Azamgarh News: जब बुज़ुर्गों के साथ बैठकर खाना खाने लगे इंजीनियर सुनील यादव, नम हो गईं सबकी आंखें

आजमगढ़ बलरामपुर/पटवध से बबलू राय
जब बुज़ुर्गों के साथ बैठकर खाना खाने लगे इंजीनियर सुनील यादव, नम हो गईं सबकी आंखें
आजमगढ़ ,कहते हैं कि इंसान की असली पहचान उसके पद, पैसे या शोहरत से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और संवेदनाओं से होती है। कुछ ऐसा ही भावुक और इंसानियत से भरा दृश्य आजमगढ़ जिले के फरिहा स्थित वृद्धाश्रम में देखने को मिला, जब समाजसेवी एवं उद्यमी सुनील कुमार यादव वहां पहुंचे और बुज़ुर्गों के बीच अपना समय बिताकर उनके चेहरों पर मुस्कान लौटा दी।
वृद्धाश्रम में प्रवेश करते ही इंजीनियर सुनील कुमार यादव ने वहां रह रहे बुज़ुर्गों का हालचाल जाना और बेहद आत्मीयता के साथ उनसे बातचीत की। कई बुज़ुर्ग ऐसे थे जिनकी आंखों में अपनों से बिछड़ने का दर्द साफ झलक रहा था, लेकिन जैसे ही सुनील यादव उनके पास जाकर बैठे, उनके चेहरे खिल उठे। किसी ने उन्हें बेटे जैसा दुलार दिया तो किसी ने अपने दर्द भरे जीवन की कहानी सुनाई।
सबसे भावुक पल तब आया जब इंजीनियर सुनील कुमार यादव ने अपने हाथों से बुज़ुर्गों को भोजन कराया और फिर खुद भी उन्हीं के साथ जमीन पर बैठकर उसी थाली का भोजन किया। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों को भावुक कर गया। ऐसा लग रहा था मानो कोई बेटा अपने माता-पिता के साथ बैठकर खाना खा रहा हो। इस अपनत्व ने वृद्धाश्रम के माहौल को पूरी तरह भावनाओं से भर दिया।
इस दौरान उन्होंने वृद्धजनों को अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित भी किया और भरोसा दिलाया कि समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो उन्हें अकेला नहीं मानते। उनके इस स्नेह और सम्मान से कई बुज़ुर्गों की आंखें नम हो गईं। कुछ बुज़ुर्गों ने कहा कि वर्षों बाद किसी ने इतनी आत्मीयता से उनका हाल पूछा है।
मीडिया से बातचीत में सुनील कुमार यादव ने कहा कि माता-पिता की सेवा करना हर संतान का पहला धर्म और कर्तव्य है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि लगातार बढ़ते वृद्धाश्रम समाज के बदलते संस्कारों की दर्दनाक तस्वीर पेश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा—
“जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को जन्म दिया, उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, अपने सपनों का त्याग कर उन्हें काबिल बनाया, आज वही माता-पिता अपनों से दूर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। अगर बचपन में माता-पिता भी अपने बच्चों को यूं ही छोड़ देते, तो शायद उनका भविष्य ही अंधकार में होता।”
उन्होंने समाज से भावुक अपील करते हुए कहा कि मानवता को शर्मसार मत होने दीजिए। अपने माता-पिता और बुज़ुर्गों का सम्मान कीजिए, क्योंकि यही हमारी संस्कृति, संस्कार और भारतीय सभ्यता की असली पहचान है।
इंजीनियर सुनील कुमार यादव का यह मानवीय कदम अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोगों के लिए प्रेरणा का संदेश दे रहा है कि इंसानियत आज भी जिंदा है, बस उसे महसूस करने वाले दिल चाहिए।



