सप्तमी से लेकर दशमी तिथि तक पूजन के संबंध में विचार आचार्य अनिल मिश्र

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विनय मिश्र जिला संवाददाता।

बरहज, देवरिया।

 

आचार्य अनिल मिश्रा ने बताया कि कि सप्तमी तिथि में १० अक्टूबर २०२४ गुरुवार को प्रातः ७:२९ बजे तक भगवती सरस्वती का पूजन घर के मध्य में किया जा सकेगा । आज ही पत्रिका प्रवेश एवं निशीथ काल में अष्टमी तिथि मिलने के कारण महानिशा पूजा की जाएगी। अन्नपूर्णा परिक्रमा आज ही प्रातः ७:२९ बजे से प्रारंभ हो जाएगी। भगवान भास्कर रात्रि ४:५४ बजे चित्रा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे, खरवाहन नीरा नाड़ी और नक्षत्र के देवता शुक्र होने के कारण सामान्य वृष्टि योग है ।

११ अक्टूबर २०२४ शुक्रवार को प्रातः ६:५२ बजे तक अष्टमी तिथि है। सूर्योदय कालीन अष्टमी तिथि होने के कारण महाष्टमी का व्रत आज ही किया जाएगा। अन्नपूर्णा परिक्रमा प्रातः ६:५२ बजे समाप्त हो जाएगी, तत्पश्चात नवमी तिथि होगी। पूजा पंडालों में सन्धि पूजा प्रातः ६:२८ बजे से ७:१६ बजे के मध्य किया जाएगा।क्षयवती नवमी तिथि में ही महानवमी का व्रत, उग्रचण्डी का पूजन, बलिदान हवनादिकर्म, कन्या पूजन-भोजन एवं ब्राह्मण भोजन रात्रि ५:४७ बजे तक किसी भी समय किया जा सकेगा।

विजया दशमी का मान १२ अक्टूबर २०२४ शनिवार को होगा । नवरात्रि व्रत का पारणा, शमी पूजन, अपराजिता पूजा, जयन्ती ग्रहण, नीलकण्ठ दर्शन सीमोल्लंघन, विजय यात्रा के साथ-साथ श्रवण नक्षत्र में एवं दशमी तिथि में रात्रि १२:५२ बजे तक दुर्गाप्रतिमाओं का विसर्जन कर दिया जाएगा। देवी का गमन शनिवार को हो रहा है अर्थात् वाहन चरणायुध (मुर्गा) है। जिसके कारण प्रकृति में अशांति रहेगी।

पापांकुशा एकादशी व्रत का मान सभी के लिए १३ अक्टूबर २०२४ रविवार को होगा। आज ही काशी में नाटी इमली की विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप की रामलीला काशीराज की गौरवपूर्ण उपस्थिति एवं काशी के यादव बन्धुओं की परम्परागत सहभागिता के साथ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न होगी ।

पद्मनाभ द्वादशी का मान १४अक्टूबर २०२४ सोमवार को है। आज से दूधदान एवं द्विदल (दाल) त्याग का व्रत आरम्भ हो जाएगा।

ऋण से छुटकारा पाने के लिए भौम प्रदोष व्रत एवं तेरस का मान १५ अक्टूबर २०२४ मंगलवार को होगा।

व्रत सहित शरद पूर्णिमा एवं कोजागिरी पूर्णिमा का मान १६ अक्टूबर २०२४ बुधवार को हो जाएगा, क्योंकि कोजागरी पूर्णिमा के लिए रात्रि व्यापिनी पूर्णिमा होनी चाहिए। आज की रात शुद्ध दूध से घी शर्करायुक्त निर्मित खीर को पूर्ण चन्द्रमा की अमृतोमयी चांदनी में रख दिया जाता है और लक्ष्मी-इन्द्र-कबेर आदि का पूजन किया जाता है। तत्पश्चात इस अमृत वर्षा से सिक्त खीर को प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाएगा इस खीर में अनेक रोगों को दूर करने की शक्ति होती है।

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