समुद्र से हिमालय तक: 11 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में दिखा भारत का विराट रूप: संजय पांडेय
मंदिरों से आगे, भारत की तलाश: 11 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा और अब बाबा केदार का इंतजार
संजय पांडेय वरिष्ठ पत्रकार।
भारत को केवल नक्शे पर देखकर समझना संभव नहीं है। भारत को समझने के लिए उसकी सड़कों पर चलना पड़ता है, उसके गांवों और शहरों से गुजरना पड़ता है, उसके मंदिरों और तीर्थों में पहुंचना पड़ता है और सबसे बढ़कर उसके लोगों की आस्था को करीब से देखना पड़ता है। एक पत्रकार के रूप में तीन दशकों से अधिक समय से देश के अलग-अलग हिस्सों को देखने और समझने का अवसर मिला है। लेकिन 12 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा का अनुभव कुछ अलग है।
यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं है। यह भारत के भूगोल, इतिहास, संस्कृति और लोकविश्वास को एक साथ देखने की यात्रा है। अब तक 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का सौभाग्य मिला । इस यात्रा में गुजरात के समुद्र तट से लेकर तमिलनाडु के रामेश्वरम्, महाराष्ट्र की सह्याद्रि पहाड़ियों से मध्य भारत की नर्मदा और उज्जैन, झारखंड के देवघर से वाराणसी और दक्षिण के श्रीशैलम तक पहुंचने का अवसर मिला।
अब इस यात्रा का केवल एक पड़ाव बाकी है केदारनाथ।
और शायद यही इस यात्रा को अभी अधूरा भी रखता है और रोमांचक भी। पहला अनुभव सोमनाथ
अरब सागर के किनारे खड़े सोमनाथ को देखना अपने आप में एक अलग अनुभव है। समुद्र की लहरों के सामने खड़ा मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं लगता, बल्कि इतिहास के लंबे संघर्ष और पुनर्निर्माण की कहानी भी कहता है। सोमनाथ का इतिहास भारत के इतिहास से अलग नहीं है। मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे और आधुनिक काल में इसका पुनर्निर्माण भारतीय सांस्कृतिक चेतना के महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जाता है। सोमनाथ को देखते हुए मन में यह विचार आया कि किसी स्मारक या मंदिर की शक्ति केवल उसकी इमारत में नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति उन लोगों की स्मृति में होती है जो पीढ़ियों तक उससे जुड़े रहते हैं। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग परिसर में खड़ा होकर यह ज्ञात हुआ कि यहां से अरब सागर को देखते हैं उसके आगे कोई भी घरती का किनारा नहीं।
श्रीशैलमपहाड़ियों के बीच मल्लिकार्जुन: आंध्र प्रदेश का श्रीशैलम एक अलग संसार जैसा लगता है।
नल्लमाला की पहाड़ियों और कृष्णा नदी के क्षेत्र में स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग दक्षिण भारत की प्राचीन धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां मंदिर की स्थापत्य परंपरा, श्रद्धालुओं की भीड़ और आसपास का प्राकृतिक परिवेश मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें यात्रा और तीर्थ का अंतर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। मेरी यात्रा में श्रीशैलम का महत्व इसलिए भी विशेष है कि यहां पहुंचने के साथ 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का क्रम पूरा हुआ। यहीं से यह अहसास और मजबूत हुआ कि अब केवल एक ज्योतिर्लिंग बाकी है।
महाकाल: उज्जैन रेलवे स्टेशन उतरकर जैसे ही महाकाल दर्शन के लिए कैंपस पहुंचा ठीक वैसे ही मेरे अंदर अचानक एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। और जो वहां अनुभूति हुई उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। महाकाल दर्शन, जहां समय भी शिव के सामने ठहरता है
उज्जैन केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र है। महाकालेश्वर के दर्शन के दौरान उज्जैन की पूरी संस्कृति में शिव की उपस्थिति महसूस होती है। महाकाल की भस्म आरती यहां की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक परंपराओं में है।
एक संघर्षशील पत्रकार के रूप में मुझे हमेशा यह जानने में रुचि रही है कि किसी धार्मिक स्थल की शक्ति केवल धार्मिक अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि उसके आसपास विकसित हुए सामाजिक जीवन में भी कैसे दिखाई देती है।
उज्जैन इसका एक सशक्त उदाहरण है।
नर्मदा के बीच ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन :
नर्मदा नदी के मध्य स्थित मांधाता द्वीप पर ओंकारेश्वर।
यहां पहुंचते ही नदी और मंदिर एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते।
ओंकारेश्वर का नाम ‘ॐ’ से जुड़ा है और द्वीप के आकार को भी ‘ॐ’ से संबंधित माना जाता है। नर्मदा की धारा, घाट और मंदिर परिसर मिलकर इस तीर्थ को विशिष्ट बनाते हैं। यहां मुझे लगा कि भारत के तीर्थ केवल धार्मिक केंद्र नहीं हैं। वे प्रकृति और मनुष्य के बीच बने उस रिश्ते की भी कहानी कहते हैं, जो हजारों वर्षों से चला आ रहा है।
सह्याद्रि की गोद में भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग दर्शन: महाराष्ट्र के सह्याद्रि क्षेत्र में स्थित भीमाशंकर तक पहुंचने का अनुभव दूसरे ज्योतिर्लिंगों से अलग है। पुणे से निजी वाहन द्वारा
पहाड़ी और वन क्षेत्र के बीच मंदिर तक पहुंचना अपने आप में यात्रा का हिस्सा है।
यहां शिव मंदिर के साथ प्रकृति का सान्निध्य बहुत स्पष्ट दिखाई देता है। भीमाशंकर का क्षेत्र धार्मिक आस्था के साथ जैव-विविधता और प्राकृतिक विरासत के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यहां मुझे यह समझने का अवसर मिला कि किसी धार्मिक स्थल का संरक्षण केवल मंदिर के संरक्षण तक सीमित नहीं हो सकता। उसके आसपास का प्राकृतिक परिवेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिलिंग दर्शन: गोदावरी की धरती
नासिक जिले के त्र्यंबक में स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का संबंध गोदावरी नदी के उद्गम क्षेत्र से है।
ब्रह्मगिरि पर्वत के निकट स्थित यह तीर्थ धार्मिक और भौगोलिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। किसी नदी का उद्गम और उसके निकट स्थित एक प्राचीन तीर्थ यह संयोजन भारतीय सभ्यता की उस सोच को सामने लाता है जिसमें नदियों और प्रकृति को जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा माना गया।
यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टियों से भरा हुआ है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन: एलोरा के पास शिव का धाम
महाराष्ट्र के वेरुल क्षेत्र में स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का अनुभव इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि इसके आसपास भारत की विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक धरोहर एलोरा स्थित है।
एक ओर प्राचीन मंदिर परंपरा और दूसरी ओर शैल-कला की अद्भुत विरासत। यह क्षेत्र बताता है कि भारत में धर्म, कला और स्थापत्य अक्सर अलग-अलग धाराएं नहीं रहे, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए रहे हैं। घृष्णेश्वर के दर्शन के साथ एलोरा की ऐतिहासिक विरासत का विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन: समुद्र और शिव के बीच
गुजरात के द्वारका क्षेत्र में स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग तक पहुंचना पश्चिमी भारत की धार्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
द्वारका पहले ही भगवान कृष्ण की नगरी के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसी धार्मिक भूगोल में नागेश्वर शिव परंपरा को जोड़ता है।
यह अनुभव भी दिलचस्प था कि भारत के अलग-अलग तीर्थों में अलग-अलग देवी-देवताओं की परंपराएं होने के बावजूद पूरा धार्मिक भूगोल एक-दूसरे से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। अब यहां पहुंचे के लिए समुद्र स्टीमर से पार करने की जरूरत नहीं है। समुद्र पर सेतु पुल बन चुका है। इसी पुल से पार कर ज्योतिलिंग दर्शन किया।
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन: झारखंड से जुड़ी अपनी आत्मीयता देवघर का बैद्यनाथ धाम मेरे लिए अन्य ज्योतिर्लिंगों से कुछ अधिक आत्मीय रहा है। झारखंड की धरती पर स्थित यह प्रमुख शिव तीर्थ श्रावणी मेले और कांवर यात्रा के दौरान देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं का केंद्र बन जाता है। बैद्यनाथ धाम को देखने का अनुभव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने जैसा भी रहा।
देवघर की अर्थव्यवस्था, स्थानीय कारोबार, श्रद्धालुओं की आवाजाही और धार्मिक पर्यटन सभी मिलकर यह दिखाते हैं कि तीर्थ किसी क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करते हैं।
रामेश्वरम् ज्योतिलिंग दर्शन: भारत के दक्षिणी छोर पर शिव रामेश्वरम् की यात्रा ने इस ज्योतिर्लिंग यात्रा को एक अलग भौगोलिक विस्तार दिया। ज्योतिर्लिंग का दर्शन के पूर्व शांत समुद्र में लोग बड़ी श्रद्धा के साथ स्नान करते हैं। यही एक ऐसा स्थल है जो देश भर में समुद्र का रूप एकदम शांत है। रामायण परंपरा और शिव आराधना तीनों यहां एक साथ दिखाई देते हैं। दर्शन के रामनाथस्वामी मंदिर की स्थापत्य भव्यता विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। मंदिर के लंबे गलियारे भारतीय मंदिर वास्तुकला की विशिष्ट उपलब्धियों में गिने जाते हैं। उत्तर भारत से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण भारत के इस तीर्थ पर पहुंचकर यह महसूस हुआ कि भारत की धार्मिक परंपराएं क्षेत्रीय सीमाओं से कहीं बड़ी हैं।
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन: जहां शिव केवल मंदिर में नहीं, पूरी नगरी में हैं
काशी विश्वनाथ का अनुभव शायद शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है।
वाराणसी की गलियों से गुजरते हुए, गंगा के घाटों को देखते हुए और विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यहां धर्म किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है। काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। यहां गंगा, घाट, मंदिर, गलियां, संगीत, संस्कृत और लोकजीवन—सभी मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक दुनिया बनाते हैं जो सदियों से निरंतर चली आ रही है। काशी एक खुली किताब की तरह है। हर गली में एक कहानी है। हर घाट पर इतिहास है और हर श्रद्धालु की अपनी यात्रा।
11 के बाद एक मात्र केदारनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन:
जब 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन पूरे हुए तो मन में स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठा अब आगे क्या? उत्तर स्पष्ट था केदारनाथ। बारह ज्योतिर्लिंगों की पारंपरिक सूची में केदारनाथ वह पड़ाव है, जहां मेरी यात्रा अभी पहुंचना बाकी है। हिमालय की ऊंचाइयों में स्थित केदारनाथ तक पहुंचना इस यात्रा का अंतिम अध्याय होगा। सोमनाथ के समुद्र से लेकर रामेश्वरम् के समुद्र तक, नर्मदा से लेकर गोदावरी तक, सह्याद्रि से लेकर काशी तक और देवघर से श्रीशैलम तक इन 11 ज्योतिर्लिंगों ने भारत को अलग-अलग रूपों में सामने रखा है।
अब हिमालय बुला रहा है। आस्था से आगे—इस यात्रा ने क्या दिया? 11 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा के बाद मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि मैंने कितने मंदिर देखे।
महत्वपूर्ण यह है कि मैंने भारत को कितने अलग-अलग रूपों में देखा।
कहीं तीर्थ स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार है, कहीं सदियों पुरानी स्थापत्य परंपरा का केंद्र, कहीं नदी और प्रकृति से जुड़ा हुआ है, तो कहीं विशाल धार्मिक पर्यटन का आधार बन चुका है। हर स्थान पर श्रद्धालुओं की अपनी कहानी थी।कोई मन्नत लेकर आया था, कोई परिवार के साथ दर्शन करने आया था, कोई जीवन की कठिनाइयों से राहत की उम्मीद लेकर आया था और कोई केवल आस्था के कारण। इन सबके बीच एक बात समान थी शिव के प्रति विश्वास। मैंने इस यात्रा में आस्था को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं देखा। मैंने इसे लोगों के जीवन का हिस्सा बनकर देखा। इस यात्रा ने यह भी समझाया कि भारत को केवल राजनीतिक या आर्थिक आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। भारत की आत्मा उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभवों में भी दिखाई देती है।
इसीलिए 11 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा मेरे लिए एक पत्रकार के रूप में भी महत्वपूर्ण रही। मैंने मंदिर देखे, लेकिन मंदिरों से आगे जाकर लोगों को देखा। मैंने तीर्थ देखे, लेकिन तीर्थों से आगे जाकर भारत को देखा।अब अंतिम पड़ाव की प्रतीक्षा: मेरी 12 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन हो चुके हैं। अब केवल केदारनाथ बाकी है। कब और किस मार्ग से बाबा केदार के दरबार तक पहुंचना होगा, यह यात्रा की अगली कहानी होगी।लेकिन एक बात निश्चित है। जब वह यात्रा पूरी होगी, तो वह केवल एक धार्मिक यात्रा का समापन नहीं होगा।



