झारखंड में प्रशासनिक सक्रियता: क्या जमीनी हकीकत बदलेगी?

Administrative activism in Jharkhand: Will the ground reality change?

पलामू से मधुलता की रिपोर्ट:
झारखंड में इन दिनों प्रशासनिक सक्रियता स्पष्ट रूप से बढ़ी हुई दिखाई दे रही है। विभिन्न जिलों विशेषकर पलामू, रांची और पश्चिमी सिंहभूम में अधिकारियों द्वारा लगातार निरीक्षण, जनसंवाद कार्यक्रम और योजनाओं की समीक्षा की जा रही है। यह पहल निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ये प्रयास स्थायी बदलाव में तब्दील हो पाएंगे? जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) की निगरानी को लेकर प्रशासन ने सख्ती दिखाई है। राशन दुकानों पर औचक निरीक्षण किए जा रहे हैं और अनियमितताओं पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। यह कदम जरूरी भी है, क्योंकि राज्य के गरीब और वंचित तबकों के लिए पीडीएस जीवनरेखा की तरह है। फिर भी, यह भी उतना ही सच है कि वर्षों से चली आ रही व्यवस्था की खामियों को केवल निरीक्षणों के जरिए पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। इसी तरह, मनरेगा और अन्य केंद्र प्रायोजित योजनाओं की समीक्षा में तेजी लाई गई है। सड़कों, तालाबों और स्वास्थ्य केंद्रों जैसी बुनियादी परियोजनाओं पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन जमीनी स्तर पर अक्सर देखा गया है कि योजनाएं कागजों पर अधिक और धरातल पर कम नजर आती हैं। ऐसे में निगरानी के साथ-साथ जवाबदेही तय करना भी उतना ही आवश्यक है। भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान को लेकर राज्य सरकार की चिंता भी जायज है। पेयजल, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर दिए गए निर्देश दर्शाते हैं कि प्रशासन संवेदनशील है। परंतु दूरदराज और आदिवासी इलाकों में इन सुविधाओं की उपलब्धता आज भी चुनौती बनी हुई है। इन क्षेत्रों में केवल निर्देश नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। जनता दरबार जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों की समस्याओं को सीधे सुनने की पहल लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है। यह प्रशासन और जनता के बीच विश्वास बढ़ाने का एक सकारात्मक प्रयास है। हालांकि, इन शिकायतों के समाधान की गति और गुणवत्ता ही इसकी वास्तविक सफलता तय करेगी। झारखंड की सामाजिक-आर्थिक संरचना और आदिवासी बहुलता को देखते हुए यहां नीतियों का क्रियान्वयन विशेष संवेदनशीलता और स्थानीय समझ के साथ होना चाहिए। केवल ऊपर से निर्देश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि निचले स्तर पर तंत्र को सक्षम और जवाबदेह बनाना होगा। अंततः, यह कहा जा सकता है कि प्रशासनिक सक्रियता एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसे निरंतरता, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ जोड़ना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह प्रयास भी महज औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। झारखंड के विकास की असली कसौटी यही है कि सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर आम लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला पाएं।

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