एक जमीन, कई दावेदार: पलामू में जमीन के रिकॉर्ड का उलझता जाल
रजिस्ट्री के बाद भी म्यूटेशन की जद्दोजहद, ऑनलाइन रिकॉर्ड में किसी और का नाम देख परेशान हो रहे ग्रामीण

संजय पांडेय वरिष्ट पत्रकार की विशेष रिपोर्ट:
झारखंड राज्य के पलामू में जमीन से जुड़े मामलों की जटिलता अब केवल खेत-खलिहान और सीमांकन तक सीमित नहीं रह गई है। जमीन की खरीद के बाद रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज यानी म्यूटेशन और ऑनलाइन भू-अभिलेखों में दर्ज नामों के बीच अंतर ने बड़ी संख्या में लोगों के सामने नई परेशानी खड़ी कर दी है। कई ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास जमीन की वैध रजिस्ट्री का दस्तावेज यानी केवाला मौजूद है, लेकिन जब ऑनलाइन रिकॉर्ड में जमीन की स्थिति देखी जाती है तो उसी जमीन पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज दिखाई देता है।
सबसे गंभीर सवाल उन मामलों को लेकर है, जिनमें एक ही जमीन की अलग-अलग समय पर दूसरी अथवा तीसरी रजिस्ट्री होने का दावा सामने आता है। ग्रामीणों के सामने स्वाभाविक सवाल है जब जमीन पहले ही किसी व्यक्ति के नाम रजिस्टर्ड हो चुकी थी, तो उसी जमीन की दूसरी रजिस्ट्री कैसे हुई? और यदि बाद की रजिस्ट्री हुई, तो संबंधित रिकॉर्ड की जांच किस स्तर पर हुई?
ऑनलाइन व्यवस्था से पहले के अभिलेखों का असर
पलामू में जमीन के पुराने मामलों को समझने के लिए उस दौर को भी देखना होगा जब जमीन के रिकॉर्ड और रजिस्ट्री से जुड़ी सूचनाएं आज की तरह डिजिटल रूप में आसानी से उपलब्ध नहीं थीं। पुराने कागजी अभिलेख, रजिस्टर-II, खतियान, जमाबंदी, बिक्री दस्तावेज और अन्य राजस्व रिकॉर्ड अलग-अलग स्तरों पर रखे जाते थे। ऐसे मामलों में यदि किसी जमीन का पुराना रिकॉर्ड समय पर अद्यतन नहीं हुआ, या अलग-अलग अभिलेखों में प्रविष्टियां एक-दूसरे से मेल नहीं खाती रहीं, तो बाद में विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है। ऑनलाइन व्यवस्था आने के बाद समस्या का एक दूसरा पक्ष सामने आया। पुराने रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में दर्ज करने की प्रक्रिया में यदि कहीं नाम, खाता, प्लॉट, रकबा अथवा जमाबंदी संबंधी प्रविष्टि में अंतर रह गया हो, तो ऑनलाइन रिकॉर्ड देखने वाला व्यक्ति उसे वर्तमान स्थिति मान सकता है, जबकि उसके पास पुराने कागजी दस्तावेज अलग तस्वीर प्रस्तुत कर रहे होते हैं।
केवाला हाथ में, फिर भी म्यूटेशन नहीं: पलामू के ग्रामीण इलाकों में ऐसे लोग भी मिलते हैं जो वर्षों पहले जमीन खरीदने और रजिस्ट्री कराने के बाद दाखिल-खारिज की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं। उनकी शिकायत का स्वरूप लगभग एक जैसा है “हमारे पास रजिस्ट्री का केवाला है, लेकिन म्यूटेशन नहीं हुआ। स्थिति तब और पेचीदा हो जाती है जब ऑनलाइन रिकॉर्ड की जांच करने पर उसी जमीन पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज मिलता है। ऐसे में जमीन खरीदने वाला व्यक्ति यह समझ नहीं पाता कि उसके दस्तावेज सही हैं या ऑनलाइन रिकॉर्ड। यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है। जमीन का रिकॉर्ड बैंक ऋण, बिक्री, उत्तराधिकार, सरकारी योजनाओं, भूमि उपयोग और न्यायिक विवादों सहित कई मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए रिकॉर्ड में असंगति किसी परिवार के लिए वर्षों तक चलने वाली परेशानी बन सकती है। सबसे बड़ा सवाल—एक जमीन की दूसरी रजिस्ट्री कैसे? जमीन विवादों के सबसे गंभीर पहलुओं में से एक कथित डबल या मल्टीपल रजिस्ट्री है। सैद्धांतिक रूप से किसी संपत्ति के हस्तांतरण से पहले उसके स्वामित्व और संबंधित दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होती है। लेकिन यदि किसी पुराने दस्तावेज की जानकारी वर्तमान रिकॉर्ड में सही तरीके से परिलक्षित नहीं है, तो विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है।
यहीं से कई सवाल उठते हैं कि क्या पहले से रजिस्टर्ड जमीन का रिकॉर्ड संबंधित अभिलेखों में सही तरीके से दर्ज था? क्या बाद में उसी जमीन के संबंध में प्रस्तुत दस्तावेजों की पूर्ववर्ती रिकॉर्ड से पर्याप्त जांच हुई?
क्या खाता, प्लॉट संख्या, रकबा और चौहद्दी का मिलान किया गया?
क्या रजिस्ट्री के बाद म्यूटेशन नहीं होने से रिकॉर्ड में पुरानी स्थिति बनी रही?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यदि एक व्यक्ति के नाम जमीन की वैध रजिस्ट्री हो चुकी थी, तो उसी जमीन के संबंध में बाद में दूसरे व्यक्ति के पक्ष में दस्तावेज कैसे पंजीकृत हुआ? इन सवालों का जवाब किसी एक विभाग या एक अधिकारी के स्तर पर नहीं, बल्कि रजिस्ट्री रिकॉर्ड, राजस्व रिकॉर्ड, जमाबंदी, म्यूटेशन और संबंधित दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला की जांच से ही मिल सकता है। रजिस्ट्री और म्यूटेशन एक ही चीज नहीं
जमीन विवाद को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। रजिस्ट्री और म्यूटेशन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
रजिस्ट्री मुख्य रूप से संपत्ति के हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेज के पंजीकरण की प्रक्रिया है, जबकि म्यूटेशन और दाखिल-खारिज राजस्व अभिलेखों में नए धारक का नाम दर्ज करने की प्रक्रिया है। इसी अंतर को लेकर आम लोगों में भ्रम भी दिखाई देता है। कई लोग मानते हैं कि रजिस्ट्री होते ही राजस्व रिकॉर्ड में नाम अपने आप बदल जाएगा। व्यवहार में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया और संबंधित राजस्व रिकॉर्ड का अद्यतन भी आवश्यक होता है।
यही वह स्थान है जहां रजिस्ट्री हो जाने के बावजूद म्यूटेशन लंबित रहने से आगे चलकर विवाद की जमीन तैयार हो सकती है।
ऑनलाइन रिकॉर्ड सुविधा भी, चुनौती भी
ऑनलाइन भू-अभिलेखों ने आम नागरिकों को रिकॉर्ड देखने की सुविधा दी है। अब व्यक्ति घर बैठे खाता, प्लॉट और अन्य उपलब्ध विवरणों की जांच कर सकता है।
लेकिन ऑनलाइन रिकॉर्ड तभी प्रभावी समाधान बन सकता है जब उसमें उपलब्ध जानकारी पुराने मूल अभिलेखों के अनुरूप, अद्यतन और त्रुटिरहित हो।
यदि कागजी रिकॉर्ड और डिजिटल रिकॉर्ड में अंतर है, तो ग्रामीण के लिए समस्या और बढ़ जाती है। वह यह तय नहीं कर पाता कि किस रिकॉर्ड को अंतिम आधार माना जाए और सुधार के लिए किस कार्यालय में जाए। इसलिए डिजिटल रिकॉर्ड बनाने के साथ-साथ रिकॉर्ड वेरिफिकेशन और करेक्शन की मजबूत व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
कैसे सुधरेगा पलामू का जमीन मामला?
पलामू में जमीन संबंधी विवादों को कम करने के लिए केवल ऑनलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए चरणबद्ध तरीके से काम करने की आवश्यकता है। सबसे पहले पुराने कागजी राजस्व रिकॉर्ड और वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड का मिलान कराया जाना चाहिए। जिन खातों और प्लॉटों को लेकर लगातार शिकायतें आ रही हैं, उनकी विशेष जांच हो।
दूसरा, जिन जमीनों के संबंध में एक से अधिक रजिस्ट्री की शिकायत है, उनके दस्तावेजों की क्रमवार जांच हो पहली रजिस्ट्री कब हुई, किसके नाम हुई, किस खाता-प्लॉट और रकबे की हुई तथा उसके बाद दूसरा दस्तावेज किस आधार पर पंजीकृत हुआ। तीसरा, रजिस्ट्री और म्यूटेशन के बीच सूचना के आदान-प्रदान को और मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि जमीन हस्तांतरण के बाद संबंधित राजस्व रिकॉर्ड समय पर अद्यतन हो। चौथा, ग्रामीणों के लिए एकल शिकायत और समाधान प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, जहां व्यक्ति रजिस्ट्री, म्यूटेशन और ऑनलाइन रिकॉर्ड में अंतर की शिकायत एक ही स्थान पर दर्ज करा सके। पांचवां, जिन मामलों में पुराने रिकॉर्ड और ऑनलाइन रिकॉर्ड में अंतर है, वहां रिकॉर्ड करेक्शन के लिए समयबद्ध प्रक्रिया होनी चाहिए। आम नागरिक को महीनों और वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने की स्थिति से बाहर निकालना होगा।
रिकॉर्ड साफ होगा तो विवाद भी घटेंगे: जमीन किसी भी परिवार की सबसे बड़ी संपत्तियों में से एक होती है। इसलिए जमीन के रिकॉर्ड में एक छोटी-सी गलती भी परिवारों के लिए गंभीर विवाद का कारण बन सकती है। ग्रामीण के पास रजिस्ट्री का दस्तावेज हो और सरकारी ऑनलाइन रिकॉर्ड में किसी दूसरे का नाम हो, तो यह स्थिति केवल उस व्यक्ति की परेशानी नहीं बल्कि भूमि प्रशासन की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन जाती है।
पलामू में जमीन के पुराने और नए रिकॉर्ड को एक-दूसरे से जोड़कर देखने की जरूरत है। जहां गलती है, वहां सुधार हो; जहां डबल रजिस्ट्री का आरोप है, वहां दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हो; जहां म्यूटेशन लंबित है, वहां कारण स्पष्ट किया जाए और जहां रिकॉर्ड सही है, वहां नागरिक को उसका स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध कराया जाए। जमीन का विवाद तभी कम होगा जब जमीन का रिकॉर्ड साफ, पारदर्शी, अद्यतन और आसानी से सत्यापित होने योग्य होगा। आज पलामू के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है किनजमीन किसकी है? से पहले यह सुनिश्चित कैसे हो कि सरकारी रिकॉर्ड में जमीन की सही कहानी दर्ज है? और जब एक ही जमीन के लिए दो या तीन दावेदार सामने आते हैं, तो समाधान केवल अदालत के वर्षों पुराने विवाद में नहीं, बल्कि रिकॉर्ड तैयार करने से लेकर रजिस्ट्री और म्यूटेशन तक पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने में भी तलाशना होगा।



