झारखंड की दास्तान: काम की तलाश में दूर प्रदेशों को पलायन करते मजदूरों का दर्द
The story of Jharkhand: The pain of laborers migrating to distant states in search of work
संजय पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार :
झारखंड को खनिज संपदा, प्राकृतिक संसाधनों और मेहनतकश लोगों की धरती कहा जाता है। यहां कोयला, लौह अयस्क, वन संपदा और उद्योगों की पर्याप्त संभावनाएं हैं। बावजूद इसके झारखंड के हजारों मजदूर आज भी रोजी-रोटी की तलाश में अपने घर-परिवार से सैकड़ों और हजारों किलोमीटर दूर जाने को मजबूर हैं।
हाल में धनबाद–मुंबई ट्रेन में विभिन्न इलाकों से यात्रा कर रहे मजदूरों से हुई बातचीत ने झारखंड की रोजगार व्यवस्था और श्रमिकों की वास्तविक स्थिति से जुड़े कई गंभीर सवाल सामने रखे। बातचीत सामान्य थी, लेकिन मजदूरों की बातें सुनने के बाद यह महसूस हुआ कि पलायन केवल रोजगार का सवाल नहीं है, बल्कि यह परिवार, बच्चों की शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन चुका है।
बातचीत में कई मजदूरों ने बताया कि उन्हें झारखंड में काम तो मिल जाता है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या मजदूरी का समय पर भुगतान नहीं होना है।
कुछ मजदूरों का कहना था कि उन्हें कई बार दो-दो या तीन-तीन महीने के बाद मजदूरी मिलती है। मजदूर के लिए यह स्थिति कितनी कठिन होती है, इसे समझना जरूरी है।
जिस व्यक्ति के घर में बच्चे स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हों, उसके लिए हर महीने फीस, राशन, बिजली, मकान का खर्च, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरतें होती हैं। मजदूरी तीन महीने बाद मिले तो वह इन खर्चों को कैसे पूरा करे?
“हमें काम के बदले हर महीने समय पर पैसा चाहिए। हम अपने बच्चों की फीस और घर का खर्च तीन महीने रोककर नहीं चला सकते। यह सवाल केवल एक मजदूर का नहीं है। यह उन हजारों परिवारों की आवाज है जिनकी अर्थव्यवस्था मजदूरी पर निर्भर है। ट्रेन में बातचीत के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। कई ऐसे श्रमिक मिले जिनके पास तकनीकी जानकारी और काम का अनुभव था। वे सामान्य अकुशल मजदूर नहीं थे। किसी को मशीनों का अनुभव था, कोई इलेक्ट्रिकल काम जानता था, कोई निर्माण क्षेत्र में तकनीकी कार्य कर चुका था तो किसी को औद्योगिक क्षेत्र का अनुभव था।
फिर सवाल उठता है कि जब झारखंड में इतना बड़ा औद्योगिक और खनिज आधार मौजूद है तो इन प्रशिक्षित और अनुभवी युवाओं को अपने राज्य में पर्याप्त अवसर क्यों नहीं मिल रहे? मुंबई, गोवा, चेन्नई, हैदराबाद, अहमदाबाद और देश के दूसरे औद्योगिक एवं निर्माण केंद्रों में झारखंड के मजदूर बड़ी संख्या में काम करते दिखाई देते हैं। वे घर से निकलते समय अपने साथ केवल एक बैग और कुछ कपड़े लेकर जाते हैं, लेकिन उनके कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी होती है।
किसी को बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसा भेजना है।
किसी को बूढ़े माता-पिता की दवा खरीदनी है।
किसी को घर बनाना है।
किसी को बहन या बेटी की शादी करनी है।
और किसी को केवल इतना चाहिए कि उसके परिवार को दो वक्त की रोटी मिलती रहे। इसलिए उनके लिए पलायन कोई शौक नहीं, मजबूरी है। सबसे बड़ा सवाल—समय पर वेतन कौन दिलाएगा? झारखंड में कंपनियां, ठेकेदार और विभिन्न प्रतिष्ठान श्रमिकों से काम लेते हैं। लेकिन यदि मजदूर को समय पर मजदूरी नहीं मिलती तो उसकी शिकायत सुनने और तत्काल समाधान कराने की प्रभावी व्यवस्था कितनी मजबूत है?
सरकार का दायित्व केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए। रोजगार के साथ समय पर भुगतान, कार्यस्थल की सुरक्षा, श्रमिकों के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
यदि किसी मजदूर को तीन महीने तक मजदूरी नहीं मिलती और वह अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए दूसरे राज्य जाने को मजबूर हो जाता है, तो यह केवल कंपनी या ठेकेदार की समस्या नहीं रह जाती। यह श्रम प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करती है।
झारखंड सरकार को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि राज्य में काम कर रही कंपनियों और ठेकेदारों द्वारा श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान किस समय और किस व्यवस्था के तहत किया जा रहा है।
सरकार के पास श्रम कानूनों के अनुपालन की निगरानी के लिए व्यवस्था है। आवश्यकता इस बात की है कि यह निगरानी केवल कागजों तक सीमित न रहे।
नियमित निरीक्षण हो।
श्रमिकों की शिकायतों की सुनवाई हो।
मजदूरी भुगतान की स्थिति की समीक्षा हो।
और जहां मजदूरों के अधिकारों का उल्लंघन हो, वहां समयबद्ध कार्रवाई हो।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मजदूर को अपनी मजदूरी पाने के लिए महीनों तक किसी कार्यालय या ठेकेदार के चक्कर न लगाने पड़ें।
अक्सर मजदूरों के पलायन को आंकड़ों में देखा जाता है—कितने लोग झारखंड से बाहर गए, कितने लौटे और कितने दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं।
एक मां अपने बेटे के लौटने का इंतजार करती है।
एक पिता दूर शहर में मेहनत करके बच्चों की फीस भेजता है।
एक पत्नी पति के लौटने की राह देखती है।
बच्चे त्योहार पर अपने पिता का इंतजार करते हैं।
कई मजदूरों के लिए साल में कुछ ही दिन ऐसे होते हैं जब पूरा परिवार एक साथ बैठ पाता है।
इसलिए पलायन का सामाजिक मूल्य भी है, जिसे आर्थिक आंकड़ों के साथ समझना जरूरी है।
झारखंड को मजदूरों से केवल श्रम नहीं, उनका भविष्य भी जोड़ना होगा
झारखंड की सबसे बड़ी ताकत उसके लोग हैं। यदि राज्य अपने श्रमिकों को उनके घर के आसपास सम्मानजनक और नियमित रोजगार उपलब्ध करा सके तो पलायन काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इसके लिए केवल सरकारी नौकरियां पर्याप्त नहीं हैं। निजी उद्योग, छोटे एवं मध्यम उद्योग, निर्माण क्षेत्र, सेवा क्षेत्र, तकनीकी संस्थान और स्थानीय उद्यमों को भी रोजगार सृजन की व्यापक नीति से जोड़ना होगा।
विशेष रूप से तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार का डेटाबेस बनाया जा सकता है, जिसमें उनके कौशल, अनुभव और रोजगार की आवश्यकता दर्ज हो।
दूसरी ओर राज्य में कार्यरत कंपनियों के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे श्रमिकों को नियमित और समयबद्ध भुगतान करें।
सरकार के लिए कुछ जरूरी सुझाव:
पहला—समय पर मजदूरी की गारंटी:
राज्य में कार्यरत निजी कंपनियों और ठेकेदारों के मजदूरों के वेतन भुगतान की निगरानी मजबूत की जाए।
दूसरा—श्रमिक शिकायत तंत्र:
ऐसी सरल व्यवस्था हो जहां मजदूर मोबाइल से अपनी शिकायत दर्ज कर सके और उसे शिकायत की स्थिति भी पता चल सके।
तीसरा—तकनीकी युवाओं का रोजगार बैंक:
ITI, पॉलिटेक्निक और अन्य तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं का कौशल-आधारित डेटाबेस बनाया जाए।
चौथा—स्थानीय रोजगार पर विशेष अभियान:
जिन जिलों से सबसे अधिक पलायन होता है, वहां स्थानीय रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जाए।
पांचवां—कंपनियों की जवाबदेही:
श्रम कानूनों का पालन नहीं करने वाली कंपनियों और ठेकेदारों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हो।
छठा—प्रवासी मजदूर सहायता व्यवस्था:
दूसरे राज्यों में काम करने वाले झारखंड के मजदूरों के लिए सहायता और संपर्क तंत्र मजबूत किया जाए।
सातवां—बच्चों की शिक्षा को सुरक्षित किया जाए:
मजदूर परिवारों के बच्चों की शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए विशेष सहायता व्यवस्था बनाई जाए।
धनबाद–मुंबई ट्रेन में हुई यह बातचीत किसी सरकारी सर्वेक्षण का विकल्प नहीं है, लेकिन यह जमीनी हकीकत की ओर संकेत जरूर करती है। मजदूरों की बातों में सबसे ज्यादा जो पीड़ा दिखाई दी, वह यह थी कि वे मेहनत करने को तैयार हैं। उन्हें काम से परहेज नहीं है। वे तकनीकी काम सीख चुके हैं, कठिन परिस्थितियों में काम कर सकते हैं और अपने परिवार के लिए दिन-रात मेहनत करने को तैयार हैं। उनकी मांग बहुत बड़ी नहीं है। काम मिले।
मजदूरी समय पर मिले।
काम की जगह सुरक्षित हो।
और उनके बच्चों का भविष्य बेहतर हो। अगर इतना सुनिश्चित हो जाए तो शायद हजारों मजदूरों को हर वर्ष झारखंड से मुंबई, गोवा, चेन्नई, हैदराबाद और अहमदाबाद की ओर जाने वाली ट्रेनों में अपना घर छोड़कर सफर नहीं करना पड़े।
झारखंड के विकास की चर्चा अक्सर खनिज, उद्योग, निवेश और बड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में होती है। अब इस चर्चा में उस मजदूर को भी केंद्र में लाने की जरूरत है, जिसके श्रम से राज्य और देश की अर्थव्यवस्था चलती है।
सरकार को यह सोचना होगा कि जिस झारखंड की धरती से मजदूर निकलकर देश के दूसरे हिस्सों का निर्माण कर रहे हैं, उसी झारखंड में उनके लिए पर्याप्त और सम्मानजनक रोजगार क्यों नहीं बन पा रहा है।
यदि झारखंड में काम करने वाले मजदूर को अपनी मेहनत की मजदूरी तीन महीने बाद मिलेगी, तो उसके घर का चूल्हा उन तीन महीनों में कैसे जलेगा? यह सवाल केवल मजदूर का नहीं है।
यह सवाल शासन का है।
यह सवाल श्रम व्यवस्था का है। यह सवाल उद्योगों की जवाबदेही का है।
और सबसे बढ़कर यह झारखंड के भविष्य का सवाल है। मजदूरों के चेहरे पर दिखाई देने वाली थकान को पढ़ना होगा और उनकी आवाज को नीति निर्माण तक पहुंचाना होगा। विकास की असली कसौटी यही होनी चाहिए कि मेहनत करने वाले हाथों को उनके घर के पास सम्मानजनक काम और उनकी मेहनत का पैसा समय पर मिले।



