जलवायु परिवर्तन और डेयरी उत्पादकता: भारत के लिए ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ कदम उठाने का समय

Climate change and dairy productivity: Time for India to take 'climate-smart' steps

लेखक: कैप्टन (डॉ.) ए.वाई. राजेंद्र

सीईओ – एनिमल न्यूट्रिशन बिजनेस, गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड

 

भारत के डेयरी क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के प्रति अपनी क्षमता को जल्द से जल्द मजबूत करना होगा। अल नीनो (El Niño) की स्थिति के कारण कमजोर मानसून, लंबे समय तक चलने वाली लू (हीटवेव) और मवेशियों पर बढ़ते गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) का खतरा मंडरा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अनुमान लगाया है कि मानसून की बारिश लंबी अवधि के औसत की लगभग 90% होगी, और 60% संभावना इस बात की है कि यह सीजन कमजोर रहेगा। यह दूध उत्पादन के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि देरी से आने वाले या कमजोर मानसून से गर्मियों के अत्यधिक तापमान से कोई राहत नहीं मिलती।

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भले ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, लेकिन यहाँ की उत्पादकता अब भी कम है। वैश्विक औसत 7.18 किलोग्राम की तुलना में भारत में प्रति गाय प्रतिदिन का औसत दूध उत्पादन केवल 4.87 किलोग्राम है। गर्मी का तनाव इस अंतर को और बढ़ा देता है। अध्ययनों से पता चलता है कि सूखे की स्थिति दूध उत्पादन को 25% से अधिक कम कर सकती है, जबकि अल नीनो से प्रभावित डेयरी प्रणालियों के वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि इससे उत्पादन में 25-30% का नुकसान होता है। भारत के डेयरी क्षेत्र में, जहाँ छोटे किसान ज़्यादा हैं, जलवायु के ऐसे झटके किसानों के व्यवहार को भी प्रभावित करते हैं। इसके कारण वे निवेश कम कर देते हैं, पशुओं की संख्या बढ़ाने में देरी करते हैं, और उनका पूरा ध्यान केवल दूध देने वाले पशुओं को बनाए रखने पर केंद्रित हो जाता है।

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जलवायु का तनाव डेयरी फार्मिंग को कई स्तरों पर प्रभावित करता है। गर्मी के कारण दूध का उत्पादन कम होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है, जबकि चारे और पानी की कमी उत्पादकता को और प्रभावित करती है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में ऐसा बदलाव आम होता जा रहा है, डेयरी फार्मिंग को इसके अनुकूल ढालना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि ज़रूरत बन गया है।

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जलवायु के प्रति अधिक सक्षम बनने की दिशा में पहला कदम बेहतर पोषण है। गर्मी का दबाव पशुओं के चारा सेवन को काफी कम कर देता है। दुग्ध उत्पादन करने वाली गायें 25–26 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ही कम चारा खाना शुरू कर देती हैं। 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान बढ़ने पर चारा सेवन तेजी से घटता है और 40 डिग्री सेल्सियस पर यह लगभग 40 प्रतिशत तक कम हो सकता है। पानी की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक लीटर दूध उत्पादन के लिए लगभग 4–5 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। जब पशु कम चारा और कम पानी लेते हैं, तो दूध उत्पादन, स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता—तीनों प्रभावित होते हैं।

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वैज्ञानिक तरीके से तैयार संतुलित कंपाउंड फीड इस पोषण संबंधी कमी को दूर करने में मदद करते हैं। इनमें पोषक तत्वों की सघन मात्रा होती है, जिससे कम चारा खाने की स्थिति में भी पशुओं को आवश्यक पोषण मिल जाता है और पाचन के दौरान शरीर में कम ऊष्मा उत्पन्न होती है। संतुलित पोषण चारे के बेहतर उपयोग में मदद करता है, खराब गुणवत्ता वाले चारे की कमी की भरपाई करता है, प्रजनन क्षमता को बेहतर बनाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है, जिससे पशु जलवायु संबंधी तनाव का बेहतर सामना कर पाते हैं।

 

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