Jharkhand News: रेत का खेल: नदियां खोखली, खजाना खाली और मध्यम वर्ग का सपना अधूरा! आखिर आम आदमी का घर बनेगा कैसे?

Jharkhand News: Sand Game: Rivers are hollow, the treasury is empty, and the middle class's dreams are unfulfilled! How will the common man finally build his home?

संजय पांडेय की कलम से

झारखंड में अवैध रेत खनन के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई लगातार जारी है। ट्रैक्टर जब्त हो रहे हैं, घाट बंद हो रहे हैं और छापेमारी भी हो रही है। लेकिन इस पूरी लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसकी कीमत कौन चुका रहा है? इसका जवाब है मध्यम वर्ग और गरीब परिवार। एक ओर सरकार अवैध खनन रोकना चाहती है, दूसरी ओर वैध रेत की उपलब्धता इतनी सीमित हो गई है कि आम लोगों के लिए घर बनाना मुश्किल होता जा रहा है। जिन परिवारों ने वर्षों की कमाई जोड़कर दो कमरों का घर बनाने का सपना देखा था, उनके बजट पर रेत, गिट्टी और सीमेंट की बढ़ती कीमतों ने बड़ा आघात पहुंचाया है।

 

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10 लाख का मकान अब 15 लाख में निर्माण हो रहा है। क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में निर्माण सामग्री की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। सबसे अधिक असर रेत की उपलब्धता और कीमत पर पड़ा है। पलामू, गढ़वा, चतरा, हजारीबाग और रांची सहित कई जिलों में लोगों का कहना है कि रेत की कमी के कारण निर्माण कार्य महीनों तक रुके रहते हैं। कई बार वैध चालान वाली रेत समय पर नहीं मिलती, जबकि अवैध बाजार में ऊंचे दाम पर सामग्री उपलब्ध रहती है। परिणाम यह है कि जो मकान 10 लाख रुपये में बनने की उम्मीद थी, उसकी लागत 14 से 15 लाख रुपये तक पहुंच रही है।
वहीं, अवैध खनन पर रोक जरूरी है। नदियों का संरक्षण भी आवश्यक है। लेकिन यदि वैध व्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को होगा। वर्तमान स्थिति में तीन वर्ग प्रभावित हो रहे हैं- मकान बनाने वाले मध्यम वर्गीय परिवार, निर्माण कार्य से जुड़े मजदूर और
छोटे ठेकेदार और स्थानीय व्यवसायी। जब निर्माण गतिविधियां धीमी पड़ती हैं तो रोजगार पर भी असर पड़ता है।
आखिर समस्या कहां है?
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों से बातचीत में कुछ प्रमुख समस्याएं सामने आती हैं. वैध रेत घाटों की संख्या सीमित है। कई घाटों पर समय पर नीलामी नहीं हो पाता है। कारण है पर्यावरणीय स्वीकृतियों में देरी का होना। ऑनलाइन व्यवस्था और जमीनी उपलब्धता में अंतर का होना, अवैध कारोबारियों का सक्रिय नेटवर्क और मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर का होना।

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आखिर समाधान क्या हो सकता है?
सिर्फ कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार और प्रशासन को समानांतर रूप से वैध आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
वैध घाटों का शीघ्र संचालन करना होगा। झारखंड में रेत संकट का सबसे बड़ा कारण वैध घाटों का समय पर संचालन नहीं होना है। कई जिलों में पर्यावरणीय स्वीकृति, नीलामी प्रक्रिया, तकनीकी अनुमोदन और प्रशासनिक औपचारिकताओं में महीनों की देरी होती है। इसका सीधा लाभ अवैध कारोबारियों को मिलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जिन घाटों को पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त हो चुकी है, उनकी नीलामी और संचालन के लिए निश्चित समय-सीमा तय की जानी चाहिए। यदि एक घाट बंद होता है तो उसके स्थान पर वैकल्पिक घाट की व्यवस्था भी पहले से तैयार रहनी चाहिए। इससे बाजार में रेत की नियमित उपलब्धता बनी रहेगी और कृत्रिम कमी पैदा नहीं होगी। रेत की ऑनलाइन ट्रैकिंग सुनिश्चित करनी होगी। वर्तमान में कई बार खनन स्थल से निकलने वाली रेत की वास्तविक मात्रा और बाजार तक पहुंचने वाली मात्रा में बड़ा अंतर दिखाई देता है। इससे राजस्व की हानि होती है और अवैध परिवहन को बढ़ावा मिलता है। इसके समाधान के लिए प्रत्येक वाहन में जीपीएस आधारित ट्रैकिंग प्रणाली अनिवार्य की जा सकती है। ई-चालान को वाहन नंबर और जीपीएस लोकेशन से जोड़ा जाए। जिला प्रशासन, खनन विभाग और पुलिस के लिए एकीकृत डिजिटल डैशबोर्ड विकसित किया जाए, जहां रियल टाइम निगरानी संभव हो। यदि किसी वाहन का मार्ग निर्धारित रूट से अलग पाया जाता है तो तत्काल अलर्ट जारी हो। इससे अवैध खनन और परिवहन पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा। आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि रेत की कीमतें बाजार की वास्तविक स्थिति से अधिक कृत्रिम कमी और बिचौलियों के प्रभाव से तय हो रही हैं। एक ही जिले में अलग-अलग क्षेत्रों में रेत की कीमतों में भारी अंतर देखने को मिलता है।
राज्य सरकार को प्रत्येक जिले के लिए परिवहन लागत, खनन लागत और उचित लाभ को ध्यान में रखते हुए अधिकतम खुदरा मूल्य (Maximum Retail Price) निर्धारित करना चाहिए। इस मूल्य सूची को सार्वजनिक पोर्टल, पंचायत भवनों और जिला कार्यालयों में प्रदर्शित किया जाए।
यदि कोई विक्रेता निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई हो। इससे आम उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी और बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी। एम-सैंड (Manufactured Sand) को बढ़ावा देना होगा। प्राकृतिक नदियों से लगातार रेत निकालना पर्यावरणीय दृष्टि से दीर्घकालिक समाधान नहीं है। इसलिए वैकल्पिक निर्माण सामग्री को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
एम-सैंड पत्थरों को क्रश कर वैज्ञानिक तरीके से तैयार की जाती है और देश के कई राज्यों में इसका सफल उपयोग हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार गुणवत्तापूर्ण एम-सैंड कई निर्माण कार्यों में प्राकृतिक रेत का प्रभावी विकल्प बन सकती है।
झारखंड में सरकार निजी निवेशकों को प्रोत्साहन, सब्सिडी और तकनीकी सहायता देकर एम-सैंड इकाइयों की स्थापना को बढ़ावा दे सकती है। इससे रोजगार भी बढ़ेगा और नदियों पर दबाव भी कम होगा। ग्रामसभा की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। अवैध खनन को रोकने में स्थानीय समुदाय सबसे प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। गांव के लोग सबसे पहले यह देख पाते हैं कि कब और कहां अवैध गतिविधियां हो रही हैं। यदि ग्रामसभाओं को कानूनी अधिकार, सूचना तंत्र और निगरानी में भागीदारी दी जाए तो अवैध खनन पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। ग्राम स्तरीय निगरानी समितियों का गठन किया जा सकता है, जिनमें ग्रामीण, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक प्रतिनिधि शामिल हों।
इसके अलावा खनन से प्राप्त राजस्व का एक हिस्सा स्थानीय विकास कार्यों में खर्च किया जाए, ताकि ग्रामीणों को भी संरक्षण और निगरानी में रुचि हो। निर्माण सामग्री बैंक की स्थापना जरूरी है।प्रधानमंत्री आवास योजना, अबुआ आवास योजना तथा अन्य सरकारी आवास योजनाओं के लाभुक अक्सर निर्माण सामग्री की बढ़ती कीमतों से परेशान रहते हैं। कई बार मकान निर्माण कार्य केवल इसलिए अधूरा रह जाता है क्योंकि लाभार्थी बाजार से महंगी सामग्री खरीदने में सक्षम नहीं होता।
इसके समाधान के लिए जिला स्तर पर “निर्माण सामग्री बैंक” स्थापित किए जा सकते हैं। यहां रेत, गिट्टी, ईंट और अन्य आवश्यक सामग्री नियंत्रित दरों पर उपलब्ध कराई जाए। सरकार सीधे खनन कंपनियों, आपूर्तिकर्ताओं और सहकारी समितियों के माध्यम से सामग्री उपलब्ध करवा सकती है। इससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को राहत मिलेगी तथा सरकारी आवास योजनाओं का क्रियान्वयन भी तेज होगा। झारखंड मैं प्राकृतिक धरोहरों को बचाने के लिए अवैध खनन रोकना आवश्यक है, लेकिन केवल दमनात्मक कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। जब तक वैध आपूर्ति, तकनीकी निगरानी, मूल्य नियंत्रण, वैकल्पिक संसाधनों का विकास, स्थानीय भागीदारी और आम नागरिकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर समग्र नीति नहीं बनाई जाती, तब तक रेत संकट और मकान निर्माण की समस्या बनी रहेगी। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती नदियों के संरक्षण और आम नागरिक के आवासीय अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की है। यही संतुलन झारखंड के सतत विकास का आधार बन सकता है। यदि वैध आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई तो मध्यम वर्ग के लाखों परिवारों का अपना घर बनाने का सपना अधूरा रह जाएगा। सरकार को नदियों की सुरक्षा और नागरिकों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा। विकास और पर्यावरण दोनों साथ चल सकते हैं, बशर्ते नीति स्पष्ट हो, व्यवस्था पारदर्शी हो और आम आदमी केंद्र में हो। आज सवाल सिर्फ रेत का नहीं है, सवाल उस आम नागरिक का है जो जिंदगी भर की कमाई से अपने परिवार के लिए एक छोटा सा घर बनाना चाहता है। (लेखक झारखंड राज्य के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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