स्मृति शेष : ‘दानवीर कर्ण’ से मिली ख्याति, साहित्य की दुनिया के बने ‘मृत्युंजय’

In memory: Got fame from 'Danveer Karna', became 'Mrityunjay' of the literary world

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नई दिल्ली,:। मराठी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार शिवाजी सावंत ने कई रचनाओं के जरिए अपनी खास पहचान बनाई। 18 सितंबर 2002 को आखिरी सांस लेने वाले शिवाजी सावंत ने अपनी लेखनी से पात्रों को ऐसा रचा कि सभी हमेशा के लिए अमर हो गए, पात्र भी और शिवाजी सावंत भी। उनका जन्म 31 अगस्त 1940 को हुआ था और पूरा नाम शिवाजी गोविंद राज सावंत था।

 

 

शिवाजी सावंत के साहित्कार बनने के पीछे महाकाव्य ‘महाभारत’ का प्रमुख रोल रहा। उन्होंने 14 साल की उम्र में एक नाटक में भाग लिया और कृष्ण की भूमिका निभाई। आमतौर पर स्कूल में नाटक होते हैं, जिसमें छात्र-छात्राएं भूमिका निभाते हैं और एक समय बाद सपनों को जीने के लिए दुनिया की भागदौड़ में रास्ता बनाते हुए भागते हैं। लेकिन, शिवाजी सावंत के मन-मस्तिष्क में यह नाटक घर कर गया था।

 

शिवाजी सावंत के मन में ‘कर्ण’ का चरित्र गहरे उतर गया था। यहीं से एक साहित्यकार ने आकार लेना शुरू कर दिया। उन्होंने शब्दों के जरिए कर्ण के चरित्र को कागज पर उतारने की कोशिश शुरू कर दी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ‘रश्मिरथी’ और केदारनाथ मिश्र के ‘कर्ण’ का ऐसा असर हुआ कि शिवाजी सावंत को दानवीर कर्ण के चरित्र को समझने और दुनिया के सामने रखने का रास्ता मिल गया था।

 

आखिरकार शिवाजी सावंत का उपन्यास ‘मृत्युंजय’ नाम से साल 1967 में प्रकाशित हो गया। उपन्यास में कर्ण, कुंती, दुर्योधन, कृष्ण सहित दूसरे पात्रों को इस तरह से पेश किया गया कि पहला संस्करण हाथों-हाथ बिक गया। इस उपन्यास की लोकप्रियता इतनी थी कि चार से पांच सालों में चार संस्करण प्रकाशित हुए और सारे बिक भी गए। इस उपन्यास की समीक्षकों और साहित्याकारों ने खूब तारीफ भी की।

 

शिवाजी सावंत के ‘मृत्युंजय’ का प्रभाव ऐसा रहा कि महाराष्ट्र सरकार ने अपने साहित्य पुरस्कार से नवाजा। इसके अलावा केलकर पुरस्कार, महाराष्ट्र साहित्य परिषद और ललित पत्रिका पुरस्कार भी मिला। इस उपन्यास का अनुवाद अंग्रेजी, हिंदी, गुजराती, कन्नड़, राजस्थानी, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला समेत कई भाषाओं में हो चुका है। इस उपन्यास का रेडियो रूपांतर आकाशवाणी पुणे से भी प्रसारित हो चुका है।

 

‘मृत्युंजय’ को लेकर शिवाजी सावंत ने लिखा था, “मुझे आज भी पूरी तरह याद है कि अपने रथ के पहिए को उखाड़ने वाले कर्ण का रोल करने वाले छात्र मित्र ने जो संवाद किया था, वह श्रीकृष्ण होकर भी मेरे हृदय को बींध गया था। नाटिका खेले जाने के बहुत साल बाद भी कर्ण संवादों को नहीं भूल सका था। आज ‘मृत्युंजय’ के लेखक के नाते मुझे इस कर्ण कथा का कथाबीज वह नाटिका और युवा कर्ण ही लगता है।”

 

वहीं, शिवाजी सावंत के एक अन्य उपन्यास ‘छावा’ में छत्रपति शिवाजी के पुत्र महाराज शम्भाजी के जीवन-संघर्ष का अद्भुत और रोमांचकारी चित्रण है। इस उपन्यास को लिखने में शिवाजी सावंत को 12 वर्ष लगे थे। इसके अलावा शिवाजी युगंधर (उपन्यास), लढत (जीवनी), शलाका साज (ललित निबंध), अशी मने असे नमुने (रेखा चित्र), मोरवला (रेखा चित्र) के जरिए भी लोगों का मन मोहने में सफल हुए।

 

शिवाजी सावंत को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1982), मूर्तिदेवी पुरस्कार (1995), आचार्य अत्रे प्रतिष्ठान पुरस्कार (1999) समेत कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। शिवाजी सावंत की कर्मभूमि महाराष्ट्र रही और उनकी रचना की विषय-वस्तु ऐतिहासिक, पौराणिक और सामाजिक कथानकों और मान्यताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन, शिवाजी सावंत का ‘दानवीर कर्ण’ के साथ विशेष लगाव रहा।

 

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