माता-पिताकी सेवा करना पुत्रका कर्तव्य है । 

 

विनय मिश्र ,जिला संवाददाता।

सलेमपुर ,देवरिया।

माता पिता की सेवा करना, पुत्र का कर्तव्य है

और माता- पिताका अधिकार है। साधकको अपने कर्तव्यका पालन और अपने अधिकारका त्याग करना है। दूसरे मेरे अनुकूल हो जायँ, मेरी मनचाही हो जाय – इसका त्याग करना ‘अधिकारका त्याग’ है। करनेका अधिकार है, पानेका अधिकार नहीं। आजकल अधिकार तो चाहते हैं, पर कर्तव्य करते नहीं। वास्तवमें कर्तव्यके पीछे अधिकार दौड़ता है, पर आज अधिकारके पीछे दौड़तेहैं। अधिकार कर्तव्यका दास है, पर आज अधिकारके दास हो रहे हैं! पास होना चाहते हैं, पर पढ़ना नहीं चाहते! समाजमें हरेक व्यक्ति अधिकार चाहेगा तो लड़ाई होगी।*

दूसरेका कर्तव्य देखते ही मनुष्य अपने कर्तव्यसे गिर जाता है। अपनेको ऊँचा दिखाना, जिससे दूसरे हमें अच्छा समझें- यह अधिकारकी इच्छा है। दूसरा कुछ कहे, अपना काम ठीक तरहसे करो तो संसार सुधर जायगा।

दूसरेको निर्दोष देखनेकी इच्छा दोषदृष्टि नहीं है। माँ-बाप बच्चेमें दोष देखते हैं, अध्यापक विद्यार्थियोंमें दोष देखता है, गुरु अपने शिष्योंमें दोष देखता है तो यह दोषदृष्टि नहीं है, प्रत्युत उनको निर्दोष देखनेकी इच्छा है। दोषोंको न तो अपनेमें कायम करना चाहिये, न दूसरोंमें- यह मार्मिक बात है। वर्तमान सबका निर्दोष है।

भगवान्‌के वियोगमें तपस्या अपने-आप हो जाती है, पर तपस्याके बलसे भगवत्प्राप्ति नहीं होती।

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