गोदरेज डीईआई लैब रिपोर्ट का खुलासा: कार्यस्थलों में सबसे बड़ी बाधाएं वे हैं, जो दिखाई नहीं देतीं

रिपोर्ट में चार-स्तंभों वाला फ्रेमवर्क पेश किया गया है, जो संगठनों को केवल नियमों के पालन से आगे बढ़कर सभी के लिए अनुकूल कार्यस्थल बनाने में मदद करेगा

मुंबई, 17 जुलाई 2026: ‘डिसएबिलिटी प्राइड मंथ’ (दिव्यांग गौरव माह) के अवसर पर गोदरेज इंडस्ट्रीज़ समूह की विविधता, समानता और समावेशन (Diversity, Equity and Inclusion – DEI) पहल ‘गोदरेज डीईआई लैब’ ने अपनी नवीनतम शोध रिपोर्ट ‘भारतीय कॉरपोरेट कार्यस्थलों में सुलभता और समावेशन: ऐसे कार्यस्थलों की रूपरेखा जो सभी के लिए कारगर हों’ जारी की है। यह रिपोर्ट डीईआई लैब की शोधकर्ता पुष्णामी कस्तूरे ने तैयार की है।यह रिपोर्ट विभिन्न उद्योगों के दिव्यांग कर्मचारियों, एचआर (HR) पेशेवरों, एक्सेसिबिलिटी कंसलटेंट्स, आर्किटेक्ट्स और DEI विशेषज्ञों के वास्तविक अनुभवों पर आधारित है। रिपोर्ट से पता चलता है कि हालांकि संगठनों ने भौतिक पहुंच (जैसे रैंप या लिफ्ट) में सुधार करने में स्पष्ट प्रगति की है, लेकिन कर्मचारियों को आज भी जिन सबसे बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ता है, वे अदृश्य हैं—जो डिजिटल सिस्टम और कार्यस्थल की संस्कृति (वर्कप्लेस कल्चर) में गहराई से जुड़ी हुई हैं।दिव्यांगजनों का समावेशन अब केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि व्यावसायिक आवश्यकता भी बन गया है। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (IBEF) के अनुसार, भारत में अनुमानित 3 करोड़ दिव्यांग व्यक्तियों में से केवल 11.3% ही रोजगार में हैं, जबकि रोजगार योग्य लगभग 70% दिव्यांग अब भी बेरोजगार हैं (सेंटर फॉर लेबर लॉज़, एनएलआईयू)। वहीं, एक्सेंचर के वैश्विक अध्ययन के अनुसार, दिव्यांग-अनुकूल संगठनों की आय 28% अधिक, लाभ मार्जिन 30% अधिक और शुद्ध आय अपने समकक्ष संगठनों की तुलना में लगभग दोगुनी होती है। यह दर्शाता है कि सुलभता केवल समावेशन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यावसायिक सफलता का भी महत्वपूर्ण आधार है।

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वास्तविक सुलभता केवल रैंप और भवन संबंधी सुविधाओं तक सीमित नहीं है। गोदरेज डीईआई लैब की रिपोर्ट कार्यस्थलों को वास्तव में समावेशी बनाने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव देती है, जिनमें सुलभ एचआर प्लेटफॉर्म, कैप्शन-सक्षम बैठकें, सभी के लिए सहज संचार और ऐसी कार्य-संस्कृति विकसित करना शामिल है, जहां दिव्यांग कर्मचारी आत्मविश्वास के साथ भागीदारी कर सकें, योगदान दे सकें और अपने करियर में आगे बढ़ सकें।

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रिपोर्ट के लॉन्च पर बोलते हुए, गोदरेज DEI लैब के प्रमुख, परमेश शहानी ने कहा: “एक्सेसिबिलिटी को अक्सर सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर के नजरिए से देखा जाता है। हमारा शोध दिखाता है कि वास्तव में समावेशी कार्यस्थल तकनीक, संचार और संस्कृति के माध्यम से भी उतने ही बनते हैं, जितने कि रैंप या लिफ्ट के माध्यम से। जैसे-जैसे संगठन काम के भविष्य पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं, एक्सेसिबिलिटी एक ऐसा अवसर देती है जिससे हम ऐसे सिस्टम तैयार कर सकें जो सभी के लिए बेहतर काम करें। हमें उम्मीद है कि यह रिपोर्ट उन बिजनेस लीडर्स के लिए एक व्यावहारिक गाइड का काम करेगी जो समावेशन को अपने संगठनों के काम करने और बढ़ने के तरीके में शामिल करना चाहते हैं।”इन जानकारियों के आधार पर, गोदरेज DEI लैब की रिपोर्ट में एक फोर-पिलर फ्रेमवर्क (चार स्तंभों का ढांचा) पेश किया गया है, जिसमें भौतिक (Physical), डिजिटल (Digital), संचार (Communication) और व्यावहारिक (Attitudinal) पहुंच शामिल है। यह संगठनों को एक ऐसा रोडमैप तैयार करने में मदद करता है जो केवल कानूनी नियमों के पालन से आगे जाता है, और समावेशन को हर उस चीज़ में शामिल करता है जिससे कार्यस्थल चलते हैं, तकनीक काम करती है और संस्कृति का निर्माण होता है।‘भारतीय कॉरपोरेट कार्यस्थलों में सुलभता और समावेशन’ शीर्षक वाली यह पूरी रिपोर्ट www.godrejdeilab.com पर उपलब्ध है।

 

 

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