आजमगढ़;राज्यपाल की अध्यक्षता में महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय का तृतीय दीक्षोत्सव हुआ संपन्न
Azamgarh: The third initiation ceremony of Maharaja Suheldev University was held under the chairmanship of the Governor.

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आजमगढ़ 11 अगस्त ,प्रदेश की राज्यपाल एवं राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल जी की अध्यक्षता में महाराजा सुहेलदेवल विश्वविद्यालय का तृतीय दीक्षोत्सव संपन्न हुआ। दीक्षोत्सव में कुल 74 विद्यार्थियों को उपाधियाँ प्रदान की गईं, जिनमें 48 छात्राएँ (64.86 प्रतिशत) तथा 26 छात्र (35.14 प्रतिशत) शामिल रहे। समारोह में 74 मेधावी विद्यार्थियों को कुल 88 पदक प्रदान किए गए। प्रदान किए गए पदकों में 14 विद्यार्थियों ने कुलाधिपति व कुलपति दोनो मेडल प्राप्त किये हैं। सभी उपाधियों एवं अंकपत्रों को डिजीलॉकर पर अपलोड किया गया। राज्यपाल जी ने विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा लिखित पुस्तकों एवं दीक्षोत्सव स्मारिका का विमोचन किया तथा अकादमिक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया गया। राज्यपाल की प्रेरणा से संचालित एचपीवी टीकाकरण अभियान के अंतर्गत आज जनपद आजमगढ़ एवं मऊ की लगभग 2000 बेटियों का एचपीवी टीकाकरण कराया गया, जिनमें पुलिस कर्मियों की बेटियाँ भी शामिल रहीं। राज्यपाल जी ने कहा कि एचपीवी वैक्सीन से एक भी बेटी वंचित नहीं रहनी चाहिए। 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के जन्मदिवस के अवसर पर सभी राज्य विश्वविद्यालयों एवं जिला प्रशासन के सहयोग से एक ही दिन में एक करोड़ बेटियों को एचपीवी वैक्सीन उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।राज्यपाल जी द्वारा संचालित अभियान के अंतर्गत जनपद आजमगढ़ के 200 तथा जनपद मऊ के 200 एवं सुहेलदेव विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा 100 सहित कुल 500 आंगनबाड़ी केन्द्रों को आंगनबाड़ी किट वितरित की गई। इस अभियान के तहत प्रदेश में अब तक 73,793 आंगनबाड़ी केन्द्रों को सुविधा संपन्न बनाया जा चुका है। बेहतर संसाधनों के कारण आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है तथा समय पर आना, बैठना, भोजन करना, खेलना और सीखना जैसी गतिविधियों में सकारात्मक परिवर्तन आया है। राज्यपाल जी ने कहा कि उन्होंने स्वयं इन केन्द्रों का निरीक्षण किया है और देखा है कि बेहतर वातावरण मिलने से बच्चे अत्यंत प्रसन्न रहते हैं।दीक्षोत्सव को संबोधित करते हुए राज्यपाल जी ने विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल, सफल, समृद्ध एवं सार्थक भविष्य की मंगलकामना की। मा0 राज्यपाल ने कहा कि यह विश्वविद्यालय वीर शिरोमणि महाराजा सुहेलदेव के नाम पर स्थापित है। उनका जीवन राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता, साहस, संगठन और जनकल्याण का अनुपम उदाहरण है। एक ही व्यक्ति में इतने गुण हों, ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं। उनके आदर्श हमें बताते हैं कि जब समाज अपने मूल्यों और संस्कृति के प्रति सजग रहता है, तब वह प्रत्येक चुनौती का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है।उत्तर प्रदेश की सभी विश्वविद्यालयों का संबंध किसी न किसी महान व्यक्तित्व, स्वतंत्रता सेनानी अथवा शिक्षाविद् से जुड़ा हुआ है। इस बार मैंने सभी विश्वविद्यालयों से कहा है कि आपकी जो विश्वविद्यालय जिस महान व्यक्तित्व के नाम से जुड़ी हुई है, उसके संबंध में उपलब्ध पुस्तकों को पहले अपनी लाइब्रेरी में रखें एवं बच्चों को प्रेरित करिए कि वे उन पुस्तकों को पढ़ें। महान विभूतियों के जीवन की कई ऐसी घटनाएँ होंगी, जो हमें प्रेरणा देती होंगी। उन्होंने समाज को क्या-क्या दिया, इस पर भाषण, लेखन एवं अन्य गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए। जहाँ वे रहते थे, यदि वह स्थान आसपास हो तो बच्चों को वहाँ ले जाकर दिखाया जाए कि वे कहाँ रहते थे, कैसे रहते थे और उनके परिवार के सदस्यों से भी बच्चों को परिचित कराया जाए। ये सभी गतिविधियाँ पूरे वर्ष चलनी चाहिए। तभी यह पता चलेगा कि जिस विश्वविद्यालय के भवन में हम बैठे हैं और जिन वरिष्ठ व्यक्तियों के नाम पर भवनों का नामकरण किया गया है, उन्होंने समाज के लिए क्या कार्य किए थे। किसी का नाम ऐसे ही नहीं दिया जाता है, उन्होंने कुछ करके दिखाया है, तभी वर्षों तक लोग उनके कार्यों को याद करते हैं। हमें उन्हें पहचानना, समझना और उनके कार्यों से प्रेरणा लेना चाहिए। विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों को भी यही कार्य करना चाहिए।आज के इस दीक्षांत समारोह में 63,084 उपाधियाँ डिजिलॉकर पर अपलोड की गई हैं। इनमें 42,724 छात्राएँ और 20,360 छात्र शामिल हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हमारी बेटियाँ निरंतर आगे बढ़ रही हैं और कुल उपाधियों में उनकी भागीदारी लगभग दो-तिहाई है। मैंने विश्वविद्यालय को एक और कार्य दिया है, आपका पूरा परिसर, चाहे महाविद्यालय का परिसर हो या विश्वविद्यालय का परिसर, दोपहर दो-तीन बजे के बाद खाली हो जाता है। कम से कम एक भवन में ऐसे युवाओं के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए, जिन्हें रोजगार की आवश्यकता है और जो कुछ नया सीखना चाहते हैं। कम से कम 100 बच्चों को एकत्र करके उनसे पूछा जाए कि वे क्या सीखना चाहते हैं। उन्हें दो-तीन महीने का सर्टिफिकेट कोर्स/पाठ्यक्रम कराया जाए और विश्वविद्यालय की ओर से प्रमाण-पत्र दिया जाए। जब वही बेटा या बेटी यह प्रमाण-पत्र लेकर कहीं रोजगार के लिए जाएगा, तो उसकी योग्यता बढ़ेगी और उसे बेहतर वेतन भी मिल सकता है। लोगों को ऐसे प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता है। इसलिए रोजगारपरक शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है और दूसरा, एक बार पढ़ाई कर लेने के बाद यह मत समझिए कि शिक्षा समाप्त हो गई। देखिए, मैंने भी एक बार तय किया कि मुझे एम.एड. करना है। उस समय मैं स्कूल में सेवा करती थी। मैंने शनिवार और रविवार को विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और वहाँ दो वर्ष तक पढ़ाई पूर्ण की। मुझे इसकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी, लेकिन पढ़ना आवश्यक है। निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए, पढ़ाई कभी समाप्त नहीं होती।ऐसी कई महिलाएँ हैं, जो आगे पढ़ना चाहती हैं और अपने कार्य के साथ कुछ नया करना चाहती हैं। कोई ऑनलाइन बिक्री करना चाहती है, कोई केवाईसी करना चाहती है। ऐसे अलग-अलग प्रकार के पाठ्यक्रम शुरू करके यदि आप ऐसे लोगों को प्रशिक्षित करेंगे, तो मुझे विश्वास है कि इससे समाज के उन क्षेत्रों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा, जो गरीबी से प्रभावित हैं। मैंने मेरठ में बेटियों को देखा है। मैंने अलग-अलग क्षेत्रों की बेटियों को देखा है। हमें पता चलता है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या गरीबी है। गरीबी से निपटने और उससे बाहर निकलने के लिए रोजगारपरक शिक्षा एवं प्रशिक्षण आवश्यक हैं।उन्होने सुझाव दिया कि जो विद्यार्थी आज विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ रहे हैं, उनके लिए भी ऐसे प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। वे अपनी नियमित पढ़ाई के साथ एक घंटा अतिरिक्त समय देकर अपनी रुचि के अनुसार कोई कौशल सीख सकते हैं और विश्वविद्यालय के माध्यम से प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार उनके पास दो प्रमाण-पत्र होंगे, एक नियमित शिक्षा का और दूसरा रोजगारपरक कौशल का। इससे उनके रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और परिवार भी गरीबी से बाहर निकल सकेगा। गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता शिक्षा और प्रशिक्षण ही है।इसी प्रकार आज 74 विद्यार्थियों को 88 पदक प्रदान किए गए हैं। इनमें 48 छात्राएँ और 26 छात्र शामिल हैं। पदकों में भी छात्राओं ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। मैं सभी को बहुत-बहुत बधाई देती हूँ और उनके अभिभावकों को भी बधाई देती हूँ कि वे अपने बच्चों को गरीबी से बाहर निकलने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। हम वर्षों से यह कार्य करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे। आप आगे बढ़ते रहिए, तभी हमारा परिवार और समाज आगे बढ़ेगा।उन्होने कहा कि आज यहाँ विख्यात बाँसुरी वादक, भारतीय शास्त्रीय संगीत के अप्रतिम साधक एवं पद्म विभूषण पं0 हरिप्रसाद चौरसिया जी की उपस्थिति हमारे लिए गौरव का विषय है। अपनी अद्भुत साधना, समर्पण और संगीत के माध्यम से आपने भारतीय संस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाई है। आपका जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि निरंतर अभ्यास, अनुशासन और उत्कृष्टता का संकल्प साधक को सर्वाेच्च शिखर तक पहुँचा सकता है। आपकी उपस्थिति विद्यार्थियों को अपने-अपने क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त करने और राष्ट्र का गौरव बढ़ाने के लिए सदैव प्रेरित करती रहेगी।राज्यपाल ने कहा कि मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय ने डिजिटल प्रशासन, समयबद्ध परीक्षा प्रणाली, उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन, समर्थ पोर्टल, शोध पीठों की स्थापना, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ शैक्षणिक सहयोग तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। मुझे बहुत खुशी हुई कि अभी इस विश्वविद्यालय को स्थापित हुए केवल तीन वर्ष हुए हैं और शुरुआत से ही यदि आप अच्छी व्यवस्था और अच्छी प्रणाली बनाएँगे, तो आने वाले वर्षों में भी वही प्रणाली आगे चलती रहेगी। जब कोई नया विश्वविद्यालय शुरू होता है, उसी समय बनाई गई अच्छी प्रणाली वर्षों तक चलती है। इसमें पारदर्शिता भी होनी चाहिए और किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए। इस बात का विशेष रूप से सभी को ध्यान रखना है। मुझे अवगत कराया गया कि विश्वविद्यालय द्वारा प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यकुशलता को सुदृढ़ करने की दिशा में शिक्षकों, कर्मचारियों तथा छात्र-छात्राओं के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू की गई है। यह बहुत अच्छी पहल है। महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में समय पर आना, पढ़ना, सीखना और एक अच्छा एवं होनहार नागरिक बनना, यह हमारी विश्वविद्यालय व्यवस्था का उद्देश्य होना चाहिए। इससे विश्वविद्यालय की कार्य संस्कृति अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनती है।विश्वविद्यालय परिसर में नवनिर्मित केंद्रीय पुस्तकालय तथा स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना भी प्रशंसनीय पहल है। पिछली बार जब मैं यहाँ आई थी, तब मैंने इन व्यवस्थाओं को देखा था। मैं इन सभी सकारात्मक पहलों के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की सराहना करती हूँ और आशा करती हूँ कि विश्वविद्यालय भविष्य में भी आधुनिक सुविधाओं, सुशासन, पारदर्शिता और विद्यार्थी-केंद्रित व्यवस्था को प्राथमिकता देते हुए निरंतर प्रगति के नए आयाम स्थापित करेगा। भारत विश्व के अग्रणी स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में उभर रहा है। नवाचार, उद्यमिता और प्रौद्योगिकी आधारित समाधान देश के विकास को नई गति दे रहे हैं।तकनीक जितनी शक्तिशाली है, उतनी ही जिम्मेदारी भी माँगती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग सदैव नैतिकता, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों के साथ होना चाहिए। जीवन में सफलता का आधार केवल प्रतिभा नहीं है, बल्कि अनुशासन, सत्यनिष्ठा, परिश्रम और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति है। जो व्यक्ति सीखना बंद कर देता है, उसका विकास भी वहीं रुक जाता है। इसलिए स्वयं को आजीवन विद्यार्थी बनाए रखें। चुनौतियों से घबराएँ नहीं, बल्कि उन्हें अवसर में बदलने का साहस विकसित करें। मैं विशेष रूप से युवाओं से आग्रह करती हूँ कि वे नशामुक्त, स्वस्थ और अनुशासित जीवन अपनाएँ। योग, खेल, सकारात्मक चिंतन और आत्म-संयम जीवन को सफल बनाते हैं। डिजिटल माध्यमों का विवेकपूर्ण उपयोग करें और असत्य सूचनाओं, साइबर अपराध तथा डिजिटल व्यसन से स्वयं को दूर रखें।हमारा संविधान हमें अधिकारों के साथ-साथ मूल कर्तव्यों का भी बोध कराता है। राष्ट्रीय एकता, महिला सम्मान, पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक समरसता और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। मुझे विश्वास है कि आप इन मूल्यों को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएँगे,जब-जब बदलाव का दौर आता है, तब-तब उसके साथ चुनौतियाँ भी आती हैं और नए अवसर भी जन्म लेते हैं। दुनिया बदल रही है, तकनीक बदल रही है, काम करने के तरीके बदल रहे हैं और ज्ञान के नए आयाम सामने आ रहे हैं। लेकिन इन सभी परिवर्तनों के बीच एक सत्य कभी नहीं बदलता, जो सीखेगा, वही आगे बढ़ेगा और वही जीतेगा। याद रखिए, जो व्यक्ति नई चुनौतियों से घबराता नहीं है, बल्कि उनके नए समाधान खोजने का साहस रखता है, उसके लिए हर चुनौती एक अवसर बन जाती है। चुनौतियों को अवसर में बदल दीजिए। इसलिए मैं आप सभी से कहना चाहूँगी कि अपनी सीखने की क्षमता को कभी समाप्त मत होने दीजिए। डिग्री प्राप्त करने के साथ अपनी शिक्षा को समाप्त मत समझिए। जीवन स्वयं एक विश्वविद्यालय है और हर दिन हमें कुछ नया सीखने का अवसर देता है। सवाल पूछिए, जिज्ञासु बनिए, लेकिन सवाल पूछकर रुक मत जाइए। अपने प्रश्नों के उत्तर खोजिए, समस्याओं के समाधान खोजिए और यदि समाधान उपलब्ध नहीं है, तो नया समाधान बनाने का साहस रखिए। किसी के साथ तुलना मत करिए। आपकी गुणवत्ता, आपकी ताकत और आपकी क्षमता अलग है और उनकी अलग। इसलिए अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखिए, अपने प्रयासों को ईमानदारी से निरंतर जारी रखिए और अपनी प्रगति को दूसरों के पैमाने से नहीं, बल्कि अपने कल के प्रदर्शन से मापिए। दूसरों से तुलना आपको परेशान कर सकती है, लेकिन स्वयं से प्रतियोगिता आपको बेहतर बना सकती है। इसलिए स्वयं से प्रतियोगिता करिए।आज हम ऐसे कालखंड के साक्षी हैं, जिसने भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा, नई दृष्टि और नया आत्मविश्वास प्रदान किया है। केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण हुए हैं। इस कालखंड में शिक्षा को ज्ञान से, ज्ञान को कौशल से और कौशल को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का कार्य किया गया है। इस अवधि में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने शिक्षा जगत में एक नए युग का सूत्रपात किया है। इस नीति ने विद्यार्थियों को विषयों की सीमाओं से मुक्त कर बहुविषयक अध्ययन, नवाचार, अनुसंधान और कौशल विकास के नए अवसर प्रदान किए हैं। अब शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि प्रयोगशालाओं, उद्योगों, स्टार्टअप और समाज के साथ जुड़कर अधिक व्यापक और जीवनोपयोगी बनी है।पेंटिंग के क्षेत्र में भी मैंने दो-तीन विद्यालयों में बच्चों की प्रतिभा देखी। बच्चे बहुत सुंदर पेंटिंग बनाते हैं। मैंने उन्हें रंग और अन्य सामग्री उपलब्ध कराई और कहा कि वे घर पर बैठकर भी इस कार्य को आगे बढ़ाएँ। जो बच्चे पेंटिंग में आगे आ रहे हैं, उन्हें परीक्षाओं में शामिल कराइए। इसी प्रकार सभी गतिविधियाँ साथ-साथ चलनी चाहिए। संगीत में भी कई बच्चे अच्छा गायन करते हैं। यदि आप उनकी प्रतिभा को थोड़ा प्रोत्साहन देंगे, तो वे पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी जैसे महान कलाकारों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ सकते हैं। यही हमारी दृष्टि है। इसमें समय की बर्बादी नहीं है। इससे हमें सही दिशा मिलती है कि हमें क्या करना है। इससे परिवार को भी पता चलता है कि उनके बच्चे में कितनी प्रतिभा है। कई बार माता-पिता को भी पता नहीं होता कि उनका बच्चा इतनी सुंदर पेंटिंग बनाता है या इतना अच्छा गायन करता है।डिजिटल क्रांति ने शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन लाया है। स्वयं, दीक्षा, अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स और नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी जैसी पहलों ने ज्ञान को भौगोलिक सीमाओं से मुक्त कर दिया है, आप इनका उपयोग करिए। अब शिक्षा केवल कक्षा-कक्षों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की हथेली तक पहुँच चुकी है।पिछले 12 वर्षों की विकास यात्रा पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत ने अनेक क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है। देश का सकल घरेलू उत्पाद उल्लेखनीय रूप से दोगुना हुआ है, हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी हुई है और विश्वविद्यालयों की संख्या में व्यापक वृद्धि हुई है। भारत आज विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है तथा विश्व की प्रमुख तीव्र गति से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं में चौथा स्थान प्राप्त कर चुका है। यह पिछले 12 वर्षों में हुआ है। सोचिए, किस प्रकार हुआ होगा। जनसहयोग, शिक्षाविदों का सहयोग, शोधकर्ताओं का सहयोग और सरकार के कर्मचारियों का सहयोग, ये सभी मिलकर काम करते हैं, तभी परिणाम ऐसा मिलता है। यह विकास करोड़ों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक भी है। लगभग 25 करोड़ नागरिक गरीबी से बाहर आए हैं। प्रत्येक परिवार तक बैंकिंग सेवाएँ पहुँची हैं। इसी वजह से राज्य सरकार या केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ सीधे बैंक खाते के माध्यम से मिल जाता है और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। आधार पहचान प्रणाली और डिजिटल स्वास्थ्य आईडी जैसी व्यवस्थाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि तकनीक को जनकल्याण का प्रभावी माध्यम बनाया जा सकता है।विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत ने असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। चंद्रयान ने चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर भारत का तिरंगा स्थापित किया है। हम बचपन में अपने बच्चों को चाँद दिखाते हुए कहते थे, चंदा मामा देखो। अब भारत चाँद तक पहुँच रहा है। भारत ने वहाँ अपना तिरंगा स्थापित किया है। आज गगनयान मिशन की तैयारी चल रही है और भारत अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। आप केवल अपने परिवार की ही नहीं, बल्कि समाज की भी आशा हैं। मैं आपसे अपेक्षा करती हूँ कि आप दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता के वाहक बनें।विश्वविद्यालय में इन विषयों पर पहल करें। जहाँ भी अन्याय दिखाई दे, वहाँ मौन दर्शक न बनें, बल्कि परिवर्तन के प्रेरक बनकर खड़े हों। आपकी शिक्षा तभी सार्थक होगी, जब उसका प्रकाश समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगा। मैं आप सभी से एक और आग्रह करना चाहूँगी कि प्रतिदिन समाचार-पत्र पढ़ें, समसामयिक घटनाओं से जुड़े रहें और डिजिटल तकनीक का सकारात्मक एवं रचनात्मक उपयोग करें। ज्ञान का निरंतर विस्तार ही आपको बदलते समय के अनुरूप सक्षम बनाएगा। उन्होने कहा कि मुझे विश्वास है कि यह विश्वविद्यालय आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय उच्च शिक्षा के मानचित्र पर उत्कृष्टता का नया प्रतिमान स्थापित करेगा और सामाजिक उत्तरदायित्व एवं नैतिक नेतृत्व के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।राज्यपाल ने कहा कि आंगनवाड़ी में वर्षों से अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। गर्भवती महिलाओं की देखभाल करना, उन्हें पोषण उपलब्ध कराना, अस्पताल में सुरक्षित प्रसव तक उनकी देखभाल सुनिश्चित करना, ये कार्य हमारी आशा कार्यकर्त्रियाँ करती हैं। तीन वर्ष तक की आयु वाले बच्चों को पोषण उपलब्ध कराना और माताओं को बच्चों की देखभाल के संबंध में जानकारी देना तथा तीन से छह वर्ष की आयु वाले बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र पर बुलाकर पढ़ाना, सिखाना और अनुशासन के साथ बैठना सिखाना, ये सभी कार्य हमारी आंगनवाड़ी कार्यकर्त्रियाँ करती हैं। ऐसा महत्वपूर्ण कार्य करने वाली आंगनवाड़ी कार्यकर्त्रियों के लिए बच्चों को सरलता से सिखाने हेतु शैक्षणिक किट की आवश्यकता होती है, जिसमें बच्चे कुर्सी पर बैठकर मेज पर लिख सकें और उनकी लिखावट सुंदर बन सके। इसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं। आज 500 किट उपलब्ध कराई गई हैं। इनमें 200 किट आजमगढ़, 200 किट मऊ तथा 100 किट विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गई हैं। उन्होने जनपद आजमगढ़ व मऊ के जिलाधिकारियों और पूरी टीम को बधाई दी और कहा कि मैं चाहती हूँ कि जितनी भी आंगनवाड़ी केंद्र अभी शेष हैं, उनके लिए भी निरंतर प्रयास करते रहें और शत-प्रतिशत लक्ष्य पूरा करें। पिछले पाँच-छह वर्षों से मैं इस दिशा में प्रयास कर रही हूँ। अब आप भी इस प्रयास से जुड़ गए हैं और समाज भी इसमें सहभागी बन गया है। इसके माध्यम से लगभग 74,000 आंगनवाड़ी केंद्रों तक ये सामग्री पहुँचाई जा चुकी है। 74,000 आंगनवाड़ी केंद्र कोई छोटी संख्या नहीं है। समाज चाहे तो क्या कार्य कर सकता है, इसका यह उत्तम उदाहरण है।आज 74 विद्यार्थियों को 88 पदक प्रदान किए गए हैं। इनमें ग्रामीण क्षेत्र के 59 विद्यार्थी और शहरी क्षेत्र के 15 विद्यार्थी हैं। यह प्रमाण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी बेटियाँ और बेटे शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। 15,000 माध्यमिक विद्यालयों और 500 महाविद्यालयों में भारत के एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग एवं कॉमिक्स (एवीजीसी) कंटेंट क्रिएटर लैब्स की स्थापना प्रस्तावित है। उन्होने बेटियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित शिक्षा में लड़कियों के नामांकन को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक जिले में एक बालिका छात्रावास स्थापित किया जाना चाहिए। उन्होने कुलपति को निर्देशित किया कि विश्वविद्यालय में जो छात्रावास बन रहा है, उसमें एक छात्रावास ऐसी बेटियों के लिए निर्धारित किया जाए, जो विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं। उन्हें प्रवेश दीजिए और उनके लिए आवश्यक पाठ्यक्रम चलाइए। इससे उनका भविष्य कितना उज्ज्वल बन सकता है। राज्यपाल ने कहा कि उपस्थित छोटे-छोटे, नन्हे-मुन्ने बच्चों ने हमारे बीच कितना सुंदर कार्यक्रम प्रस्तुत किया। मैं उनके शिक्षकों को भी बहुत-बहुत बधाई देती हूँ। ऐसे छोटे-छोटे बच्चों को तैयार करना, उन्हें यहाँ लाना, मंच पर प्रस्तुत करना और उनसे कार्यक्रम कराना बहुत कठिन कार्य होता है,राज्यपाल ने कहा कि छात्रों की अपेक्षा छात्राओं को अधिक उपाधियाँ एवं पदक प्राप्त हुए हैं, जो उच्च शिक्षा में बेटियों की बढ़ती भागीदारी, उनकी प्रतिभा, परिश्रम और दृढ़ संकल्प का सशक्त प्रमाण है। उन्होंने कहा कि यह पूरे समाज के लिए गर्व का विषय है कि हमारी बेटियाँ शिक्षा, शोध, नवाचार और नेतृत्व के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ स्थापित करते हुए विकसित भारत के निर्माण की सशक्त आधारशिला बन रही हैं।उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर भी विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि जब शिक्षा के क्षेत्र में बेटों और बेटियों दोनों को लगभग समान अवसर उपलब्ध हैं, तो छात्रों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई दे रहा है। यह तुलना का नहीं, बल्कि गंभीर अध्ययन और आत्ममंथन का विषय है। हमें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, शैक्षणिक एवं व्यवहारगत कारणों का विश्लेषण कर इस अंतर को समझना और दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे। राज्यपाल जी ने कहा कि बेटियों को शिक्षित करने के लिए माता-पिता भी निरंतर परिश्रम कर रहे हैं। आज का दीक्षोत्सव इसका सशक्त प्रमाण है।राज्यपाल जी ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक उत्कृष्टता, नवाचार तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। राज्यपाल जी ने कहा कि डिजिटल इंडिया अभियान के अनुरूप विश्वविद्यालय द्वारा केंद्रीय पुस्तकालय का आधुनिकीकरण तथा डिजिटल लाइब्रेरी का विस्तार कर विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए ज्ञान-संसाधनों को अधिक सुलभ बनाया गया है।राज्यपाल ने विद्यार्थियों से कहा कि आज दुनिया को उनकी डिग्रियों, तकनीकी दक्षता और नवाचारों की आवश्यकता है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यकत



