Azamgarh News:एक अधिकारी की विदाई… और आँखों में ठहरे आँसू

आजमगढ़ बलरामपुर /पटवध से बबलू राय
एक अधिकारी की विदाई… और आँखों में ठहरे आँसू
आजमगढ़ से जा रहे गंभीर सिंह केवल एक अधिकारी नहीं, एक अच्छे इंसान की याद छोड़ गए
किसी अधिकारी की विदाई के समय औपचारिक विदाई समारोह होते हैं, बुके दिए जाते हैं, शुभकामनाएँ दी जाती हैं और फिर अधिकारी नई जिम्मेदारी के लिए रवाना हो जाता है। लेकिन कभी-कभी कोई विदाई ऐसी होती है, जिसमें फूलों से अधिक आँखें बोलती हैं और शब्दों से अधिक भावनाएँ।
आजमगढ़ के अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व श्री गंभीर सिंह की विदाई का दृश्य भी कुछ ऐसा ही रहा।
उनसे मिलने के लिए जब अधिवक्ता आए तो कई लोगों की आँखों में आँसू थे। कोई उन्हें कुछ कहना चाहता था, लेकिन गला भर आया। कोई हाथ मिलाकर चुप हो गया। किसी ने बस इतना कहा—“सर, आपकी कमी महसूस होगी।”
और फिर वह दृश्य, जो शायद किसी भी अधिकारी के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकता है—
उनका अपना स्टाफ उनके सामने खड़ा था और कई कर्मचारियों की आँखें नम थीं।
यह किसी आदेश से पैदा हुई औपचारिक विदाई नहीं थी। यह उस रिश्ते की विदाई थी, जो धीरे-धीरे एक कार्यालय की चारदीवारी के भीतर बना था।
कर्मचारियों के बीच से निकली एक बात दिल को छू गई—
> “सर, यहाँ बहुत अच्छे-अच्छे अधिकारी आएँगे, लेकिन शायद आपके जैसा अच्छा इंसान दोबारा न आए।”
शायद किसी अधिकारी के लिए इससे बड़ा प्रशस्ति-पत्र कोई दूसरा नहीं हो सकता।
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पद बड़ा था, लेकिन इंसान उससे भी बड़ा
अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व का पद जिम्मेदारियों से भरा हुआ है। राजस्व न्यायालय, वसूली, प्रशासनिक कार्य, जनसुनवाई, विभागीय समन्वय और अनेक संवेदनशील विषय—हर दिन निर्णय लेने पड़ते हैं।
लेकिन गंभीर सिंह की पहचान केवल इन जिम्मेदारियों के निर्वहन तक सीमित नहीं रही।
उनकी खासियत यह रही कि पद की ऊँचाई ने उनके व्यवहार में दूरी पैदा नहीं की।
अधिवक्ता हों, कर्मचारी हों या आम नागरिक—उन्होंने लोगों से संवाद में सहजता बनाए रखी। कोई अपनी समस्या लेकर आया तो उसकी बात सुनना, मामले को समझना और नियमानुसार रास्ता तलाशना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा।
इसीलिए उनके जाने के समय लोगों को केवल एक अधिकारी के स्थानांतरण का दुख नहीं था, बल्कि एक सहज उपलब्ध और संवेदनशील इंसान के दूर जाने का एहसास था।
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कोर्ट में कुर्सी के पीछे एक संवेदनशील इंसान भी था
राजस्व न्यायालय में अधिकारी की कलम से निकला एक आदेश किसी व्यक्ति के लिए जमीन, अधिकार, परिवार और भविष्य से जुड़ा हो सकता है।
गंभीर सिंह ने न्यायिक दायित्व को केवल फाइलों के निस्तारण के रूप में नहीं देखा। मामलों को सुनना, पक्षों को समझना और उपलब्ध तथ्यों तथा नियमों के आधार पर निर्णय करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा।
अधिवक्ताओं के साथ भी उनका व्यवहार संवाद और सम्मान पर आधारित रहा। शायद यही कारण है कि विदाई के समय कई अधिवक्ताओं की आँखें नम थीं।
जिस अधिकारी की अदालत में कभी किसी मामले को लेकर बहस हुई हो, वही अधिकारी जब विदाई के समय भावुक होकर याद आए—तो यह केवल पद की नहीं, व्यक्तित्व की कमाई होती है।
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स्टाफ के साथ रिश्ता—साहब और कर्मचारी से आगे
सरकारी कार्यालयों में अधिकारी बदलते रहते हैं। नई कुर्सी, नया अधिकारी और नई कार्यशैली—यह प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है।
लेकिन हर अधिकारी अपने पीछे ऐसा भाव नहीं छोड़ता कि कर्मचारी उसकी विदाई के समय अपनी भावनाएँ रोक न पाएँ।
गंभीर सिंह के स्टाफ के लिए वे केवल “साहब” नहीं रहे। उनके साथ काम करते-करते एक ऐसा मानवीय रिश्ता बना, जिसमें अनुशासन भी था और अपनापन भी।
उनके अच्छे काम की सराहना करना, कर्मचारियों की बात सुनना और टीम को साथ लेकर चलना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा।
इसीलिए विदाई के समय जब कर्मचारी एक साथ खड़े थे, तो उनके चेहरे पर मुस्कान कम और आँखों में नमी अधिक थी।
और उन्हीं नम आँखों से निकला वह वाक्य शायद इस पूरे कार्यकाल का सबसे सच्चा मूल्यांकन है—
“सर, अधिकारी तो बहुत अच्छे आएँगे… लेकिन अच्छा इंसान शायद किसी प्रशासनिक अधिकारी की असली परीक्षा उसके कार्यालय में आने वाले उस व्यक्ति से होती है, जिसके पास न कोई पहचान होती है, न कोई सिफारिश।
गंभीर सिंह की कोशिश रही कि आम व्यक्ति अपनी बात रख सके।किसी गरीब की समस्या हो, किसी परिवार की परेशानी हो, शिक्षा से जुड़ा कोई विषय हो या राजस्व से संबंधित मामला—उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारी के साथ मानवीय संवेदना को भी महत्व दिया।
यही संवेदना उनके पूर्व कार्यकाल की सार्वजनिक छवि में भी दिखाई देती रही है, जहाँ शिक्षा और गरीब बच्चों से जुड़े विषयों के प्रति उनकी सक्रियता का उल्लेख हुआ है।
शायद यही कारण है कि उनके जाने के बाद लोग उनके आदेशों से ज्यादा उनके व्यवहार को याद कर रहे हैं।
स्थानांतरण सरकारी सेवा का हिस्सा है। आजमगढ़ के बाद गंभीर सिंह किसी नए जनपद में नई जिम्मेदारी संभालेंगे। वहाँ नई फाइलें होंगी, नए कर्मचारी होंगे, नए अधिवक्ता होंगे और नई चुनौतियाँ होंगी।लेकिन आजमगढ़ उनके लिए केवल एक पोस्टिंग नहीं रहा होगा।यहाँ कुछ ऐसे चेहरे भी रह जाएंगे जो उन्हें देखकर मुस्कुराते थे।कुछ कर्मचारी रह जाएंगे जिन्होंने उनके साथ काम किया।कुछ अधिवक्ता रह जाएंगे जिन्होंने उनकी अदालत में अपनी बात रखी।कुछ आम लोग रह जाएंगे जिन्हें लगा था कि “साहब ने हमारी बात सुनी।”उनकी कुर्सी पर कोई नया अधिकारी जरूर बैठेगा, लेकिन उस कुर्सी से जुड़ी उनकी मानवीय स्मृतियाँ बहुत समय तक लोगों के बीच रहेंगी।क्योंकि अधिकारी आते हैं, जाते हैं।पद बदलते हैं।जिले बदलते हैं।लेकिन व्यवहार की स्मृति इतनी आसानी से नहीं बदलती।एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उनका स्थानांतरण हो रहा है, लेकिन एक अच्छे इंसान के रूप में उनकी विदाई लोगों के दिलों में दर्ज हो रही है।और शायद यही किसी भी सरकारी सेवक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है—जब आपके जाने पर कार्यालय की कुर्सी खाली हो,तो लोग उसे भरने की चिंता करें;लेकिन जब आपके जाने पर लोगों की आँखें भर आएँ,तो समझिए आपने केवल पद नहीं निभाया—आपने रिश्ते भी निभाये



