Palamu News: पलामू में नागरिक सुविधाओं की बदहाली: प्रयास बहुत, परिणाम कम

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मॉनिटरिंग की कमजोरी और जवाबदेही के अभाव से खड़े होते सवालात

✍️संजय पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार
पलामू जिला में नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, राशन वितरण, शहरी सफाई और जनकल्याणकारी योजनाओं के संचालन को लेकर बैठकों और निर्देशों का सिलसिला जारी रहता है। जिला प्रशासन की ओर से समय-समय पर निरीक्षण, समीक्षा बैठक और जनसमाधान कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर आम लोगों को अपेक्षित राहत नहीं मिल पा रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी इलाकों तक नागरिक सुविधाओं की स्थिति कई जगहों पर चिंताजनक बनी हुई है। लोगों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं कि योजनाएं कागजों में अधिक और धरातल पर कम दिखाई देती हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर प्रशासनिक सक्रियता के बावजूद अपेक्षित सफलता क्यों नहीं मिल रही?
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो इसका सबसे बड़ा कारण जिले में प्रभावी मॉनिटरिंग व्यवस्था का अभाव है। योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा तो होती है, लेकिन उसकी निष्पक्षता और गंभीरता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कई विभागों में निरीक्षण की प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। अधिकारी फील्ड में कम और फाइलों में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं।
जिले में यह धारणा भी मजबूत होती जा रही है कि अधिकारियों के बीच जवाबदेही का भय समाप्त हो चुका है। कई अधिकारियों को यह विश्वास रहता है कि उनकी कार्यप्रणाली की जांच अंततः उसी प्रशासनिक ढांचे के भीतर होगी, जहां व्यक्तिगत और विभागीय संबंध निष्पक्ष रिपोर्टिंग को प्रभावित कर देते हैं। परिणामस्वरूप गंभीर अनियमितताओं पर भी कठोर कार्रवाई नहीं हो पाती।
प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो कई बार जांच की जिम्मेदारी ऐसे अधिकारियों को दी जाती है, जो संबंधित विभाग या अधिकारी के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं। ऐसे में जांच रिपोर्ट निष्पक्ष होने के बजाय संतुलित और “सिस्टम-फ्रेंडली” बन जाती है। इससे न केवल दोषियों का मनोबल बढ़ता है, बल्कि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का उत्साह भी प्रभावित होता है।
मेदिनीनगर सहित जिले के कई इलाकों में पेयजल संकट, खराब सड़कें, स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की अनुपस्थिति, स्कूलों में शिक्षकों की कमी, आंगनबाड़ी सेवाओं की अनियमितता और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में शिकायतें आम हो चुकी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतों के बाद भी स्थायी समाधान नहीं निकलता। कई बार अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं, आश्वासन देते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद स्थिति फिर वैसी ही हो जाती है।

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। सड़क निर्माण, नाली, जलापूर्ति और आवास योजनाओं में मानकों की अनदेखी की शिकायतें मिलती रही हैं। लेकिन इन मामलों में कठोर दंडात्मक कार्रवाई कम ही दिखाई देती है। यही कारण है कि लापरवाही की संस्कृति धीरे-धीरे व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है।
प्रशासनिक व्यवस्था में भय और जवाबदेही का संतुलन अत्यंत आवश्यक माना जाता है। जब तक अधिकारी यह महसूस नहीं करेंगे कि लापरवाही या भ्रष्टाचार पर निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई हो सकती है, तब तक सुधार की प्रक्रिया अधूरी रहेगी। केवल बैठकें और निर्देश व्यवस्था को मजबूत नहीं कर सकते। उसके लिए पारदर्शी मॉनिटरिंग और स्वतंत्र जांच तंत्र की आवश्यकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जिले में बाहरी एजेंसियों या स्वतंत्र मॉनिटरिंग तंत्र की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए। सामाजिक अंकेक्षण, डिजिटल ट्रैकिंग और जनप्रतिनिधियों तथा आम नागरिकों की सहभागिता से योजनाओं की निगरानी अधिक प्रभावी हो सकती है। यदि शिकायतों की ऑनलाइन ट्रैकिंग और समयबद्ध निस्तारण की सख्त व्यवस्था लागू हो, तो स्थिति में सुधार संभव है।
इसके अलावा प्रशासनिक अधिकारियों की नियमित फील्ड विजिट, अचानक निरीक्षण और रिपोर्ट को सार्वजनिक करने जैसी व्यवस्थाएं भी जवाबदेही बढ़ा सकती हैं। कई राज्यों में यह मॉडल प्रभावी साबित हुआ है, जहां अधिकारियों की कार्यप्रणाली सीधे जनता की प्रतिक्रिया से जुड़ी होती है।
यह भी जरूरी है कि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को संरक्षण और प्रोत्साहन मिले। वर्तमान व्यवस्था में कई बार सक्रिय अधिकारी भी सिस्टम की ढिलाई और राजनीतिक-प्रशासनिक दबाव के कारण प्रभावी परिणाम नहीं दे पाते। इससे पूरी व्यवस्था की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
झारखंड के विकास की दृष्टि से पलामू जैसे जिलों का मजबूत होना अत्यंत आवश्यक है। यह जिला प्राकृतिक संसाधनों, ऐतिहासिक पहचान और सामाजिक संभावनाओं से समृद्ध है। लेकिन यदि बुनियादी नागरिक सुविधाएं ही प्रभावी रूप से लोगों तक नहीं पहुंच पाएंगी, तो विकास की अवधारणा अधूरी रह जाएगी।
आज आवश्यकता केवल योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें धरातल पर ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ लागू करने की है। प्रशासनिक इच्छाशक्ति, निष्पक्ष मॉनिटरिंग और जवाबदेही आधारित व्यवस्था ही पलामू की नागरिक सुविधाओं की तस्वीर बदल सकती है। अन्यथा प्रयासों और दावों के बीच आम जनता की समस्याएं यूं ही दबती रहेंगी।

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