Deoria news, मां की चोरी ही मक्खन चोरी है डॉक्टर श्री प्रकाश मिश्रा
मन की चोरी ही मक्खन चोरी है,डा,श्रीप्रकाश मिश्र
देवरिया।
बरहज:नंदना वार्ड पश्चिमी में चल रही श्रीमद्भागवत में कथाव्यास डाक्टर श्रीप्रकाश मिश्र ने भगवान श्रीकृष्ण की बाललीला की कथा कहते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला के श्रवण से भुक्ति व मुक्ति दोनों मिलती है।
कथा को आगे बढाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण अभी छः दिन के ही थे तो कंश ने अपने सेवकों से कहा कि तुरंत के जन्में सारे शिशुओं को मार दिया जाए । कंश की आज्ञानुसार चारों तरफ असुर छोटे छोटे बच्चों को मारने लगे । इस हेतु कंश की प्रधान सेविका पुतना राक्षसी बहुत सुंदर नारी का वेश धारण कर और अपनें स्तनों में उल्वट नाम का विष लगाकर गोकुल में नंद भवन में घुस गई । उसके सौन्दर्य को देखकर सारे ब्रजवासी सम्मोहित होकर किसी बडे घराने की महिला समझकर रोक टोक नहीं किए। वह सीधे नंदभवन में घुसकर मां यशोदा को डांटते हुए कहा कि बच्चा भूखा है और तुम सब ताली बजा रही हो यह कहकर साधारण बालक समझकर अपना विषलेपित स्तन कन्हैया के मुंह में डाल दी । कन्हैया नें उसका दूध व जहर को पीते हुए उसके प्राणों को भी पीनें लगे । अब पुतना चिल्लाते हुए राक्षसी का रूपधारण कर छटपटाने व चिल्लाते हुए कही मुझे मुझे छोड दे भगवान कहे पुतना मांसी मैं जिसे पकड लेता छोडता नहीं उद्धार कर देता हूं । इस तरह उस विषदायीनी पुतना क भगवान श्रीकृष्ण नें उद्धार कर दिया । और ज पुतना मरकर गिरी तो कंश के छः कोश के वागीचे को तहस नहस कर दी । उसके सरीर को टांगियों से काटकर कयी जगह चिता जलाई गई तो उसके सरीर में से अगर तगर धूप का सुगंध निकलने लगा। ऐसा इसलिए हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण पुतना का दूध पी लिए थे जिसका सरीर भगवान ही स्पर्श कर दें तो उसके सरीर में से सुगंध ही निकलेगा । पुतना पुर्व जन्म में राजा बलि व विंध्यावली की पुत्री रत्नमाला थी जब बामन के रुप में भगवान वलि के दरबार में गये तो रत्नमाला के अंदर मातृभावना जगी और मन में विचार आया कि मेरा पुत्र होता तो इसे दूध पिलाती लेकिन जब वामन भगवान ने विशाल रुप धारण कर वलि राजा का सर्वस्व लिया तब ये कही अरे इसको तो स्तन में जहर लगाकर पिला देना चाहिए इन्हीं दो मनोभावों को लेकर आई और पुतना के दोनों इच्छाओं की पूर्ति करते हुए उसका उद्धार कर दिए। इस अवसर पर ओमप्रकाश शुक्ल जैप्रकाश शुक्ल परशुराम पाण्डेय कृष्णमुरारी तिवारी डाक्टर वेदप्रकाश सिंह डाक्टर अशोक पाण्डेय आदि श्रोताओं नें कथा का रसपान किए।



