Jharkhand News: तालाबों-आहारों के अतिक्रमण व जल छाजन योजनाओं में बरती गई अनियमितता का परिणाम है जल संकट
मॉनसून के दौरान नदियों में करोड़ों लीटर पानी बहकर निकल जाता है, लेकिन पलामू प्यासा रह जाता है
पारंपरिक जल स्रोतों को बचाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां पानी की हर बूंद के लिए तरसेंगी
कागजों पर बह गया पलामू का पानी; तालाबों पर कब्जा, नदियों की उपेक्षा
मधुलता पांडेय मुख्य संवाददाता
झारखंड का पलामू प्रमंडल जो लंबे समय से सुखाड़ की त्रासदी झेलता आ रहा है। यह त्रासदी सिर्फ कुदरत की देन नहीं होकर प्रशासनिक उदासीनता और फाइलों में तैरती विकास योजनाओं का एक परिणाम है जिस कारण पारंपरिक जल स्रोतों को सुखा कर रख दिया है। झारखंड राज्य गठन के 25 साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी पलामू की प्यास जस की तस है। पारंपरिक जल स्रोतों, तालाबों के अतिक्रमण और सरकारी दावों की जमीनी हकीकत की पड़ताल जरूरी है ताकि मुख्य बातें सामने आ सके।
पलामू की जीवन रेखा कहे जाने वाले पारंपरिक आहार, पोखर और तालाब आज भू-माफियाओं के निशाने पर हैं। यह अतिक्रमण कोई एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि एक सोची-समझी प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे किया जा रहा है:
सोर्स को सुखाना सबसे पहले तालाब या आहार में आने वाले पानी के रास्तों (कैचमेंट एरिया और डैमूर) को अवरुद्ध किया जाता है। जब पानी आना बंद हो जाता है, तो तालाब का एक हिस्सा सूखने लगता है।
सूखे हुए हिस्से में शहर या गांव का कचरा और मलबे (फ्लाइऐश और मिट्टी) को डालना शुरू किया जाता है, ताकि वह जमीन समतल दिखने लगे। वहीं पुराने जल स्रोतों की प्रकृति (नेचर ऑफ लैंड) को कागजों पर बदलवाने या उसे ‘गैर-मजरूआ’ दिखाकर रसीद कटवाने का खेल खेला जाता है। इवेबकैसे अंजाम दिया जाता है यह बताने की जरूरत नहीं है।
जैसे ही जमीन समतल हुई, वहां पहले चहारदीवारी खड़ी होती है, फिर देखते ही देखते आलीशान मकान या व्यावसायिक परिसर खड़े हो जाते हैं। पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर से लेकर प्रखंड मुख्यालयों तक, दर्जनों ऐसे तालाब हैं जो आज सिर्फ सरकारी नक्शों में दर्ज हैं, जमीन पर वहां गगनचुंबी इमारतें हैं। पलामू से होकर कोयल, अमानत, सोन जैसी नदियां गुजरती हैं। मॉनसून के दौरान इन नदियों में करोड़ों लीटर पानी बहकर निकल जाता है, लेकिन पलामू प्यासा रह जाता है। सवाल उठता है कि इन नदियों पर बड़े और प्रभावी बांध या बराज क्यों नहीं बनाए जा रहे हैं? बड़े बांध या बराज बनाने में भारी बजटीय आवंटन, तकनीकी सर्वे और विस्थापन की समस्या होती है। इसके विपरीत, छोटे-छोटे चेकडैम बनाने में प्रशासनिक स्वीकृति आसान होती है। नतीजा यह है कि हर साल करोड़ों रुपये के छोटे चेकडैम बनते हैं, जो पहली ही बारिश में बह जाते हैं। सोन और उत्तरी कोयल जैसी नदियों पर कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट बिहार और केंद्र सरकार के समन्वय के बिना संभव नहीं है। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ‘मंडल डैम’ (उत्तर कोयल परियोजना) जैसी योजनाएं दशकों तक लटकी रहीं।
नदियों को खुला छोड़ने से बालू माफियाओं को फायदा होता है। अगर नदियों पर सही तरीके से बराज या वाटर लिफ्टिंग सिस्टम बना दिया जाए, तो न केवल सिंचाई होगी बल्कि जलस्तर भी सुधरेगा, लेकिन ऐसा करने में किसी की रुचि नहीं दिखती।
झारखंड अलग राज्य बनने के बाद पलामू में ‘जल छाजन परियोजना’ के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया गया। अरबों रुपये के बजट से गांवों में डोभा, आहार, और पोखर खोदने के दावे किए गए।
कड़वा सच: आज अगर पलामू के गांवों का दौरा किया जाए, तो कागजों पर दर्ज 80% आहार और पोखर धरातल पर ढूंढने से भी नहीं मिलते।
जेसीबी मशीनों से आनन-फानन में गड्ढे खोदे गए, जिन्हें सरकारी कागजों में ‘तालाब’ का नाम देकर भुगतान उठा लिया गया।
रखरखाव के अभाव में ये डोभा पहली ही बारिश में मिट्टी से भर गए। जल छाजन समितियों के जरिए हुआ यह काम पलामू के इतिहास के सबसे बड़े ‘कागजी विकास’ के रूप में याद किया जाएगा, जहां पैसे तो बहे पर पानी की एक बूंद नहीं रुकी।
राज्य के शुरुआती दौर (2000 के दशक के शुरुआती वर्षों) में पलामू के खेतों की सूरत बदलने के लिए लिफ्ट इरिगेशन/लिफ्ट सिंचाई) योजना को बड़े पैमाने पर अमलीजामा पहनाया गया था। नदियों और जलाशयों से पाइपलाइन के जरिए ऊंचे खेतों तक पानी पहुंचाने की यह एक बेहतरीन महत्वाकांक्षी योजना थी। शुरुआत में तो कुछ इलाकों के खेतों में पानी पहुंचा और किसानों के चेहरे खिले। लेकिन जैसे ही सरकारी अमला और ठेकेदार पीछे हटे, योजना दम तोड़ गई। विफलता के कारणों मैं कहीं बिजली के ट्रांसफार्मर चोरी हो गए, कहीं मोटर जल गई, तो कहीं पाइपलाइन फट गई। सबसे बड़ी बात कि इन ‘लिट’ परियोजनाओं के संचालन की जिम्मेदारी स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों या कृषक समितियों को सही ढंग से हैंडओवर नहीं की गई। आज पलामू के सैकड़ों गांवों में इस योजना के तहत लगे पंप हाउस खंडहर बन चुके हैं और पाइपलाइनें जमीन के नीचे दफन होकर कबाड़ में तब्दील हो चुकी हैं। इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
निष्कर्ष और समाधान का रास्ता
पलामू को सुखाड़ से बचाना है तो सिर्फ कागजी योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा। प्रशासन को सबसे पहले एक ‘क्रैश प्लान’ लाना होगा:
तालाबों का सीमांकन: पलामू के सभी पुराने तालाबों और आहारों का डिजिटल नक्शा तैयार कर उनका सीमांकन हो और अतिक्रमणकारियों पर ‘बुलडोजर’ की कार्रवाई हो।
नदियों का चैनलाइजेशन: अमानत और कोयल नदी पर जगह-जगह रबर डैम या बराज बनाकर पानी रोका जाए।
जल छाजन और ‘लिट’ योजना के तहत हुए कार्यों का एक उच्चस्तरीय फॉरेंसिक और फिजिकल ऑडिट हो, ताकि जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वाले चेहरों को बेनकाब किया जा सके।
अगर अब भी पलामू के पारंपरिक जल स्रोतों को बचाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां पानी की हर बूंद के लिए तरसेंगी और पलायन ही यहाँ की नियति बनकर रह जाएगा। (लेखिका आइडियल पत्रकार संगठन महिला सेल की झारखंड अध्यक्ष हैं)



