राष्ट्र रक्षा के संकल्प का पर्व है रक्षाबंधन
प्रेम प्रकाश दुबे की रिपोर्ट
निजामाबाद/आजमगढ़।रक्षाबंधन राष्ट्र की रक्षा के संकल्प का पर्व है।यह भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महान पर्व है।रक्षा बंधन का आरंभ कब हुआ,इस विषय में कुछ निश्चित तो नहीं कहा जा सकता,लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देवों और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव,देवताओं पर भारी पड़ते नजर आने लगे।तब इंद्र घबराकर बृहस्पति जी के पास गए।बृहस्पति जी के निर्देशानुसार इंद्र की पत्नी श चि ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति की कलाई पर बांध दिया।संयोग से यह श्रावण पूर्णिमा का दिन था।जनविश्वास यह बना कि देवासुर संग्राम में इंद्र इसी धागे की मंत्रशक्ति से ही विजई हुए।ऐसा माना जाता है कि उसी दिन दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन को धागा बांधने की प्रथा प्रारंभ हुई,जो आज तक विभिन्न नाम और रूप से देश विदेश में चलती आ रही है।इतिहास के शानदार पृष्ठों से भी राखी का संबंध है।राजपुताने की राखी वैसे तो बहुत प्रसिद्ध है और कई वीरगाथाएं इसके साथ जुड़ी हैं,पर महारानी कर्मावती के धागे की कथा विशेष प्रसिद्ध है।मेवाड़ की रानी कर्मावती पर जब बहादुर शाह ने आक्रमण कर दिया तो वीरता से शत्रुओं का सामना करते हुए कर्मावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद की प्रार्थना की। हुमायूं ने राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंचकर बहादुर शाह के विरुद्ध युद्ध किया तथा राज्य की रक्षा की।दक्षिण भारत के धर्मग्रंथों और महाभारत में भी किसी न किसी रूप में राखी से जुड़ा विशेष प्रसंग सन 1905 के बंग भंग आंदोलन से है।जब लार्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन का फैसला कर ही लिया ,तब पूरा बंगाल एक मत से बंग भंग के विरुद्ध खड़ा हो गया और तब जनजागरण के लिए रक्षाबंधन का ही सहारा लिया गया।आज अधिकतर लोग परिवार और बहनें रक्षाबंधन को भाई बहन के प्यार का पर्व मानकर ही मनाते हैं। कहा जाता है कि कच्चे धागे से पक्के रिश्ते बनते हैं।इस दिन बहने अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर आशीर्वाद देती हैं और भाई भी जीवन भर यह संबंध प्यार और संरक्षण से निभाने का प्रण लेते हैं।परन्तु धीरे धीरे यह त्यौहार प्यार के साथ औपचारिता भी बन गया और महंगे उपहार देने लेने और दिखावे का एक साधन बन गया।देश की सभी बहन बेटियों से और राखी बंधवाने वाले भाइयों से यह निवेदन है कि राखी नोटो का त्यौहार नहीं,गहने और कपड़े लेने देने का अवसर नहीं ,यह सिरों का सौदा है।हमारी राखी में इंद्राणी की राखी जैसी शक्ति है,महारानी कर्मावती की राखी जैसा संदेश है और बंगाल के भाई बहनों के राष्ट्रहित में किए गए आंदोलन की भी चमक अपनी राखी में है।



