Palamu News: खाली पड़े भवनों का शुरू हो तत्काल संचालन, आने वाले कुछ वर्षों में हो जाएगा खंडहर

Palamu News: Operations in vacant buildings must commence immediately; otherwise, they will turn into ruins within a few years.

​✍️ संजय पांडेय वरिष्ट पत्रकार
पलामू: झारखंड राज्य बने 25 वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। हम बात करते हैं राज्य के पलामू जिले की, जहां सरकारी पैसे की बर्बादी की एक ऐसी तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, जिसे ‘योजनागत विफलता’ का जीवंत स्मारक कहा जा सकता है। जिले के विभिन्न प्रखंडों में करोड़ों की लागत से बनकर तैयार हुए सरकारी भवन आज अपनी उपयोगिता की राह देख रहे हैं। विडंबना यह है कि प्रशासन ने ईंट-गारे का ढांचा खड़ा करने में जितनी तत्परता दिखाई, उनमें जनसेवा शुरू करने में उतनी ही उदासीनता बरती जा रही है। ​सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि राज्य बनाने के बाद सभी राज्य सरकार के कार्यकाल में कई भवन बन कर तैयार हुए लेकिन उसमें से कई भवन का उपयोग नहीं हो पाया है। या यूं कहें कि उस भवन की सेवा ही नदारद है।

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​कई भवनों का अवलोकन करने के बाद स्पष्ट है कि पलामू में दर्जनों ऐसे भवन हैं हैं, जो उद्घाटन के बाद से ही ताले में बंद हैं। कहीं मैनपावर (कर्मचारियों) की कमी का रोना रोया जा रहा है, तो कहीं मूलभूत संसाधनों के अभाव में ये करोड़ों की संपत्ति मलबे में तब्दील हो रही है। बिना ठोस कार्ययोजना के बनाए गए ये भवन अब असामाजिक तत्वों का अड्डा बनते जा रहे हैं। सबसे विडंबना यह है कि

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​टेंडर की राजनीति और कमीशन का खेल के चक्कर में गुणवत्ता का कोई ध्यान नहीं केंद्रित किया गया। विशेषकर कर संबंधित अधिकारियों ने भी आंख मूंद कर आनन फानन में पूर्णता की क्लीनचिट दे दी। आय ​प्रशासनिक गलियारों में यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या इन भवनों का निर्माण जनसुविधा के लिए किया गया था या सिर्फ ‘टेंडर’ जारी कर कमीशन वसूलने के लिए? जब विभाग के पास स्टाफ की भारी कमी है, तो बिना मैनपावर सुनिश्चित किए इन भव्य भवनों की मंजूरी किसने दी और क्यों दी? यह जांच का विषय है कि क्या निर्माण कार्य केवल ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत का एक जरिया बनकर रह गया है। ​जो भवन उपयोग में नहीं हैं, उनकी खिड़की-दरवाजे टूट रहे हैं और दीवारों में दरारें आ रही हैं। इनके रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है, इस पर विभाग मौन है। स्थानीय स्तर पर ऐसी कई रिपोर्टें हैं जहां लाखों की लागत से बनी पानी की टंकियां और कोल्ड स्टोरेज जैसी संरचनाएं आज झाड़ियों से ढकी पड़ी हैं। एक सवाल उभर कर सामने आ रहा है कि
​बिना ठोस प्लान के, बिना योग्य स्टाफ सुनिश्चित किए ही करोड़ों के निवेश को हरी झंडी देने के पीछे आखिर क्या मंशा थी? यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। ​अब सबसे बड़ा सवाल यह है की, सरकारी खजाने से होनेवाली योजनाओं में लापरवाही कब तलक होती रहेगी।

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​अब लोगों को स्मारक नहीं बल्कि समाधान चाहिए।
​पलामू में खाली पड़े भवनों भवनों का तत्काल संचालन शुरू नहीं हुआ, तो आने वाले कुछ वर्षों में जनता की गाढ़ी कमाई की यह संपत्ति पूरी तरह खंडहर हो जाएगी।

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