1 के बदले 115 की ताकत: सस्ते ड्रोन ने कैसे अमेरिका की नाक में दम किया, ट्रंप के लिए बना नई मुसीबत

115 for 1: How cheap drones have become a thorn in America's side, creating new trouble for Trump

ईरान पर हमला शुरू हुए तीन हफ्ते से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन युद्ध खत्म होने के कोई साफ संकेत नहीं दिख रहे। शुरुआत में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उम्मीद थी कि तेज बमबारी और मिसाइल हमलों के जरिए तेहरान की सत्ता को कमजोर किया जा सकेगा। मगर हालात उल्टे पड़ते नजर आ रहे हैं।ईरान न केवल एकजुट दिखाई दे रहा है बल्कि उसकी सेना लगातार अमेरिका और इजरायल के हमलों का जवाब दे रही है। हालात इतने जटिल हो गए हैं कि अब वॉशिंगटन इस युद्ध से निकलने का रास्ता तलाशता दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में नाटो के युद्धपोतों की मांग भी की गई, लेकिन सहयोगियों ने इसमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।इस पूरे संघर्ष में एक ऐसा हथियार सामने आया है जिसने दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति को भी मुश्किल में डाल दिया है—और वह है सस्ता हमला करने वाला ड्रोन।37 करोड़ बनाम 32 लाख: युद्ध की नई गणित

आज के युद्ध में सबसे बड़ा फर्क लागत का है। अमेरिका या इजरायल अगर ईरान से आए किसी ड्रोन को गिराना चाहते हैं तो उन्हें पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल जैसे सिस्टम का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक ऐसी मिसाइल की कीमत करीब 4 मिलियन डॉलर यानी लगभग 37 करोड़ रुपये होती है।इसके मुकाबले ईरान के एक वन-वे अटैक ड्रोन की कीमत करीब 35 हजार डॉलर, यानी लगभग 32 लाख रुपये है।
यानी जिस रकम में अमेरिका एक मिसाइल दागता है, उतने पैसों में ईरान करीब 115 ड्रोन तैयार कर सकता है। यही असमानता इस युद्ध का सबसे बड़ा रणनीतिक संकट बन गई है।एक महीने में 10 हजार ड्रोन बनाने की क्षमता
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक संघर्ष के पहले ही हफ्ते में ईरान ने 1,000 से ज्यादा ड्रोन लॉन्च किए थे। अनुमान है कि तेहरान हर महीने करीब 10,000 ड्रोन बनाने की क्षमता रखता है।यही वजह है कि ये सस्ते ड्रोन न केवल ट्रंप बल्कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए भी बड़ी चुनौती बन गए हैं। लगातार इंटरसेप्टर मिसाइलें दागने से खर्च तेजी से बढ़ रहा है, जबकि ईरान कम लागत में बड़ी संख्या में हमले कर पा रहा है।उधर तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव बढ़ने से वैश्विक दबाव भी बढ़ रहाहै।

आसमान में बदला युद्ध का खेल
कई दशकों तक हवाई युद्ध पर उन्हीं देशों का दबदबा रहा जिनके पास महंगे और आधुनिक लड़ाकू विमान थे। अमेरिका ने लंबे समय से दुनिया के सबसे अत्याधुनिक विमान अपने बेड़े में शामिल कर रखे हैं और उन पर भारी बजट खर्च करता रहा है।
इस संघर्ष में भी अमेरिका ने कई हाई-टेक सिस्टम तैनात किए हैं—
पहली बार बड़े पैमाने पर F-35 लड़ाकू विमान इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
B-2 स्टील्थ बॉम्बर जैसे लंबी दूरी के विमान 40,000 पाउंड तक बम ले जाने में सक्षम हैं।
B-1 बॉम्बर, जिसे “बोन” कहा जाता है, 75,000 पाउंड तक युद्ध सामग्री और 24 क्रूज मिसाइलें ले जा सकता है।
निगरानी और ईंधन भरने वाले विशेष विमान भी तैनात किए गए हैं।अमेरिका के मानवरहित सिस्टम में रीपर ड्रोन और नया FLM-136 LUCAS ड्रोन शामिल हैं।
लेकिन इन सबके बावजूद सस्ते ड्रोन की बाढ़ ने पारंपरिक सैन्य ताकत की सीमाएं उजागर कर दी हैं।

संख्या की रणनीति
ईरान ने पिछले कई सालों से अपने सहयोगी संगठनों और देशों के लिए ड्रोन विकसित किए हैं। अब वही तकनीक बड़े पैमाने पर खुद इस्तेमाल की जा रही है।
रणनीति बेहद सरल है—सटीकता से ज्यादा संख्या पर भरोसा। एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन लॉन्च कर दिए जाते हैं ताकि दुश्मन की हवाई सुरक्षा प्रणाली पर दबाव बढ़ जाए। कुछ ड्रोन भले ही गिरा दिए जाएं, लेकिन कई अपने लक्ष्य तक पहुंच ही जाते हैं।

यूक्रेन युद्ध से मिला सबक
हाल के वर्षों में युद्ध की तकनीक तेजी से बदली है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा संघर्ष इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। शुरुआत में टैंक और भारी तोपखाने निर्णायक माने जा रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे लड़ाई ड्रोन युद्ध में बदल गई।
कई सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि रूस को होने वाले लगभग 70 प्रतिशत नुकसान के पीछे ड्रोन हमले ही जिम्मेदार रहे हैं।

अमेरिका के लिए रणनीतिक समस्या
अमेरिका के अत्याधुनिक विमानों को उड़ाने के लिए बेहद प्रशिक्षित पायलटों की जरूरत होती है। उदाहरण के तौर पर F-15 जैसे दो सीट वाले लड़ाकू विमान को उड़ाने के लिए पायलटों को वर्षों तक महंगी ट्रेनिंग देनी पड़ती है।
अगर ऐसा विमान गिर जाता है तो नुकसान केवल मशीन का नहीं होता—बल्कि प्रशिक्षित क्रू का भी होता है।
इसके उलट ड्रोन दूर से नियंत्रित होते हैं। अगर ड्रोन नष्ट भी हो जाए तो ऑपरेटर सुरक्षित रहता है और उसकी जगह नया ड्रोन लाना अपेक्षाकृत बेहद सस्ता होता है।
यही कारण है कि आज के युद्ध में एक नया असंतुलन पैदा हो गया है—हमला करना सस्ता, लेकिन बचाव बेहद महंगा।

अब अमेरिका की नई रणनीति
इस चुनौती को देखते हुए वॉशिंगटन अब तेजी से सस्ते और छोटे सैन्य ड्रोन विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। “लो-कॉस्ट अनक्रूड कॉम्बैट एरियल सिस्टम” यानी LUCAS जैसे प्रोजेक्ट्स को सामान्य प्रक्रिया से कहीं ज्यादा तेजी से मंजूरी दी जा रही है।विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में युद्ध का स्वरूप और भी बदल सकता है, जहां अरबों डॉलर के लड़ाकू विमानों के मुकाबले हजारों सस्ते ड्रोन युद्ध के मैदान में निर्णायक भूमिका निभाते दिखाई देंगे।

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