कि वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत का मान ३ जनवरी २०२५ शुक्रवार को ।

।विनय मिश्र ,जिला संवाददाता।
बरहज, देवरिया।
आचार्य अनिल मिश्रा ने बताया कि मैं नायक की श्री गणेश चतुर्थी व्रत का मन 3 जनवरी 2025 दिन शुक्रवार को होगा साथ ही
नवीन मत के अनुसार गुरु गोविन्द सिंह जयन्ती ५ जनवरी २०२५ रविवार को मनायी जायेगी ।
प्राचीन मत के अनुसार गुरु गोविन्द सिंह जयन्ती पौष शुक्ल सप्तमी ६ जनवरी २०२५ सोमवार को मनायी जायेगी।
कुछ विशिष्ट मान्यता के अनुसार शाकुम्भरी नवरात्र पौष शुक्ल अष्टमी तद्नुसार ७ जनवरी २०२५ मंगलवार से प्रारम्भ होगा। यह शाकुम्भरी पीठ का नवरात्र है।
-:गीता ज्ञान:-
गतांक से आगे…..
*कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:।*
*लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ।।*
–३/२०–
जनक मतलब राजा जनक नहीं, जनक जन्मदाता को कहते हैं। योग ही जनक है जो आपके स्वरुप को जन्म देता है, प्रकट करता है। योग से संयुक्त प्रत्येक महापुरुष जनक है। ऐसे योगसंयुक्त बहुत से ऋषियों *’जनकादय:’-* जनक इत्यादि ज्ञानीजन महापुरुष भी *’ कर्मणा एव हि संसिद्धिम् ‘-* कर्मों के द्वारा ही परमसिद्धि को प्राप्त हुए हैं। परम सिद्धि माने परमतत्व परमात्मा की प्राप्ति। जनक इत्यादि जितने भी पूर्व में होने वाले महर्षि हुए, इस ‘कार्यं कर्म’ के द्वारा, जो यज्ञ की प्रक्रिया है, इस कर्म को करके ही ‘संसिद्धिम्’ – परमसिद्धि को प्राप्त हुए हैं । किन्तु प्राप्ति के पश्चात वे भी लोकसंग्रह को देखकर कर्म करते हैं, लोकहित को चाहते हुए कर्म करते हैं। अत: तू भी प्राप्ति के लिए और प्राप्ति के पश्चात लोकनायक बनने के लिए कार्यं कर्म करने के ही योग्य है। क्यों?-
अभी श्रीकृष्ण ने कहा था कि प्राप्ति के पश्चात महापुरुष का कर्म करे से न कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है, फिर भी लोकसंग्रह, लोकहित व्यवस्था के लिए वे भली प्रकार नियत कर्म का ही आचरण करते हैं।
*यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।*
*स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।*
–३/२१–
श्रेष्ठ पुरुष जो- जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी उसके अनुसार ही करते है। वह महापुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, संसार उसका अनुसरण करता है।
पहले श्रीकृष्ण ने स्वरुप में स्थित, आत्मतृप्त महापुरुष की रहनी पर प्रकाश डाला कि उसके लिए कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि, फिर भी जनकादि कर्म में भली प्रकार बरतते थे। यहां उन महापुरुषों से श्रीकृष्ण धीरे से अपनी तुलना कर देते हैं कि मैं भी एक महापुरुष हूं।
*न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषुलोकेषु किञ्चन ।*
*नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।*
–३/२२–
हे पार्थ ! मुझे तीनों लोकों में कोई कर्तव्य नहीं है। पीछे कह आये हैं- उस महापुरुष का समस्त भूतों में कोई कर्तव्य नहीं है। यहां कहते हैं- तीनों लोकों में मुझे कुछ भी कर्तव्य नहीं है तथा किंच्चिन्मात्र प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्य नहीं है, तब भी मैं कर्म में भली प्रकार बरतता हूं। क्यों?-
*यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित:।*
*मम वर्तमानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ।।*
–३/२३–
क्योंकि यदि मैं सावधान होकर कदाचित् कर्म में न बरतूं तो मनुष्य मेरे वर्ताव के अनुसार बरतने लग जायेंगें । तो क्या आपका अनुकरण भी बूरा है? श्रीकृष्ण कहते हैं- हां !
*उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।*
*सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा:प्रजा:।।*
–३/२४–
यदि मै सावधान होकर कर्म ना करुं तो यह सब लोक भ्रष्ट हो जाय और मैं *’सङ्करस्य’-* वर्णसंकर का करने वाला होऊं तथा इस सारी प्रजा का हनन करने वाला, मारने वाला बनूं।
स्वरुप में स्थित महापुरुष सतर्क रहकर यदि आराधना- क्रम में न लगे रहें, तो समाज उनकी नकल करके भ्रष्ट हो जायेगा । महापुरुष ने तो आराधना पूर्ण करके परम नैष्कर्म्य की स्थिति को पाया है। वे न करें तो उनके लिए कोई हानि नहीं है; किन्तु समाज ने तो अभी आराधना आरम्भ ही नहीं की । पीछे वालों के मार्गदर्शन के लिए ही महापुरुष कर्म करते हैं, मैं भी करता हूं अर्थात् श्रीकृष्ण एक महापुरुष थे, न कि वैकुण्ठ से आये हुए कोई विशेष भगवान् । उन्होने कहा कि- महापुरुष लोकसंग्रह के लिए कर्म करता है, मैं भी करता हूं। यदि न करुं तो लोगों का पतन हो जाय, सभी कर्म छोड़ बैठेंगें।
मन बड़ा चंचल है। यह सब कुछ चाहता है, केवल भजन नहीं चाहता। यदि स्वरुपस्थ महापुरुष कर्म न करे, तो देखा-देखी पीछे वाले भी तुरन्त कर्म छोड़ देंगें। उन्हें बहाना मिल जायेगा कि ये भजन नहीं करते, पान खाते हैं, इत्र लगाते हैं, सामान्य बातें करते हैं फिर भी महापुरुष कहलाते हैं – ऐसा सोचकर वे भी आराधना से हट जाते हैं, पतित हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि मैं कर्म न करुं तो सब भ्रष्ट हो जायं और मैं वर्णसंकर का कर्ता बनूं।
स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर तो देखा सुना जाता है। अर्जुन भी इसी भय से विकल था कि स्त्रियां दूषित होंगीं तो वर्णसंकर पैदा होगा; किन्तु श्रीकृष्ण कहते है- यदि मैं सावधान होकर आराधना में लगा न रहूं, तो वर्णसंकर का कर्ता होऊं । वस्तुत: आत्मा का शुद्ध वर्ण है परमात्मा । अपने शाश्वत स्वरुप के पथ से भटक जाना वर्णसंकरता है। यदि स्वरुपस्थ महापुरुष क्रिया में नहीं बरतते तो लोग उनके अनुकरण से क्रिया रहित हो जायेंगें, आत्मपथ से भटक जायेगें, वर्णसंकर हो जायेंगें। वे प्रकृति में खो जायेंगें ।
स्त्रियों का सतीत्व एवं नस्ल की शुद्धता एक सामाजिक व्यवस्था है, अधिकारों का प्रश्न है , समाज के लिए उसकी उपयोगिता भी है; किन्तु माता पिता की भूलों का सन्तान की साधना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । ‘ आपन करनी पार उतरनी ।’ हनुमान, व्यास, वशिष्ठ, नारद, शुकदेव, कबीर इत्यादि अच्छे महापुरुष हुए , जबकि सामाजिक कुलीनता से इनका सम्पर्क नहीं है। आत्मा अपने पूर्वजन्म का गुणधर्म लेकर आता है। श्रीकृष्ण कहते है- *”मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।'(१५/७)* मन सहित इन्द्रियों से जो कार्य इस जन्म में होता है, उनके संस्कार लेकर जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर नवीन शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसमें जन्मदाताओं का क्या लगा? उनके विकास में कोई अन्तर नहीं आया। अत: स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर नहीं होता। स्त्रियों के दूषित होने और वर्णसंकर से कोई सम्बन्ध नहीं है। शुद्ध स्वरुप की ओर अग्रसर न होकर प्रकृति में बिखर जाना ही वर्णसंकरता है।



