11 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पूरी, अरब सागर के तट से हिमालय की ऊंचाइयों तक शिवभक्ति का अद्भुत सफर : संजय पांडेय
The journey of 11 Jyotirlingas is complete, a wonderful journey of Shiva devotion from the shores of the Arabian Sea to the heights of the Himalayas: Sanjay Pandey

भारत की आध्यात्मिक परंपरा में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों का स्थान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित ये ज्योतिर्लिंग भारत की भौगोलिक विविधता, सांस्कृतिक एकता और सदियों पुरानी आध्यात्मिक चेतना के जीवंत प्रतीक हैं। मीडिया और विधि के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त संजय पांडेय ने देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन पूरे कर लिए हैं। अब केवल केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का दर्शन शेष है। संजय पांडेय के लिए यह यात्रा महज मंदिरों के दर्शन की यात्रा नहीं रही, बल्कि भारत को उसके अलग-अलग भूगोल, भाषाओं, संस्कृतियों और जीवनशैली के बीच देखने और महसूस करने का एक अनूठा अनुभव रही है। उनका मानना है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित ज्योतिर्लिंगों तक हजारों किलोमीटर की यात्रा करके पहुंचना अपने आप में कठिन कार्य है। लेकिन जब आस्था मजबूत हो और भोलेनाथ का बुलावा हो, तो रास्ते की कठिनाइयां भी धीरे-धीरे आसान होती चली जाती हैं। घर से हजारों किलोमीटर दूर, लेकिन आस्था में कोई दूरी नहीं
एक ज्योतिर्लिंग से दूसरे ज्योतिर्लिंग तक की यात्रा में कभी समुद्र का विस्तार सामने आता है तो कभी पहाड़ों की कठिन चढ़ाई। कहीं गर्म मौसम और लंबी सड़क यात्रा है तो कहीं भाषा पूरी तरह अपरिचित। इसके बावजूद देश के कोने-कोने से शिवभक्त इन तीर्थस्थलों तक पहुंचते हैं। बातचित में संजय पांडेय ने अपने यात्रा अनुभव के बारे में बताया कि “अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ से लेकर दक्षिण भारत के रामेश्वरम तक और मध्य भारत के महाकाल से लेकर महाराष्ट्र के ज्योतिर्लिंगों तक पहुंचना अपने आप में भारत को समझने जैसा है। अलग-अलग भाषाएं, अलग-अलग खान-पान, अलग-अलग परंपराएं, लेकिन हर जगह एक ही आस्था—हर हर महादेव।”
यात्रा के दौरान यह अनुभव भी सामने आया कि ज्योतिर्लिंगों की शक्ति केवल मंदिर की भव्यता में नहीं, बल्कि वहां पहुंचने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की सामूहिक आस्था में दिखाई देती है। कोई पैदल यात्रा कर रहा है, कोई लंबी रेल यात्रा से पहुंच रहा है, तो कोई कठिन पहाड़ी मार्ग पार कर भगवान शिव के दरबार में हाजिरी लगा रहा है।
सोमनाथ से रामेश्वरम तक—समुद्र के दोनों छोरों पर शिव की अनुभूति। ज्योतिर्लिंग यात्रा के दौरान सोमनाथ और रामेश्वरम का अनुभव विशेष रूप से अलग दिखाई देता है। एक ओर गुजरात के समुद्र तट पर स्थित सोमनाथ, दूसरी ओर तमिलनाडु में समुद्र से घिरा रामेश्वरम। दोनों स्थानों का भूगोल अलग है, भाषा अलग है और सांस्कृतिक परिवेश भी अलग है, लेकिन भगवान शिव के प्रति श्रद्धा दोनों जगह समान दिखाई देती है। इसी तरह गुजरात में स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़े धार्मिक क्षेत्र और आंध्रप्रदेश में स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की यात्रा भारत की सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराने वाली रही। मल्लिकार्जुन की पहाड़ियों और आसपास का प्राकृतिक वातावरण शिवभक्ति को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति देता है। समुद्र किनारे और पर्वत के शिखर में जाकर भोलेनाथ का दर्शन एक अलग ही अनुभूति देता है। वहां का वातावरण ऐसा है मानो यहीं पर बस जाने का मन करने लगता है। महाकाल की नगरी से ओंकारेश्वर तक
उज्जैन का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं और भस्म आरती के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। महाकाल की नगरी में पहुंचते ही वातावरण में एक अलग प्रकार की आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है।
वहीं नर्मदा नदी के तट पर स्थित ओंकारेश्वर में प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम दिखाई देता है। नदी, पहाड़, मंदिर और श्रद्धालुओं की आस्था मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंग और एक ही आस्था। महाराष्ट्र में स्थित त्र्यंबकेश्वर, भीमाशंकर और घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंगों की यात्रा ने भी इस आध्यात्मिक सफर को विशेष बनाया। तीनों ज्योतिर्लिंग अलग-अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश में स्थित हैं, लेकिन तीनों जगह भगवान शिव के प्रति श्रद्धा की समान धारा दिखाई देती है। देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा करने वाले संजय पांडेय के लिए इन यात्राओं का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि उन्हें भारत की वास्तविक विविधता को करीब से देखने का उन्हें अवसर मिला। अलग-अलग भाषाओं के बीच रहना, स्थानीय लोगों से संवाद करना और अलग-अलग परंपराओं को महसूस करना यात्रा को केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव भी बनाता रहा।
ज्योतिर्लिंग यात्रा ने सिखाया भारत की आत्मा उसकी विविधता में है
ल। 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के बाद संजय पांडेय ने कहा कि उनका अनुभव है कि भारत को केवल नक्शे पर देखकर नहीं समझा जा सकता। भारत को समझने के लिए उसकी यात्राओं, तीर्थों, गांवों, शहरों, भाषाओं और लोगों के बीच जाना पड़ता है। ज्योतिर्लिंग यात्रा के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि देश के अलग-अलग राज्यों में हजारों किलोमीटर की दूरी के बावजूद भगवान शिव के प्रति लोगों की आस्था एक समान है। मंदिरों की वास्तुकला अलग है, पूजा की परंपराएं अलग हैं, भाषाएं अलग हैं, लेकिन श्रद्धालुओं की जुबान पर एक ही नाम है—भोलेनाथ।
संजय पांडेय का कहना है कि “ज्योतिर्लिंगों तक पहुंचना केवल इच्छा से संभव नहीं होता। इसके लिए समय, परिस्थितियां और सबसे बढ़कर भोलेनाथ का बुलावा जरूरी है। 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का सौभाग्य मिला है। अब केदारनाथ का बुलावा जब आएगा, तब उस यात्रा को भी पूरा करने का प्रयास होगा।” यह यात्रा इस विश्वास को और मजबूत करती है कि भारत में धर्म केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं है। यह देश की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की वह धारा है, जो हजारों वर्षों से अलग-अलग प्रदेशों और भाषाओं को जोड़ती चली आ रही है।
अरब सागर से लेकर हिमालय तक, नर्मदा से लेकर दक्षिण के समुद्र के हर दिशा में शिव की उपस्थिति का अनुभव इस यात्रा को अविस्मरणीय बना देता है। हर हर महादेव। भोलेनाथ की कृपा सभी पर बनी रहे।



