भगवान श्रीराम के श्रेष्ठ आदर्श आज भी अनुकरणीय, प्रेरणाप्रद एवं मार्गदर्शी: विमल पाठक

रिपोर्ट अजीत कुमार सिंह बिट्टू जी
बलिया। सनातन धर्म में भगवान श्रीराम पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। उनके श्रेष्ठ एवं उत्तम आचरण के कारण ही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। प्रतिष्ठित राजा कुल में जन्म लेने के बाद भी भगवान श्रीराम नाना प्रकार के सुखों को त्याग दिया था।कहा जाता है कि जिनके कर्म श्रेष्ठ होते हैं, उन्हें दुनिया में अलग पहचान मिलती है। इंसान के अच्छे कर्म और अच्छा आचरण ही उन्हें औरों से अलग बनाता है। सनातन धर्म के आराध्य एवं पुरुषार्थ के प्रतीक भगवान श्रीराम के चरित्र में कई गुण ऐसे हैं, जिन्हें सीखकर हम अपना जीवन सफल बना सकते हैं।भगवान श्रीराम 14 वर्ष का बनवास काटने के बाद और उनके जीवन काल में विभिन्न प्रकार के संकट आने के बाद भी मर्यादा, दया, सत्य, करुणा और धर्म जैसे आचरण का परित्याग नहीं किया। जिनके कारण उन्हें विश्व में श्रेष्ठ राजा की उपाधि मिली। भगवान श्रीराम स्वयं राजा होते हुए भी हनुमान, केवट निषादराज, सुग्रीव, जाम्बवंत आदि सभी को समय-समय पर नेतृत्व करने का समान अधिकार प्रदान किया था। उनके इन्हीं गुणों के कारण हम सभी भगवान श्रीराम को पूजते हैं और अपना आदर्श मानते हैं। उनका दयालु स्वभाव सिर्फ मनुष्यों के लिए ही नहीं, प्रकृति प्रदत्त सभी प्रकार के जीवों- पशु पक्षियों, समुद्र, नदी, तालाब, पर्वत, वन आदि पर भी समान रूप से होता था। उनके श्रेष्ठ आदर्श आज भी हम भारतीयों के लिए अनुकरणीय, प्रेरणाप्रद तथा मार्गदर्शी हैं।



