आजमगढ़:रक्षाबंधन का पर्व आध्यात्मिक, आंतरिक और बाह्य सभी मूल्यों की रक्षा के संकल्प का प्रतीक
Azamgarh: The festival of Rakshabandhan symbolizes the resolve to protect all spiritual, internal and external values.
ठेकमा, आजमगढ़।रक्षाबंधन का आध्यात्मिक अर्थ केवल भाई-बहन के पारिवारिक संबंध तक सीमित नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पर्व मनुष्य को बाहरी संबंधों की रक्षा के साथ-साथ अपने भीतर के सद्गुणों, आत्मसंयम और धर्म की रक्षा करने का संदेश देता है। जब हम ‘रक्षा’ और ‘बंधन’ शब्दों की मीमांसा करते हैं, तब रक्षाबंधन का वास्तविक एवं सार्वभौमिक अर्थ हमारे सामने आता है।‘रक्षा’ का सामान्य अर्थ किसी को संकट से बचाना है। किंतु आध्यात्मिक अर्थ में रक्षा का तात्पर्य अज्ञान से ज्ञान की, अधर्म से धर्म की, विकारों से मन की और असत्य से सत्य की रक्षा करना है। अर्थात मनुष्य को अपने भीतर के अच्छे संस्कारों को नष्ट होने से बचाना चाहिए।सामान्यतः ‘बंधन’ शब्द सुनकर किसी वस्तु से बंध जाने का भाव उत्पन्न होता है, लेकिन रक्षाबंधन प्रेम और संकल्प का बंधन है। यह ऐसा बंधन है, जो मनुष्य को उसके वास्तविक कर्तव्यों—कर्म, प्रेम, करुणा, दया, धर्म, सदाचार और आत्मीयता—से जोड़ता है। राखी का बंधन व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से ही नहीं, बल्कि अपने श्रेष्ठ कर्तव्यों से भी जोड़ता है।इन श्रेष्ठ कर्तव्यों में धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय-निग्रह, धैर्य, विद्या, सत्य, क्रोध पर नियंत्रण, परोपकार तथा कमजोर, असहाय और निर्बल लोगों की सहायता एवं रक्षा शामिल है। परिवार, समाज, प्रदेश और देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना भी इसी भावना का हिस्सा है। इस अर्थ में राखी केवल धागा नहीं, बल्कि संकल्प का सूत्र है।राखी का धागा भले ही बहुत साधारण होता है, लेकिन उसका संदेश और आदर्श अत्यंत उच्च एवं महान होता है। इसका महत्व केवल भाई-बहन के पवित्र संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक रूप से समस्त जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी से भी जुड़ा है।आध्यात्मिक दृष्टि से यह किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति, जीव, वस्तु अथवा प्रकृति की रक्षा के प्रति लिया गया संकल्प हो सकता है। जब राखी बांधी जाती है, तो उसके पीछे यह भावना हो सकती है कि मैं अपने संबंधों की पवित्रता बनाए रखूंगा, संकट में साथ दूंगा और अपने आचरण से इस संबंध का सम्मान करूंगा। इसलिए राखी केवल धागा नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रतिज्ञा का प्रतीक है।
आंतरिक रक्षा का संदेश
बाहरी रक्षा से आंतरिक रक्षा की ओर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होता है कि रक्षाबंधन का सबसे गहरा आध्यात्मिक संदेश यह है कि मनुष्य केवल दूसरों की रक्षा की चिंता न करे, बल्कि अपने मन की भी रक्षा करे। जब मनुष्य का स्वयं का मन स्वस्थ और संतुलित नहीं होगा, तो वह किसी अन्य व्यक्ति की रक्षा और सुरक्षा के प्रति कैसे संकल्पित हो सकता है?भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में मन को मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण माना गया है। इसलिए मनुष्य को अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विकारों से स्वयं की रक्षा करनी चाहिए। इस अर्थ में वास्तविक रक्षाबंधन आत्मसंयम का भी पर्व बन जाता है।भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में आत्मा को मूलतः शुद्ध माना गया है। मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले नकारात्मक विचार और विकार उसके आचरण को प्रभावित करते हैं। इसलिए रक्षाबंधन का आध्यात्मिक संदेश यह भी हो सकता है कि मनुष्य अपने भीतर स्थित प्रकाश को अज्ञान और विकारों से सुरक्षित रखे। यह बाहरी सुरक्षा से कहीं अधिक गहरी आत्म-सुरक्षा है।
भाई-बहन के संबंध से व्यापक है इसका संदेश
भाई-बहन का संबंध हमें यह सिखाता है कि रिश्ते केवल अधिकार पर आधारित नहीं होने चाहिए। उनमें प्रेम, विश्वास, त्याग, कर्तव्य और सम्मान का समन्वय होना चाहिए। आध्यात्मिक दृष्टि से प्रत्येक संबंध मनुष्य के लिए प्रेम और सेवा का अभ्यास बन सकता है।अहंकार का विसर्जन सभी आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों में सर्वोपरि है। अहंकार का विसर्जन किए बिना किसी भी धर्म-कर्म को पूर्णता प्रदान करना कठिन है। रक्षाबंधन हमें यह भी याद दिलाता है कि केवल ‘मुझे क्या मिलेगा?’ सोचने के बजाय ‘मैं दूसरे के लिए क्या कर सकता हूं?’ की भावना विकसित करनी चाहिए। यही भावना धीरे-धीरे स्वार्थ को कम करके सेवा और करुणा की ओर ले जाती है।रक्षाबंधन का एक महत्वपूर्ण संदेश स्त्री के प्रति सम्मान भी है। आध्यात्मिक अर्थ में बहन केवल ‘रक्षा पाने वाली’ नहीं है। वह स्वयं प्रेम, शक्ति, बुद्धि और आत्मसम्मान की स्वतंत्र सत्ता है। इसलिए रक्षाबंधन का आधुनिक आध्यात्मिक संदेश यह होना चाहिए कि स्त्री की सुरक्षा के साथ-साथ उसकी स्वतंत्रता, गरिमा और सम्मान की रक्षा भी आवश्यक है।
मानवता और प्रकृति की रक्षा का संकल्प
यदि रक्षाबंधन को परिवार से आगे बढ़ाकर देखा जाए, तो इसका संदेश अत्यंत व्यापक हो जाता है। मनुष्य मनुष्य की रक्षा करे, बलवान निर्बल की रक्षा करे, समाज प्रकृति की रक्षा करे, मनुष्य अपने संस्कारों की रक्षा करे और प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के सत्य की रक्षा करे।तब राखी केवल भाई-बहन की कलाई पर बंधा धागा नहीं रह जाती, बल्कि मानवता को जोड़ने वाला आध्यात्मिक सूत्र बन जाती है।रक्षाबंधन का आध्यात्मिक सार एक वाक्य में इस प्रकार कहा जा सकता है— “रक्षाबंधन हमें स्मरण कराता है कि जिस प्रकार हम अपने प्रिय संबंधों की रक्षा का संकल्प लेते हैं, उसी प्रकार हमें अपने भीतर के सत्य, प्रेम, करुणा, सदाचार और आत्मस्वरूप की भी रक्षा करनी चाहिए।”इस दृष्टि से रक्षाबंधन वास्तव में धर्म, प्रेम और आत्मसंयम से स्वयं को बांधने का पर्व है।आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी भारतीय वर्तमान समस्याओं से जूझ रहे भारतवर्ष की रक्षा का भी संकल्प लें। ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई, लुप्त होते पशु-पक्षियों, प्रदूषित होती नदियों, दूषित होती पृथ्वी, जल और वायुमंडल की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास करें। यही संकल्प हमें एक जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील मानव बनने की दिशा में आगे ले जाएगा।लेखक शोध छात्र अखिलानन्द उपाध्याय (नेट, पीएचडी)



