसी होगी। कुछ सीनेटर और राजनेता भी राजनीति के धंधे में धर्म की करेंसी चलाने के लिए इसे 2000 वर्ष से जारी ‘बुराई के खिलाफ धर्मयुद्ध’ बताने तक आ गए। उधर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी इस आपराधिक युद्ध को धर्म का बाना पहनाने में पूरी ताकत से भिड़े थे। वह भी बार-बार धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल कर जिन पर हमला किया जा रहा है, उन्हें अमालेक — प्राचीन काल में यहूदियों के दुश्मन, जिन्हें पूरी तरह से नष्ट करने का आदेश दिया गया था – बताता रहा।

 

इसके लिए आमतौर से मुसलमानों – किन्तु चूंकि फिलहाल इस जंग में खाड़ी के देशो का साथ अपरिहार्य है इसलिए – और ख़ासतौर से ईरान को, कल्पित कहानियां सुनाकर, लांछित करने का अभियान-सा छेड़ दिया। ईरान की मौजूदा हुकूमत धर्म-आधारित शासन प्रणाली है, इसमें कोई शक नहीं है। हालांकि उसे सत्ता में लाने वाला भी कोई और नहीं, यही अमरीका है, जिसने पचास और साठ के दशक में सीआईए के जरिये ईरान की तब की प्रगतिशील, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और साम्राज्यवादी पूँजी का राष्ट्रीकरण करने वाली मौसाद की सरकार का तख्ता पलट करवाया था और अपने पिट्ठू रजा शाह पहलवी की ईरान के शाह के रूप में ताजपोशी की थी। अभी भी वे उसी के अमरीका में शरण लिए बेटे को गद्दी पर बिठाना चाहता है। यही शाह था, जिसने अपनी निर्मम तानाशाही के जरिये न सिर्फ ईरान की मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी सहित सभी उदार और प्रगतिशील ताकतों को कुचल दिया, बल्कि ईरान के तेल और संपदा पर अमरीकी कंपनियों का वर्चस्व फिर से कायम करवा दिया। इस सबके नतीजे में पैदा हुए शून्य को 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति ने भरा। यह अघट सिर्फ ईरान के साथ ही नहीं घटा, जहां-जहां अमरीका और साम्राज्यवाद ने तख्ता पलट कर पिट्ठू तानाशाहियों की स्थापना की, वहां-वहां कट्टरपंथी शक्तियां ही हुकूमतों में आयीं। ईराक से लेकर अफगानिस्तान, लीबिया से सीरिया तक ऐसे उदाहरण अनेक हैं। दुनिया के सबसे बुरे, दुष्ट और नरसंहारी इजरायल को अपनी गोद में बिठाकर अब ठीक इसी तरह की अतिरंजित छवि ईरान की बनाई जा रही है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक पत्रकार की ईरान की आँखों देखी रिपोर्ट छपी है, इसमें वे लिखते हैं : “नवम्बर के अपने दौरे में मैंने देखा कि कई महिलाएं हिजाब नहीं पहनती थीं। भारत के कुछ हिस्सों की तुलना में ईरान के शहरों के अधिकांश हिस्सों में धार्मिकता कम स्पष्ट दिखाई देती थी। नाइटलाइफ़ बिल्कुल भी खत्म नहीं हुई थी, बल्कि बहुत अच्छी थी। ईरान की जनता द्वारा इज़राइल और अमेरिका को नफरत वाले देशों के रूप में नहीं देखा जाता था।“ उसने आगे लिखा कि “भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने हमें बताया कि ईरान शायद आज भारत की तुलना में कम धार्मिक है। उनमें से एक ने कहा कि तेहरान की एक तिहाई मस्जिदें बंद हो गई हैं, क्योंकि कोई उनमें जाता ही नहीं है। यह बात पूरे ईरान की मस्जिदों के लिए सच है। जो लोग जाते हैं, ज्यादातर वे लोग हैं, जिन्हें सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है, और यह सहाय्रता धार्मिक संस्थाओं के माध्यम से वितरित की जाती है। यह अनुदान की शर्तों में से एक है।“

 

इस सबके बावजूद इस नाजायज युद्ध को धर्मयुद्ध – क्रूसेड – साबित करने की कोशिश अमरीकी साम्राज्यवाद की नई चाल भर नहीं है। यह अदा वह पहले भी आजमाता रहा है। अभी हाल ही की बात है, जब 9/11 के बाद, तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने “आतंकवाद के खिलाफ युद्ध” को “क्रूसेड” कहा था। दुनिया भर में हुई तीखी प्रतिक्रिया के बाद इस शब्द का उपयोग तो कम कर दिया गया, मगर व्यवहार में ‘इस्लामोफोबिया’ को ही हवा दी जाती रही। इस बार बात आगे की है। दुनिया के कई गैर-मार्क्सवादी राजनीतिक पर्यवेक्षक भी अब मानने लगे हैं कि यह सारी कवायद पूरी दुनिया को पिछली सदी के पूर्वार्ध की औपनिवेशिक गुलाम दुनिया में बदलने – वह भी अतिशीघ्र बदलने – की है। इसके लिए सैमुअल हटिंगटन के ‘’सभ्यताओं के टकराव” के सिद्धांत को अमल में – वह भी जल्दी से जल्दी – लाने की है। जैसा कि पहले भी जिक्र किया जा चुका है कि सोवियत संघ के पतन और समाजवाद को लगे धक्के के बाद की दुनिया को अपने हिसाब से पुनर्गठित करने के लिए 1996 में एक अमरीकी ‘विचारक’ हंटिंगटन का दावा था कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, अब दुनिया में संघर्ष का मुख्य आधार सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान होगी। उसका मानना था कि भविष्य के युद्ध देशों के बीच नहीं, बल्कि अलग-अलग सभ्यताओं के बीच होंगे। वियतनाम युद्ध के समय अमरीकी सलाहकार रहे इस व्यक्ति ने अपने इस ‘सिद्धांत’ का आधार इस धारणा को बनाया था कि पश्चिमी सभ्यता सबसे विकसित और आदर्श है, बाकी इससे कमतर हैं, इसलिए उन्हें अंततः खत्म होना होगा और पश्चिम के अधीन रहकर उसकी तरह सभ्य बनना होगा। हटिंगटन ने पश्चिम का टकराव जिन 7 ‘सभ्यताओं’ से बताया था, उसने उनमें इस्लामिक, चीनी, हिन्दू , ऑर्थोडॉक्स रूसी, जापानी, लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी सभ्यताओं को शामिल किया था। उसने फिलवक्त इस्लाम को निशाने पर लेने की बात कही है। उसका मानना था कि इस्लाम और पश्चिम मतलब ईसाई सभ्यता के बीच गहरे सांस्कृतिक अंतर हैं, जो भविष्य में संघर्षों का कारण बनेंगे। ईरान, एक इस्लामी गणराज्य के रूप में, अक्सर पश्चिम और उसके सहयोगियों जैसे इज़राइल के साथ सीधे टकराव में रहता है। हंटिंगटन ने कहा था कि “इस्लाम की सीमाएं खूनी हैं।“ इन संदर्भों के साथ जोड़कर ट्रम्प का पूजापाठ पाखंड, मार्को रुबियो द्वारा प्रस्तुत खाका और नेतन्याहू द्वारा किया जा रहा नरसंहार देखने से स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। भारत सहित दुनिया के सभी गैर साम्राज्यवादी देशों और साम्राज्यवादी देशों की जनता को पूरे परिप्रेक्ष्य में इसे समझना होगा : वरना जो हालात पैदा होने की आशंका दिख रही है, ताज्जुब नहीं होगा, यदि हिटलर जैसो को भी पीछे छोड़ दे।

 

धर्म को मानने वाले भी धर्म के इस दुरुपयोग की आशंका से भलीभांति अवगत हैं। ईसाई धर्मगुरु पोप लियो चौदहवे ने बाकायदा बयान जारी करके अपना रुख स्पष्ट किया है। इस बयान में मध्य-पूर्व में युद्ध विराम की मांग के साथ उन्होंने सीधे तौर पर ईरान में युद्ध शुरू करने वाले नेताओं की भी आलोचना की है और ट्रंप को स्वार्थी और आत्ममुग्ध तक कह दिया है। ईरान के एक प्राथमिक विद्यालय पर हुए मिसाइल हमले, जिसमें 165 से अधिक बच्चे और शिक्षक मारे गए थे, को नरसंहार बताते हुए वेटिकन ने 6 मार्च को अपने आधिकारिक समाचार पत्र के पहले पृष्ठ पर “युद्ध का चेहरा” शीर्षक के तहत युवा पीड़ितों के लिए खोदी जा रही सामूहिक कब्र की हवाई तस्वीर प्रकाशित की है। पोप लियो ने कहा कि वे उन परिवारों के बहुत करीब हैं, जिनके सदस्य उन हमलों में मारे गए हैं, जिनमें स्कूल, अस्पताल और आवासीय केंद्र प्रभावित हुए हैं। उन्होंने लेबनान युद्ध पर भी चिंता जताई। इसी के साथ मध्य-पूर्व के ईसाइयों और सभी नेक इरादे वाले पुरुषों और महिलाओं की ओर से, इस संघर्ष के लिए जिम्मेदार लोगों से अपील की कि वे युद्ध विराम करें, ताकि संवाद के रास्ते फिर से खुल सकें। इसके बाद हुए एक आयोजन में उन्होंने यहाँ तक कहा कि “क्या उन ईसाइयों में, जो सशस्त्र संघर्षों में गंभीर जिम्मेदारी निभाते हैं, अंतरात्मा की गंभीरता से जांच करने और पश्चाताप करने की विनम्रता और साहस है?”

हालांकि पोप लियो ने तनाव को भड़काने से बचने के लिए अपने संदेश को अप्रत्यक्ष और गैर-राजनीतिक रखने की कोशिश की है, मगर अमरीका में उनके कुछ कार्डिनल और वेटिकन के विदेश सचिव ने ऐसा नहीं किया है। वाशिंगटन के आर्कबिशप कार्डिनल रॉबर्ट मैकलॉय ने कहा कि युद्ध नैतिक रूप से अनुचित है।शिकागो के कार्डिनल ब्लेज़ क्यूपिच ने कहा कि व्हाइट हाउस द्वारा युद्ध के बारे में अपने सोशल मीडिया संदेशों में वीडियो गेम की छवियों को शामिल करना “घृणित” था। वेटिकन के विदेश सचिव, कार्डिनल पिएत्रो पारोलिन ने वाशिंगटन के “निवारक युद्ध” के दावे को खारिज कर एक तरह से इसे जान-बूझकर छेडा गया युद्ध करार दिया।

 

इसी तरह की बातें, भले दबे स्वर में, यहूदी रब्बियों के भी एक हिस्से ने कही है और याद दिलाया है कि यहूदी धर्म में युद्ध को एक “टाली जाने वाली बुराई” के रूप में देखा जाता है, इसलिए इसे केवल तभी अपनाया जाना चाहिये, जब कोई अन्य विकल्प न हो। उन्होंने यह भी कहा कि यहूदी कानून के अनुसार, अपने अस्तित्व और भूमि की रक्षा के लिए लड़ना एक अनिवार्य कर्तव्य माना जाता है। तल्मूड और रब्बियों की शिक्षाओं के अनुसार, युद्ध शुरू करने से पहले हमेशा शांति की तलाश करनी चाहिए। हिंसा का महिमामंडन नहीं किया जाता है।

लुब्बोलुबाब यह है कि जिन धर्मों के नाम पर साम्राज्यवाद अपनी लूट और इजरायल अपनी बर्बरता को ढांपना चाहता है, उस धर्म के प्रमुखों तक ने इस करतूत से अपना पल्ला झाड़ लिया है। धर्म के भीतर भी चिंता का विषय है कि हत्यारे और लुटेरे उसे हथियार के रूप में इतेमाल करना चाहते हैं और यह भी कि वे ऐसा नहीं होने देना चाहते। यह एक ओर धार्मिक और उसका दुरुपयोग करने वालों के बीच अंतर करता है, वहीँ कुछ नई संभावनाएं भी प्रस्तुत करता है।

 

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button