गुलाबो की नगरी से गुलाब गायब होने कभी सिकंदरपुर के नाले और नालियों से भी फूलों की

रिपोर्ट अजीत कुमार सिंह बिट्टू जी
बलिया। सिकंदरपुर कभी गुला की नगरी के नाम से मशहूर था आज अपने बेबसी व लाचारी का दंश झेल रहा है। आज से तीन दसक पहले सिकंदरपुर में गुलाब चमेली व बेला की खेती एक उद्योग के रूप में जानी जाती भी और पहचान बनाई थी। यहां हजारों एकड़ में गुलाब, चमेली, बेला की खेती होती थी पूरी की खेती कर किसान काफी लाभाि होते थे। लेकिन समय का तकाजा व प्रशासनिक उदासीनता के कारण आज वही किसान इन फूलों की खेती से अपना मुंह मोड़ रहे हैं। जिसके कारण फूलों की खेती दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। सिकंदरपुर का गुलाब जल, केवडा जल व गुलाब सकरी के साथ इत्र भारत में ही नहीं बल्कि अन्य देशो में अपनी खुशबू बिखेरता था लेकिन आज यह प्रशासनिक व राजनितिक उदासीनता के कारण धीरे धीरे समाप्त होने के कगार पर पहुँच गया है। फूलों की खेती करने बाले किसानों की माने तो अब इससे अच्छा मजदूरी करना है। क्योंकि मेहनत करने के बाद भी मजदूर के मजदूरी के बराबर भी
पैसा नहीं मिल रहा है। जबको सरकारी स्तर पर फूलों की खेती करने वाले किसानों को अनुदान के साथ खेती में उपयोग आने वाले मन्त्र के नाम पर पैसा शासन स्तर से आया तो जरूर लेकिन
किसानो को न मिलकर विचोलियों को मिलता रहा है। कई बार किसानों द्वारा इस पर आवाज भी उठाया गया लेकिन अधिकारी केवल कागजो में ही जांच करते रह गए जिसका नतीजा आज यह है की अब लोग फूलों की खेती से मुंह मोड़ने लगे है।
गुलाबों की नगरी सिकंदरपुर में गुलाब सकरी इतनी प्रसिद्ध थी कि अन्य जनपद प्रदेश व विदेशों में भी इसका उपयोग किया जाता था। फरवरी महीने से लेकर जून माह तक इसकी जोरदार तरीके से विक्री होती थी। कस्बा निवासी दुकानदार मुन्ना मोदनवाल ने बताया कि पहले गर्मी के दिनों में लोग ठंडई के रूप में इसका इस्तेमाल करते थे। आज भी इसका इस्तेमाल लोग भरपूर मात्रा में करते है। इसके उपयोग से जहाँ पेट साफ रहता है। यह
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के कगार पर खुशबू मिलती थी
शरीर भी काफी फुल बना रहता है।
आज तीन दशक पहले सिकंदरपुर में गुलाब की खेती बड़े पैमाने पर होती थी उस जमाने में इसी खेती से लोग अपने परिवार का खर्च भी चला लेते थे। वहीं पड़ने वाले जरूरतों को भी आसानी से पूरा कर लिया करते थे लेकिन
संसाधन
के होने के बावजूद भी फूलों की खेती से मुंह मोड़ रहे हैं जहां पहले सिकंदरपुर क्षेत्र में दस दुकानदार होते थे उन्ही को
ह
किसान अपना फूल देते एक दर्जन कारखाने चलते थे। आज हालात यह है की मात्र चार दुकानदार व दो कारखाने ही रह गए है। आज से तीन दशक पहले जहां 200 कुंटल फूल प्रतिदिन हुआ करता था वही अब 5 से 10 कुंटल में सिमट गया है। जब तीन दशक पहले फरवरी मार्च के महीने में एक साथ दर्शनों कारखाने चलने लगते थे तो पूरे सिकंदरपुर में नालियां भी खु बिखेरने लगती थी। इसके पीछे यह कहा जाता था कि कारखानों [द्वारा गुलाब जल निकालने के बाद बचे हुए पानी को नाता नालियों में गिरा दिया जाता था, जिसके कारण नाला नालियां भी फूलों की खुशबू बिखेरती रहती थी और उन दिनों मच्छरों का प्रकोप नहीं हो पाता था। आज तो हालात यह है कि नाले नालियों में खुशबू तो दूर हर तरफ बदबू ही नजर आएगी।



