जिबह किया जाता जनतंत्र!

Democracy is being slaughtered!

(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

अपनी बंगाल फतेह को विधानसभा से आगे ले जाने और वास्तव में सीधे लोकसभा फतेह तक पहुंचाने में, मोदीशाही को जरा भी देर नहीं लगी है। 4 मई को विधानसभा चुनाव में बंगाल में उसकी जीत का ऐलान हुआ और इसके मुश्किल से एक महीना दस दिन बाद, 14 जून को काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा ग्रुप के बागी सदस्यों ने, स्पीकर ओम बिड़ला से मुलाकात की और बागी गुट के उन्नीस-बीस सांसदों के हस्ताक्षरों के साथ एक ज्ञापन देकर, लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस ग्रुप से अलग बैठाए जाने की मांग की।

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पर तृणमूल कांग्रेस के ममता वफादार गुट द्वारा इससे पहले ही स्पीकर से मुलाकात कर, उन्हें याद दिलाया जा चुका था कि दल-बदलविरोधी कानून के अनुसार और खासतौर पर शिव सेना के विभाजन के प्रकरण में 2022 में सुप्रीम कोर्ट के सीमित निर्णय के अनुसार, तृणमूल के बागी गुट को लोकसभा में एक अलग गुट के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती है। कानून के जानकारों के अनुसार, किसी राजनीतिक पार्टी के विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों के अलग होने की सूरत में भी, उन्हें दलबदल-विरोधी कानून के अंतर्गत अयोग्यता से तभी सुरक्षा मिल सकती है, जब मूल पार्टी का किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में विलय हो रहा हो या उनके विलय से कोई नयी पार्टी बन रही हो। शिव सेना प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया था कि यहां विलय से आशय राजनीतिक पार्टी के विलय से है, न कि विधायी ग्रुप के दो-तिहाई या उससे अधिक के विलय से।

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बहरहाल, दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधान, बागी तृणमूल सांसदों के कदमों को, और सच पूछें तो उनके पीछे आधे प्रकट तथा आधे परोक्ष रूप से काम कर रहे संघी-भाजपायी ‘चाणक्यों’ के कदमों को नहीं रोक सकते थे, नहीं रोक पाये। बेशक, यह कोई संयोग ही नहीं था कि स्पीकर ओम बिड़ला से मुलाकात की बागी गुट की कार्यनीति, इस मुलाकात से ठीक पहले हुई केंद्र सरकार के मंत्री, भूपेंद्र यादव के घर पर बैठक में तैयार की गयी थी। बिड़ला से मुलाकात के बाद, बागी गुट के प्रवक्ताओं ने दो महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। पहली, जो कि इस गुट के खड़े किए जाने तथा उसके लिए दो-तिहाई का आंकड़ा जुटाए जाने की कसरत शुरू होने के बाद से ही स्पष्ट थी — यह गुट नरेंद्र मोदी सरकार के हाथ मजबूत करेगा और इस तरह कथित रूप से अपने चुनाव क्षेत्रों के विकास का रास्ता बनाने के लिए करेगा।

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दूसरी घोषणा थी, बागी गुट के एनसीपीआई में विलय के निर्णय की। जाहिर है कि इस गुट द्वारा इस फैसले की जानकारी, लोकसभा स्पीकर को भी दी गयी थी। समझना मुश्किल नहीं था कि इस पैंतरे का मकसद, कम से कम कागजी तौर पर दलबदल-विरोधी कानून की, टूटने वाले गुट के किसी अन्य पार्टी में विलय की शर्त पूरी करना है। काफी खोज-बीन करने पर पता चला कि नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) तीन-चार साल पहले त्रिपुरा में बनायी गयी, एक गैर-मान्यताप्राप्त, किंतु रजिस्टर्ड पार्टी है, जिसका पिछले विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा में तीन सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर 800 वोट हासिल करने से ज्यादा कोई विधायी अस्तित्व नहीं था। अचानक यह अनाम पार्टी 20 लोकसभा सदस्यों के साथ, चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनने जा रही है!

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यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कथित विलय ऐसी अनाम पार्टी में ही क्यों, खुद भाजपा में क्यों नहीं? बेशक, एक किस्त में इतनी बड़ी संख्या में तो नहीं, फिर भी विपक्षी पार्टियों के सांसदों को भाजपा में मिलाने का खेल, मोदी निजाम के लिए कोई नया नहीं है। विधानसभा चुनावों के हालिया चक्र से जरा सा पहले ही, आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों को, इसी तरह बागी बनवा कर भाजपा में शामिल किया गया था। सात की ही संख्या इसलिए कि राज्यसभा में आप पार्टी के कु ल 10 सदस्य थे और 7 सदस्यों से दो-तिहाई की शर्त पूरी हो जाती है। इससे पहले, 2019 के विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में तेलुगू देशम की हार के बाद, उसके चार राज्यसभा सदस्यों का भी इसी तरह से भाजपा में विलय कराया गया था। तब बागी तृणमूल सांसदों का सीधे भाजपा में ही विलय क्यों नहीं, जबकि इतना तो साफ ही है कि इस गुट को, भाजपा के पुछल्ले के रूप में काम करने के लिए ही तोड़ा गया है।

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इसके तीन कारण हो सकते हैं, जो सभी एक साथ भी मौजूद हो सकते हैं। पहला यह कि चुनाव आयोग की भांति-भांति की मदद के अलावा, जिस तृणमूल के भ्रष्टाचार से लेकर हिंसा तक के आख्यानों के सहारे, संंघ-भाजपा ने चुनावी फतेह हासिल की है, उसके सांसदों और खासतौर पर लोकसभा सदस्यों को थोक के भाव भाजपा में लाकर पचा पाना, संघ-भाजपा के जबर्दस्त हाजमे के लिए भी मुश्किल हो सकता है। हरेक तृणमूल लोकसभा सदस्य, जिस भाजपा उम्मीदवार को हराकर लोकसभा पहुंचा है, उसके साथ एक ही पार्टी में आसानी से तो एडजस्ट नहीं ही हो सकता है। इससे कहीं बेहतर विकल्प यह होगा कि सुरक्षित दूरी रखकर, संघ-भाजपा बाद में छांट-छांटकर अपने लिए विशेष उपयोगी नेताओं को अपने साथ मिला ले और बाकी को कूड़ेदान में जाने दे। दूसरे, संसद में संख्या बल बढ़ाने के अलावा तृणमूल के लोकसभा सदस्यों का जन समर्थन का दायरा बढ़ाने में अगर कोई उपयोग हो, तो शायद ज्यादा उपयोग उनके भाजपा से सुरक्षित दूरी बनाए रखने में ही हो। और तीसरा यह कि भाजपा को बखूबी पता है कि इस तरह का विलय, राजनीतिक ही नहीं, कानूनी तौर पर भी विवादास्पद होगा और उसे अदालतों में चुनौती दिया जाना तय है। ऐसे में वह अपने हाथ मैले क्यों करती, जबकि अपने पाले में करीब बीस सांसद बढ़ाने के सारे लाभ उसे, तृणमूली बागियों के एनसीपीआई सदस्य कहलाने पर भी मिल ही रहे होंगे।

 

बेशक, तृणमूली बागी सांसद चाहे ओम बिड़ला के फैसले के बाद, अलग गुट के तौर पर मान्यता प्राप्त कर लें या एनसीपीआई के लोकसभा ग्रुप की मान्यता प्राप्त कर लें, ऐसा कोई भी फैसला विवादास्पद होगा और ज्यादा संभावना है कि उसे अदालत में चुनौती भी दी जाए। लेकिन, महाराष्ट्र में पहले शिव सेना तथा उसके बाद एनसीपी के विभाजन के प्रकरण और अभी हाल में आप पार्टी राज्यसभा सदस्यों के भाजपा के विलय को दी गयी चुनौतियों के अनुभव से यह साफ है कि व्यावहारिक रूप से, स्पीकर के फैसले से बनने वाली स्थिति, जल्दी से बदलने वाली नहीं है। मोदीशाही के जरिए जो संघ-भाजपा तंत्र साम-दाम-दंड-भेद के अपने हथियारों से, अपने विरोध में खड़ी पार्टियों का और खासतौर पर उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों का इस तरह का विभाजन सुनिश्चित करता है, वही संघ-भाजपा तंत्र पहले ही यह भी सुनिश्चित कर चुका होता है कि उसके लिए फायदे के इस तरह के घटनाक्रम में कोई अन्य संस्था बाधा नहीं डाले। उसे पलटा तो हर्गिज नहीं जाए। जाहिर है कि बारह वर्ष के अनुभव ने उसके इस भरोसे को पुख्ता ही किया है कि जनतंत्र की कोई भी संस्था, उनके मंसूबों के आड़े आने लायक नहीं रही है।

 

जाहिर है कि विधानसभा चुनाव के हालिया चक्र के नतीजों से और खासतौर पर बंगाल फतेह करने के बाद से, मोदीशाही के हौसले सातवें आसमान पर हैं। इसीलिए, तृणमूल लोकसभा सांसदों के मामले को, मोदीशाही की अपनी बंगाल की फतेह का संसद का विस्तार करने की मुहिम तक ही सीमित कर के नहीं देखा जाना चाहिए। महाराष्ट्र की राजनीति के जानकारों के अनुसार, तृणमूल सांसदों की बगावत संगठित करने के दौरान ही, संघ-भाजपा के खिलाड़ी महाराष्ट्र में भी विभाजन के पिछले चक्र के जरिए पहले ही बहुत कमजोर किए जा चुके विपक्ष में, विभाजन के एक और चक्र की तैयारियों में जुटे हुए थे। उद्घव ठाकरे की शिव सेना खासतौर पर उनके निशाने पर थी, जिसके अब सिर्फ 9 लोकसभा सदस्य बचे हैं। यह दूसरी बात है कि सारी कोशिशों के बावजूद, संघ-भाजपा के हथियार के तौर पर शिंदे के लिए, छ: (यानी दो-तिहाई) बागी जुटाना संभव नहीं हुआ, जो कि दलबदल कानून के चाबुक से बचने के लिए जरूरी संख्या थी।

 

इसे देखते हुए, हैरानी की बात नहीं होगी कि कई राजनीतिक टीकाकारों का यह अनुमान सच निकले कि मोदीशाही, संसद के मानसून सत्र में दोबारा, महिला आरक्षण सह परिसीमन विधेयक का पैकेज देश के सिर पर थोपने की कोशिश कर सकती है। संसद में अपना संख्या बल बढ़ाने के इस जुनून के पीछे ऐसा ही कोई गहरा मकसद नजर आता है। यह किसी से छुपा नहीं है कि महिला आरक्षण की आड़ लेकर, परिसीमन को आगे बढ़ाने में ही मोदीशाही की असली दिलचस्पी है। और यह इसलिए है कि उसने समझ लिया है कि जनसंख्या अनुपात पर आधारित परिसीमन के जरिए, उत्तरी तथा पश्चिमी भारत के अपने गढ़ों का तुलनीय राजनीतिक वजन और बढ़ाने के जरिए ही, वह 2029 के चुनाव में अपनी जीत पक्की कर सकती है।

 

2024 के चुनाव नतीजों ने उसके आत्मविश्वास को हिला दिया है। इसीलिए, उसे सब कुछ चाहिए। उसे अपनी जेब में चुनाव आयोग भी चाहिए। उसे अपने अनुकूल मतदाता सूची भी चाहिए, जिसमें से उसकी नजरों में ‘गैर-भरोसेमंद’ मतदाताओं को छांटा जा चुका हो। उसे मतगणना तक मनमानी चाहिए। और इस सब के ऊपर से, ऐसा परिसीमन भी चाहिए, जिसमें ‘असहयोगी’ दक्षिण को छोटा किया जाए और चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं इस तरह इलाके छांट-छांटकर बनायी जाएं, जिससे विरोधियों का दायरा छोटे से छोटा हो जाए और उसका दायरा बड़े से बड़ा। परिसीमन का यह संघी मॉडल देश, असम और जम्मू-कश्मीर में देख भी चुका है।

 

बेशक, महिला आरक्षण को लागू करने की आड़ में, परिसीमन लागू करने के इस खेल को, संसद के पिछले सत्र में एकजुट विपक्ष ने शिकस्त दे दी थी। लेकिन, उसके बाद से विपक्ष की न उतनी ताकत रह गयी है और न विपक्ष उतना एकजुट नजर आता है। वास्तव में तृणमूल की टूट और द्रमुक के इंडिया ब्लाक से अलग होने ने ही, संघ-भाजपा में इसकी उम्मीदें जगायी लगती हैं कि वे एक बार फिर परिसीमन का रास्ता खोल सकते हैं और अगला आम चुनाव अपनी झोली में डाल सकते हैं। लेकिन, ठाकरे की शिव सेना की मुस्तैदी ने और द्रमुक के संघवाद के सिद्घांतों पर समझौता नहीं करने के ऐलान ने, संंघ-भाजपा के इस संभावित खेल को विफल करने की शुरूआत भी तो कर दी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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