Mau News:दस साल से लापता सचिन मौर्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, तीन IPS अधिकारियों की भूमिका की जांच के निर्देश
आजमगढ़ बलरामपुर/पटवध से बबलू राय
दस साल से लापता सचिन मौर्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, तीन IPS अधिकारियों की भूमिका की जांच के निर्देश
54 गवाहों में वर्ष 2023 के बाद केवल दो की पेशी पर अदालत ने जताई नाराजगी, मुख्य सचिव से 16 नवंबर को शपथपत्र के जरिए मांगा जवाब
मऊ। उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में करीब दस साल से लापता छात्र सचिन मौर्य का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। अपने इकलौते बेटे की तलाश में वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे पिता वीरेंद्र मौर्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच में कथित लापरवाही और गवाहों की पेशी में देरी को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने तत्कालीन तीन आईपीएस अधिकारियों अविनाश पांडेय, इलामारन जी. और कमलेश बहादुर के खिलाफ जांच के निर्देश दिए हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव एसपी गोयल को 16 नवंबर को शपथपत्र के साथ मामले की प्रगति की जानकारी देने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से लंबे समय से अपने बेटे की राह देख रहे परिवार को न्याय की नई उम्मीद जगी है।
मामला 27 सितंबर 2017 का है। मऊ जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर सरायलखंसी थाना क्षेत्र के बुढ़ावे गांव निवासी सचिन मौर्य उस दिन पहसा स्थित कोचिंग सेंटर जाने के लिए घर से निकला था। लेकिन इसके बाद वह न तो कोचिंग सेंटर पहुंचा और न ही घर वापस लौटा। काफी देर तक बेटे के नहीं लौटने पर परिजनों की चिंता बढ़ गई। परिवार के लोगों ने कोचिंग सेंटर पहुंचकर जानकारी की तो पता चला कि सचिन वहां पहुंचा ही नहीं था।
इसके बाद परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की और अपहरण की आशंका जताते हुए पुलिस को सूचना दी। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद परिवार को उम्मीद थी कि पुलिस जल्द ही सचिन का पता लगा लेगी, लेकिन समय बीतने के साथ यह उम्मीद इंतजार में बदलती चली गई। वर्षों गुजर जाने के बावजूद परिवार को बेटे के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी।
सचिन के पिता वीरेंद्र मौर्य मऊ सदर तहसील में अमीन के पद पर कार्यरत हैं। परिवार में पत्नी और एक बेटी के साथ सचिन उनका इकलौता बेटा है। बेटे के अचानक लापता होने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पिता का आरोप है कि शुरुआती दौर में पुलिस ने मामले को उस गंभीरता से नहीं लिया, जिसकी जरूरत थी।
अपने बेटे का पता लगाने और न्याय की मांग को लेकर वीरेंद्र मौर्य ने लगातार अधिकारियों और न्यायालयों के दरवाजे खटखटाए। वर्ष 2025 में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की थी। हालांकि, पुलिस की ओर से आरोपपत्र दाखिल किए जाने का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
मामले की सुनवाई के दौरान गवाहों की पेशी में देरी का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2023 के बाद 54 गवाहों में से केवल दो को ही पेश किया जा सका। इस स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि वर्ष 2023 के बाद मामले में क्या कार्रवाई की गई और सुनवाई की प्रगति इतनी धीमी क्यों रही।
लंबे समय से लंबित मामले और गवाहों की पेशी में देरी को देखते हुए अदालत ने संबंधित पहलुओं की जांच के निर्देश दिए हैं। साथ ही मुख्य सचिव एसपी गोयल से 16 नवंबर को शपथपत्र के माध्यम से जानकारी मांगी गई है, ताकि मामले की स्थिति और अब तक हुई कार्रवाई का विवरण सामने आ सके।
तीन तत्कालीन आईपीएस अधिकारियों की भूमिका की होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत तत्कालीन आईपीएस अधिकारियों अविनाश पांडेय, इलामारन जी. और कमलेश बहादुर की भूमिका की जांच किए जाने की जानकारी सामने आई है। इन अधिकारियों के कार्यकाल के दौरान मामले से संबंधित कार्रवाई और जांच की प्रगति को लेकर उठे सवालों की पड़ताल की जाएगी।
हालांकि, जांच के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आरोप साबित हो चुके हैं। उनकी भूमिका, जिम्मेदारी और किसी संभावित लापरवाही का निर्धारण जांच के निष्कर्षों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।
पिता की भावुक अपील—हमें मुकदमा और जेल नहीं, अपना बच्चा चाहिए
करीब एक दशक से बेटे की तलाश में भटक रहे वीरेंद्र मौर्य के लिए यह लड़ाई केवल अदालतों में न्याय पाने तक सीमित नहीं है। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है कि आखिर उनका बेटा कहां है और उसके साथ क्या हुआ।
अपना दर्द बयां करते हुए वीरेंद्र मौर्य ने कहा, “हमें मुकदमा और जेल नहीं, अपना बच्चा चाहिए।”
एक पिता की यह पुकार उस पीड़ा को बयां करती है, जिसे उनका परिवार वर्षों से झेल रहा है। परिवार की इच्छा है कि सचिन के लापता होने की गुत्थी सुलझे और उसके बारे में सच्चाई सामने आए। परिजनों का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने बेटे का पता लगाना है।
दस साल बाद भी बरकरार है बेटे के लौटने का इंतजार
सचिन मौर्य के लापता होने की घटना को करीब दस साल बीत चुके हैं, लेकिन परिवार की उम्मीद अब भी कायम है। पिता आज भी अपने बेटे के बारे में किसी ठोस जानकारी का इंतजार कर रहे हैं। समय के साथ परिवार की बेचैनी और सवाल दोनों बढ़ते गए हैं, लेकिन सचिन का पता नहीं चल सका है।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब मामले की जांच, गवाहों की पेशी में हुई देरी और तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर नजर रहेगी। अदालत के निर्देशों से मामले में आगे की कार्रवाई को लेकर उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन परिवार को वास्तविक राहत तभी मिलेगी, जब सचिन के लापता होने का रहस्य सुलझेगा।
एक पिता की वर्षों पुरानी आस आज भी अपने बेटे की राह देख रही है। परिवार के लिए न्याय का मतलब सिर्फ मुकदमे का आगे बढ़ना नहीं, बल्कि उस सवाल का जवाब मिलना है, जो पिछले करीब दस वर्षों से उन्हें परेशान कर रहा है—आखिर सचिन मौर्य कहां है और उसके साथ क्या हुआ?



