Jharkhand news:करोड़ों का स्कूल भवन, फिर भी शिक्षा से दूर: चक के सरकारी स्कूल की कहानी पर उठे सवाल

निर्माण पर खर्च हुई सरकारी राशि का हिसाब और भवन के उपयोग नहीं होने की परिस्थितियों की जांच की मांग

संजय पांडेय, वरिष्ट पत्रकार:

सरकारी राशि से ग्रामीण क्षेत्र में बेहतर शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने के उद्देश्य से निर्मित एक स्कूल भवन आज अपने उपयोग की प्रतीक्षा में जर्जर होता जा रहा है। पलामू के चक स्थित उत्क्रमित राजकीयकृत +2 उच्च विद्यालय के भवन की वर्तमान स्थिति ने सरकारी निर्माण योजनाओं की उपयोगिता, निगरानी और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवाल केवल भवन की वर्तमान स्थिति तक सीमित नहीं हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब इस भवन के निर्माण पर सरकारी राशि खर्च की गई थी, तब राशि किस विभाग अथवा योजना से स्वीकृत हुई थी, निर्माण की प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति किस स्तर पर दी गई थी और भवन के पूर्ण होने के बाद इसका शैक्षणिक उपयोग क्यों नहीं हो सका? इन सवालों का जवाब सरकारी अभिलेखों से ही सामने आ सकता है। किस विभाग से आई थी निर्माण की राशि? भवन निर्माण से संबंधित मूल प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, आवंटन पत्र, योजना संख्या और प्राक्कलन की जांच सबसे पहले आवश्यक है। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्माण के लिए राशि किस विभाग के बजट से निर्गत हुई, किस वित्तीय वर्ष में स्वीकृति मिली और निर्माण के लिए कितनी राशि निर्धारित की गई थी। इसके साथ यह भी जांच का विषय है कि निर्माण कार्य किस कार्य एजेंसी को सौंपा गया था, निविदा किस प्रक्रिया से हुई, कार्यादेश कब जारी हुआ और निर्माण पूरा करने की निर्धारित समय-सीमा क्या थी। यदि भवन निर्धारित समय में पूरा हुआ था तो उसके बाद उसे तत्काल विद्यालय संचालन के लिए क्यों नहीं लिया गया। यह भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न है।

 

भवन तैयार हुआ तो स्कूल क्यों नहीं चला? ग्रामीण क्षेत्र में विद्यालय भवन का निर्माण केवल ईंट-पत्थर का ढांचा खड़ा करना नहीं है। इसका उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि भवन के निर्माण के बाद विद्यालय संचालन के लिए आवश्यक शिक्षक, छात्र, फर्नीचर, बिजली, पानी, प्रयोगशाला, शौचालय तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था किस विभाग की जिम्मेदारी थी? यदि भवन में कोई तकनीकी, प्रशासनिक या हस्तांतरण संबंधी समस्या थी तो उसे दूर करने के लिए संबंधित अधिकारियों ने क्या कदम उठाए? और यदि भवन पूरी तरह उपयोग योग्य था, तो उसे नियमित शैक्षणिक गतिविधियों में क्यों नहीं लाया गया?तत्कालीन उपायुक्त की भूमिका भी जांच के दायरे में: जिले में सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों की निगरानी में जिला प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए यह जानना भी जरूरी है कि भवन के निर्माण और उसके बाद की स्थिति की जानकारी जिला प्रशासन को कब हुई। क्या तत्कालीन उपायुक्त अथवा जिला प्रशासन के स्तर पर भवन का निरीक्षण किया गया यदि निरीक्षण हुआ तो उसमें क्या पाया गया? क्या संबंधित विभाग को भवन को विद्यालय संचालन में लाने का निर्देश दिया गया?

क्या भवन के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई थी?

यदि नहीं हुई तो बाधा क्या थी? और यदि भवन हस्तांतरित हो चुका था तो उसका उपयोग क्यों नहीं किया गया? इन प्रश्नों के उत्तर जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग तथा निर्माण एजेंसी के रिकॉर्ड से मिल सकते हैं।

करोड़ों की संपत्ति बिना उपयोग के कैसे बर्बाद हुई?

सरकारी भवन का निर्माण सार्वजनिक धन से होता है। इसलिए निर्माण पूरा होने के बाद उसका उपयोग नहीं होना केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण और सरकारी धन की उपयोगिता का भी प्रश्न है। यदि कोई भवन वर्षों तक बंद रहता है तो उसकी दीवारें, दरवाजे, खिड़कियां, विद्युत व्यवस्था, फर्श और अन्य निर्माण सामग्री धीरे-धीरे खराब होने लगती है। बाद में उसी भवन की मरम्मत पर दोबारा सरकारी राशि खर्च करनी पड़ सकती है। इस स्थिति में मूल निर्माण लागत के साथ-साथ भविष्य में होने वाला मरम्मत खर्च भी सार्वजनिक धन पर अतिरिक्त भार बन सकता है।निर्माण की गुणवत्ता की भी हो जांच: विद्यालय भवन की वर्तमान स्थिति को देखते हुए केवल यह जांच पर्याप्त नहीं होगी कि भवन का उपयोग क्यों नहीं हुआ। यह भी देखा जाना चाहिए कि निर्माण कार्य स्वीकृत प्राक्कलन और तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ था या नहीं।

इसके लिए प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, प्राक्कलन, माप पुस्तिका (Measurement Book), कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र, भुगतान विवरण, गुणवत्ता जांच रिपोर्ट और भवन हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जा सकती है। स्थल निरीक्षण के साथ रिकॉर्ड का मिलान होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण में स्वीकृत राशि का निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप उपयोग हुआ या नहीं। जांच के बाद सामने आए पूरी तस्वीर चक के इस विद्यालय भवन का मामला यह सुनिश्चित करने का है कि जनता के पैसे से बनाई गई संपत्ति जनता और बच्चों के उपयोग में आए। इसलिए जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से अपेक्षा है कि भवन की वर्तमान स्थिति का स्थल निरीक्षण कराकर पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करे।जांच में पांच प्रमुख बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए। निर्माण की प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति किस विभाग/योजना से मिली? कुल कितनी राशि स्वीकृत और खर्च हुई तथा राशि किस वित्तीय वर्ष में निर्गत हुई? निर्माण एजेंसी कौन थी और कार्यादेश एवं पूर्णता की तिथि क्या थी?

भवन तैयार होने के बाद विद्यालय संचालन क्यों शुरू नहीं हुआ और इसके लिए किस स्तर पर निर्णय लंबित रहा? वर्तमान में भवन की स्थिति क्या है और इसे पुनः उपयोग में लाने के लिए कितनी राशि की आवश्यकता होगी? जब इन सवालों के जवाब सरकारी रिकॉर्ड और स्थल जांच के आधार पर सामने आएंगे, तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि करोड़ों की लागत से तैयार सरकारी स्कूल भवन शिक्षा का केंद्र बनने के बजाय उपेक्षा का शिकार कैसे हुआ।

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