नदवा के प्रधानाचार्य मौलाना सईद उर रहमान आजमी नदवी का इंतिक़ाल, अरबी भाषा और इस्लामी शिक्षा जगत में शोक

Nadwa Principal Maulana Saeed ur Rehman Azmi Nadvi passes away, mourning the Arabic language and Islamic education world

लखनऊ, 7 अक्टूबर। दारुल उलूम नदवतुल उलमा के प्रधानाचार्य और प्रख्यात इस्लामी विद्वान मौलाना डॉ. सईद उर रहमान आजमी नदवी का बुधवार को लंबी बीमारी के बाद इंतिक़ाल हो गया। उनके निधन की खबर से शिक्षा, साहित्य, अरबी भाषा और दीनी जगत में शोक की लहर दौड़ गई। खबर मिलते ही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव नदवतुल उलमा पहुंचे और मौलाना को श्रद्धांजलि अर्पित की।मौलाना सईद उर रहमान आजमी नदवी लंबे समय से नदवतुल उलमा की सेवा से जुड़े रहे। वर्ष 1993 से 1999 तक उन्होंने अरबी भाषा एवं साहित्य संकाय के डीन के रूप में जिम्मेदारी निभाई। वर्ष 2000 में उन्हें नदवतुल उलमा का मोहतमिम और बाद में प्रधानाचार्य बनाया गया। वे नदवतुल उलमा के 10वें प्रधानाचार्य के रूप में लंबे समय तक अपनी सेवाएं देते रहे।अरबी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान थी। वे प्रतिष्ठित अरबी पत्रिका ‘अल-बाअसुल इस्लामी’ के प्रधान संपादक के रूप में दशकों तक सेवाएं देते रहे। उनके अकादमिक और साहित्यिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1994 में उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया था। वर्ष 2019 में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट की उपाधि प्रदान की थी। मई 2026 में जामिया हिदाया, जयपुर की ओर से उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया।मौलाना आजमी नदवी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य और इंटीग्रल विश्वविद्यालय, लखनऊ के पूर्व कुलपति भी रहे। शिक्षा और शोध के क्षेत्र में उनके योगदान को व्यापक रूप से सराहा जाता रहा है।14 मई 1934 को मऊ (तत्कालीन आजमगढ़) में जन्मे मौलाना आजमी नदवी ने प्रारंभिक एवं दीनी शिक्षा जामिया मिफ्ताहुल उलूम, मऊ से हासिल की। इसके बाद उन्होंने दारुल उलूम नदवतुल उलमा में अरबी साहित्य का अध्ययन किया। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मिस्र की प्रसिद्ध अल-अजहर यूनिवर्सिटी और बगदाद में भी अध्ययन किया। बगदाद में उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान डॉ. तकियुद्दीन हिलाली मराकशी के सानिध्य में शिक्षा प्राप्त की।मौलाना सईद उर रहमान आजमी नदवी के निधन पर देश-विदेश के उलेमा, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों, छात्रों और उनके चाहने वालों ने गहरा दुख व्यक्त किया। उनके इंतिक़ाल को अरबी भाषा, साहित्य, शिक्षा और इस्लामी अध्ययन के क्षेत्र के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है।मौलाना की नमाज-ए-जनाजा गुरुवार, 8 अक्टूबर को सुबह 8 बजे नदवतुल उलमा परिसर में अदा की गई। इसके बाद उन्हें लखनऊ के डालीगंज कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

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