Azamgarh News:महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के तृतीय दीक्षांत समारोह में मेधावियों की उपेक्षा, 88 में से केवल 20 स्वर्ण पदक विजेताओं को मंच पर मिला सम्मान
महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के तृतीय दीक्षांत समारोह में मेधावियों की उपेक्षा, 88 में से केवल 20 स्वर्ण पदक विजेताओं को मंच पर मिला सम्मान
आजमगढ़, महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के तृतीय दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के मेधावी विद्यार्थियों को अपेक्षित सम्मान न मिलने से स्वर्ण पदक विजेताओं और उनके अभिभावकों में निराशा देखने को मिली। दीक्षांत समारोह में पुस्तक विमोचन, शिक्षकों के सम्मान तथा छोटे बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों सहित विभिन्न कार्यक्रम हुए, लेकिन विश्वविद्यालय के स्वर्ण पदक विजेताओं के मंचीय सम्मान के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जा सका।
विश्वविद्यालय में कुल 88 स्वर्ण पदक विजेता विद्यार्थियों को सम्मानित किया जाना था, लेकिन इनमें से केवल 20 विद्यार्थियों को ही मंच पर जाकर सम्मान प्राप्त करने का अवसर मिला। शेष 68 स्वर्ण पदक विजेता विद्यार्थी अपने अभिभावकों के साथ समारोह में उपस्थित रहकर मुख्य दर्शक बने रहे।
स्वर्ण पदक विजेताओं का कहना है कि वे पिछले कई दिनों से दीक्षांत समारोह की विभिन्न गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग ले रहे थे। विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को उम्मीद थी कि उन्हें महामहिम राज्यपाल, कुलपति तथा अन्य विशिष्ट अतिथियों के हाथों मंच पर सम्मान प्राप्त होगा। यह क्षण उनके लिए वर्षों की मेहनत और शैक्षणिक उपलब्धि का गौरवपूर्ण अवसर होता।
लेकिन समारोह के अंतिम चरण में सीमित संख्या में विद्यार्थियों को मंच पर सम्मानित किए जाने से बड़ी संख्या में मेधावी विद्यार्थी निराश दिखाई दिए। कई अभिभावकों ने भी इस व्यवस्था पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि दीक्षांत समारोह का मुख्य उद्देश्य ही विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों को सम्मानित करना है। ऐसे में स्वर्ण पदक विजेताओं को समान रूप से मंच पर सम्मानित किए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए थी।
बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में स्वर्ण पदक विजेताओं को इस प्रकार सीमित संख्या में मंच पर सम्मानित करने की व्यवस्था पहली बार देखने को मिली है। इसको लेकर विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच चर्चा रही कि जब सभी विद्यार्थियों ने समान रूप से अपनी प्रतिभा और मेहनत के आधार पर स्वर्ण पदक अर्जित किया है, तो सम्मान के अवसर में भी समानता होनी चाहिए।
विद्यार्थियों का कहना है कि वे किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे थे। उनकी अपेक्षा केवल इतनी थी कि वर्षों की मेहनत से अर्जित स्वर्ण पदक को महामहिम राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों के समक्ष मंच पर प्राप्त करने का अवसर उन्हें भी मिले। यह उपलब्धि उनके शैक्षणिक जीवन की महत्वपूर्ण स्मृति है, जिसे वे अपने अभिभावकों के साथ साझा करना चाहते थे।
अभिभावकों का कहना है कि अन्य कार्यक्रमों के लिए समय निर्धारित किया जा सकता है, लेकिन मेधावी विद्यार्थियों के सम्मान के लिए पर्याप्त समय सुनिश्चित करना विश्वविद्यालय की प्राथमिकता होनी चाहिए। पुस्तक विमोचन, शिक्षक सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रम अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दीक्षांत समारोह की मूल भावना विद्यार्थियों की उपलब्धियों के सम्मान से जुड़ी है।
समारोह में मंच से सम्मान पाने की प्रतीक्षा कर रहे अनेक विद्यार्थियों के चेहरे पर अंतिम समय में निराशा स्पष्ट दिखाई दी। जिन विद्यार्थियों को अपनी वर्षों की मेहनत का गौरवपूर्ण सम्मान मिलना था, उनमें से बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को मंचीय सम्मान से वंचित रहना पड़ा।
विद्यार्थियों एवं अभिभावकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपेक्षा की है कि इस व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी और भविष्य के दीक्षांत समारोहों में सभी स्वर्ण पदक विजेताओं को समान रूप से मंच पर सम्मानित किए जाने की व्यवस्था की जाएगी, ताकि मेधावी विद्यार्थियों की उपलब्धि और दीक्षांत समारोह की गरिमा दोनों सुरक्षित रह सकें।
दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों के जीवन का अविस्मरणीय अवसर होता है। इसलिए इस अवसर पर प्रत्येक स्वर्ण पदक विजेता को समान सम्मान और मंच उपलब्ध कराना ही उनकी मेहनत के प्रति वास्तविक सम्मान होगा।



