पत्रकारों से रेलवे रियायत छीनना: लोकतंत्र की आवाज़ को कमजोर करने का निर्णय लेखक: हृदयानंद मिश्र

Withdrawing railway concessions from journalists: A decision to weaken the voice of democracy Author: Hridayananda Mishra

हृदयानंद मिश्र एडवोकेट की कलम से।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। पत्रकार समाज और सत्ता के बीच संवाद का माध्यम होते हैं। वे गांवों, कस्बों और दूरदराज़ के क्षेत्रों की समस्याओं को सरकार और जनता तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। ऐसे में पत्रकारों को रेलवे यात्रा में मिलने वाली रियायत को समाप्त कर देना न केवल एक प्रशासनिक निर्णय है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाला कदम भी है। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पत्रकारों को रेलवे आरक्षण में मिलने वाली रियायत समाप्त किए जाने का निर्णय उन अनेक फैसलों में शामिल है, जिन्होंने पत्रकारिता की स्वतंत्रता और उसके सामाजिक दायित्वों को प्रभावित किया है। यह निर्णय विशेष रूप से आंचलिक और ग्रामीण पत्रकारों के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध हुआ है।

 

Withdrawing railway concessions from journalists: A decision to weaken the voice of democracy Author: Hridayananda Mishra
आंचलिक पत्रकार सबसे अधिक प्रभावित
दिल्ली, मुंबई या बड़े महानगरों में कार्यरत पत्रकारों के पास संस्थागत संसाधन, बेहतर वेतन और यात्रा सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। लेकिन देश के लाखों आंचलिक पत्रकारों की स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। वे सीमित संसाधनों में काम करते हैं। अनेक पत्रकार ऐसे हैं जो नियमित वेतन तक नहीं पाते। कई तो केवल मानदेय या विज्ञापन कमीशन पर निर्भर रहते हैं। ऐसे पत्रकारों के लिए रेलवे रियायत कोई विशेषाधिकार नहीं थी, बल्कि उनके पेशेगत दायित्वों को निभाने का एक आवश्यक साधन थी। वे किसी दुर्घटना,

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बाढ़, सूखा, चुनाव, आंदोलन या सामाजिक घटना की रिपोर्टिंग के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते थे। रियायत समाप्त होने के बाद उनके लिए यह कार्य और कठिन हो गया है।
लोकतंत्र के प्रहरी की उपेक्षा
सरकारें अक्सर पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताती हैं। लेकिन जब सुविधाओं और अधिकारों की बात आती है तो सबसे पहले पत्रकारों को ही निशाना बनाया जाता है। पत्रकारों की रेलवे रियायत समाप्त करना इसी मानसिकता को दर्शाता है।

यदि एक सांसद, विधायक, मंत्री और विभिन्न श्रेणियों के सरकारी कर्मचारियों को यात्रा संबंधी अनेक सुविधाएं मिल सकती हैं, तो समाज और राष्ट्र के हित में कार्य करने वाले पत्रकारों को यह सुविधा क्यों नहीं मिलनी चाहिए? आखिर वह कौन सा तर्क है जिसके आधार पर पत्रकारों को मिलने वाली सीमित रियायत भी समाप्त कर दी गई?

ग्रामीण भारत की आवाज़ दबाने का प्रयास

आज भी भारत की बड़ी आबादी गांवों में निवास करती है। ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को सामने लाने का कार्य मुख्यतः स्थानीय और क्षेत्रीय पत्रकार ही करते हैं। जब उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होगी तो वे घटनास्थल तक पहुंचने में असमर्थ होंगे। परिणामस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श से बाहर रह जाएंगे। पत्रकारिता केवल समाचार प्रकाशित करना नहीं है, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज़ बनना भी है। यदि पत्रकार आर्थिक रूप से असुरक्षित होंगे तो उनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता भी प्रभावित होगी।
बंधुआ मजदूर जैसी होती जा रही स्थिति
आज अनेक आंचलिक पत्रकारों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। उन्हें न पर्याप्त वेतन मिलता है, न सामाजिक सुरक्षा, न बीमा और न ही सम्मानजनक सेवा शर्तें। कई पत्रकार अपने निजी खर्च पर रिपोर्टिंग करते हैं। कई बार तो समाचार संकलन के लिए उन्हें अपनी जेब से यात्रा और संचार का खर्च उठाना पड़ता है। ऐसे हालात में रेलवे रियायत समाप्त करना उनके ऊपर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने जैसा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बड़ी संख्या में आंचलिक पत्रकार आज बंधुआ मजदूरों जैसी परिस्थितियों में कार्य करने को विवश हैं। उनसे निरंतर काम लिया जाता है, लेकिन उनके अधिकारों और सुविधाओं की चिंता कोई नहीं करता।

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प्रेस की स्वतंत्रता पर अप्रत्यक्ष प्रहार

लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता केवल कानूनी अधिकारों से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए आर्थिक और संस्थागत समर्थन भी आवश्यक होता है। जब पत्रकारों के संसाधन कम किए जाते हैं तो उनकी कार्यक्षमता और स्वतंत्रता दोनों प्रभावित होती हैं।
रेलवे रियायत समाप्त करना एक ऐसा कदम है जो प्रत्यक्ष रूप से भले प्रेस स्वतंत्रता पर हमला न दिखे, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव पत्रकारिता की गुणवत्ता और पहुंच पर अवश्य पड़ते हैं।

सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए

समय की मांग है कि केंद्र सरकार पत्रकारों को रेलवे यात्रा में मिलने वाली रियायत को पुनः बहाल करे। साथ ही आंचलिक पत्रकारों के लिए विशेष कल्याणकारी योजनाएं बनाई जाएं। पत्रकार सुरक्षा कानून, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों की दिशा में भी गंभीर पहल की जानी चाहिए। लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। वह मजबूत होता है स्वतंत्र पत्रकारिता, जागरूक नागरिकों और जवाबदेह शासन से। यदि पत्रकार कमजोर होंगे तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा। पत्रकारों से रेलवे रियायत छीनना केवल एक सुविधा समाप्त करना नहीं है, बल्कि उन लोगों की कठिनाइयों को बढ़ाना है जो दिन-रात समाज और देश की सच्चाइयों को सामने लाने का कार्य करते हैं। विशेष रूप से आंचलिक पत्रकारों के लिए यह निर्णय एक गंभीर कुठाराघात साबित हुआ है। सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की मजबूती पत्रकारों की मजबूती से जुड़ी हुई है।

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पत्रकारों को सुविधाएं देना कोई उपकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में किया गया निवेश है। यदि सरकार वास्तव में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे इस निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए पत्रकारों की रेलवे रियायत को तत्काल बहाल करना चाहिए।
(लेखक – हृदयानंद मिश्र एडवोकेट एवं सदस्य कोऑर्डिनेशन कमिटी झारखंड प्रदेश कांग्रेस)

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