ईरान तनाव पर अमेरिका को झटका: फ्रांस, इटली समेत 5 देशों ने बनाई दूरी

ट्रंप की मिडिल ईस्ट रणनीति पर सवाल: सऊदी अरब और तुर्की ने नहीं दिया साथ

ईरान को लेकर बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों से बड़ा झटका लगा है। मिडिल ईस्ट में सैन्य दबाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे डोनाल्ड ट्रंप को यूरोप और खाड़ी क्षेत्र से उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिल पाया है। कई देशों ने साफ कर दिया है कि वे युद्ध के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देंगे।

फ्रांस ने सैन्य कमान ठुकराई

फ्रांस ने स्पष्ट कहा है कि वह अपनी सेना को अमेरिकी कमान के अधीन नहीं रखेगा। पेरिस का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता केवल बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के जरिए ही संभव है। फ्रांस ने संकेत दिया है कि किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति आवश्यक है।

इटली ने लाल सागर मिशन से दूरी बनाई

इटली ने भी अमेरिकी नेतृत्व वाले लाल सागर मिशन में शामिल होने से इनकार कर दिया। रोम की सरकार ने कहा कि वह केवल रक्षात्मक कदमों का समर्थन करेगी, न कि किसी आक्रामक सैन्य अभियान का। इटली का रुख बताता है कि यूरोप में युद्ध को लेकर गंभीर मतभेद उभर रहे हैं।

स्पेन का सख्त रुख

स्पेन ने अमेरिकी नेतृत्व वाले किसी भी एकतरफा सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से मना कर दिया है। मैड्रिड का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय सहमति और संयुक्त राष्ट्र के दायरे से बाहर की गई कार्रवाई वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा हो सकती है।

तुर्की ने रखी तटस्थता

तुर्की, जो नाटो का अहम सदस्य है, ने अमेरिका की युद्ध नीतियों की आलोचना की है। अंकारा ने इस संघर्ष में तटस्थ रहने का फैसला किया है, जिससे नाटो की एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सऊदी अरब ने बदली प्राथमिकताए

सऊदी अरब ने भी इस बार सीधे सैन्य समर्थन से दूरी बनाई है। रियाद का कहना है कि वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति वार्ता को प्राथमिकता देगा। दशकों पुराने सहयोग के बावजूद यह फैसला अमेरिका की मिडिल ईस्ट रणनीति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

बढ़ती दरार और कूटनीतिक दबाव

इन पांच देशों के रुख से साफ है कि वैश्विक स्तर पर सैन्य कार्रवाई को लेकर समर्थन कम होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका बिना व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति के आगे बढ़ता है, तो उसे न केवल कूटनीतिक बल्कि आर्थिक और सामरिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है।स्थिति यह दर्शाती है कि मिडिल ईस्ट में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच मतभेद गहराते जा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि वॉशिंगटन कूटनीति का रास्ता अपनाता है या अपने दम पर रणनीति आगे बढ़ाता है।

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