अनुच्छेद 142: झुकी सत्ता या लोकतंत्र?
Article 142: Bowing to power or democracy?

संजय पांडेय@राजनीतिक विश्लेषक:
लोकतांत्रिक संवैधानिक शासन के इतिहास में अनेक ऐसे अवसर आए हैं, जब न्यायपालिका ने कार्यपालिका की शक्तियों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में रखा, राज्य को यह याद दिलाया कि वह भी कानून के शासन के अधीन है और जनदबाव के कारण सरकारों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना पड़ा। लेकिन इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक लोकतंत्र के इतिहास में कभी ऐसा हुआ है कि किसी सरकार ने स्वयं सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर अपनी असाधारण संवैधानिक शक्तियों का उपयोग उन आपराधिक मामलों को समाप्त करने के लिए करने का अनुरोध किया हो, जिन्हें स्वयं राज्य ने दर्ज किया था और जिनके कारण सड़कों पर नए जनदबाव की आशंका उत्पन्न हो रही थी?
यह मामला केवल एफआईआर रद्द करने तक सीमित नहीं है। यह संस्थागत स्वायत्तता, कानून के शासन और राज्य की वैधता से जुड़ा एक बुनियादी प्रश्न है। यदि आपराधिक अभियोजन का परिणाम कानूनी जांच के बजाय जनदबाव, राजनीतिक परिस्थितियों या संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति के भय से तय होने लगे, तो संवैधानिक लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत गंभीर संकट में पड़ जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम में अनुच्छेद 142 सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक विरोधाभास के रूप में सामने आता है। यही वह प्रावधान है जो सर्वोच्च न्यायालय को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए असाधारण कदम उठाने की शक्ति देता है। विडंबना यह है कि कार्यपालिका आज उसी शक्ति की शरण लेती दिखाई दे रही है, जिसकी व्यापकता पर पहले सर्वोच्च संवैधानिक पदों से सवाल उठाए गए थे और जिसे न्यायिक अतिक्रमण के संदर्भ में कभी “परमाणु मिसाइल” तक कहा गया था।
यहीं लोकतंत्र का मूल विरोधाभास खड़ा होता है—जिस शक्ति को कल सीमित करने की बात की जा रही थी, आज उसी शक्ति से राहत की अपेक्षा क्यों की जा रही है?
जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों के बाद प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध विभिन्न आपराधिक कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थीं। इन एफआईआर को वापस लेने की मांग लगातार उठ रही थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन्हीं एफआईआर को वापस नहीं लिए जाने के विरोध में 5 सितंबर को दिल्ली में एक और मार्च प्रस्तावित था।
इसी पृष्ठभूमि में यह मामला अचानक एक संवैधानिक मोड़ पर पहुंच गया। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि वह अपने असाधारण संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर विरोध प्रदर्शनों से संबंधित एफआईआर के मामलों में हस्तक्षेप करे। रिपोर्टों के अनुसार, इस अपील में 13 एफआईआर का उल्लेख किया गया था, जिनमें से कुछ में गंभीर आपराधिक आरोप भी शामिल थे।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए संबंधित मामलों में राहत प्रदान की, हालांकि गंभीर हिंसक अपराधों से जुड़े आरोपों को इस राहत से अलग रखा गया और ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया जारी रहने दी गई। इस हस्तक्षेप के बाद 5 सितंबर को प्रस्तावित मार्च रद्द कर दिया गया।
लेकिन यहीं से अधिक जटिल संवैधानिक प्रश्न शुरू होता है।
यदि इन एफआईआर को न्याय, कानून और अनुपातिकता के आधार पर समाप्त किया जाना आवश्यक था, तो सरकार ने इसके लिए पहले पहल क्यों नहीं की? प्रशासन को न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता तभी क्यों महसूस हुई, जब एक और बड़े सार्वजनिक प्रदर्शन की संभावना सामने आई?
और यदि किसी आंदोलन के दोबारा उभरने की संभावना ने निर्णय को प्रभावित किया, तो क्या यह कानून के शासन के लिए एक चिंताजनक उदाहरण नहीं है?
लोकतंत्र में किसी विरोध प्रदर्शन का समय कानून को नियंत्रित नहीं कर सकता। देश को संविधान और कानून के शासन के अनुसार चलना चाहिए।
इसलिए वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी अंततः मार्च निकाल पाए या नहीं अथवा एफआईआर वापस हुईं या नहीं। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि राज्य ने कार्रवाई इसलिए की क्योंकि सड़कें फिर से सक्रिय होने वाली थीं या इसलिए कि कानून इसकी मांग कर रहा था?
यदि दूसरा दृष्टिकोण सामान्य व्यवस्था बन जाता है, तो मामला केवल कुछ एफआईआर तक सीमित नहीं रहेगा। तब प्रश्न यह होगा कि संवैधानिक शासन की दिशा अंततः कौन तय करेगा—सरकार, संवैधानिक संस्थाएं या जनदबाव?
कानून के शासन की कसौटी
लोकतांत्रिक राज्य की वास्तविक शक्ति उसके दमनकारी तंत्र में नहीं, बल्कि कानून के शासन को निष्पक्ष रूप से लागू करने की उसकी संस्थागत विश्वसनीयता में होती है। कानून का सम्मान तभी किया जा सकता है, जब उसका प्रयोग निरंतरता, निष्पक्षता और कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप हो।
राज्य से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह सामाजिक या राजनीतिक दबाव के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करे या फिर उसी दबाव के कारण उसे वापस ले ले।
वर्तमान मामला यहीं गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। यदि एफआईआर पहली दृष्टि में वैध और आवश्यक थीं, तो बाद में कार्यपालिका को सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण संवैधानिक शक्ति का सहारा लेकर उन्हें समाप्त कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
और यदि वे कानूनी रूप से उचित नहीं थीं, तो उन्हें पहले ही वापस लेने की पहल क्यों नहीं की गई?
यह संघर्ष केवल प्रशासनिक विवेक का प्रश्न नहीं है। यह राज्य की शक्ति की वैधता और कानून के शासन की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है। आपराधिक न्याय व्यवस्था को समय-समय पर बदलती राजनीतिक मांगों के अनुसार संचालित नहीं किया जा सकता। इसका आधार स्थापित कानूनी प्रक्रिया, न्यायिक परीक्षण और तथ्यों पर होना चाहिए।
इसलिए असली प्रश्न केवल यह नहीं है कि एफआईआर समाप्त हुईं या नहीं, बल्कि यह भी है कि उनके दर्ज होने और बाद में समाप्त होने की प्रक्रिया कितनी वैध और न्यायसंगत थी।
अनुच्छेद 142 और संवैधानिक विरोधाभास
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए अभूतपूर्व अधिकार प्रदान करता है। ऐसी परिस्थितियों में, जहां सामान्य कानूनी उपाय न्याय के उद्देश्य को पूरा करने में पर्याप्त नहीं होते, न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
लेकिन इस शक्ति की व्यापकता के कारण लंबे समय से यह संवैधानिक बहस जारी है कि न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिक्रमण के बीच सीमा कहां निर्धारित की जाए।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा अनुच्छेद 142 को न्यायालय के हाथ में “परमाणु मिसाइल” कहे जाने का संदर्भ इस बहस में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उनकी मुख्य चिंता यह थी कि इस असाधारण शक्ति का अत्यधिक प्रयोग विधायिका और कार्यपालिका की संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण कर सकता है।
विडंबना देखिए कि आज कार्यपालिका स्वयं अपनी एक बड़ी प्रशासनिक समस्या के समाधान के लिए सर्वोच्च न्यायालय से अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप की मांग करती दिखाई देती है।
यहीं एक और मूलभूत संवैधानिक प्रश्न पैदा होता है—क्या अनुच्छेद 142 की वैधता और स्वीकार्यता इस आधार पर तय की जानी चाहिए कि उसका प्रयोग शक्तिशाली लोगों या सत्ता के हित में है अथवा उनके लिए असुविधाजनक?
निस्संदेह, सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 142 के तहत संवैधानिक अधिकार प्राप्त है और उसका उपयोग न्यायिक विवेक तथा “पूर्ण न्याय” की अवधारणा के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन राजनीतिक सत्ता संवैधानिक संस्थाओं का मूल्यांकन केवल सुविधा के आधार पर नहीं कर सकती।
संविधान राजनीतिक सुविधा का दस्तावेज नहीं है। संवैधानिक शक्तियां विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारियां हैं। उनका सम्मान तभी संभव है, जब संवैधानिक मूल्यों को सत्ता के हितों से ऊपर रखा जाए।
विरोध का अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी
इस पूरे घटनाक्रम से एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उभरता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र में नागरिकों के आवश्यक अधिकार हैं। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों के सवाल, युवाओं की आलोचना और सरकारी निर्णयों के विरुद्ध जनविरोध स्वाभाविक हैं।
लेकिन अधिकारों के साथ संवैधानिक दायित्व भी जुड़े होते हैं। विरोध का अधिकार कानून के शासन का विकल्प नहीं बन सकता।
उसी प्रकार राज्य का दायित्व है कि वह आपराधिक कानून का प्रयोग न्याय, समानता और कानूनी औचित्य के आधार पर करे, न कि प्रदर्शनकारियों की संख्या, राजनीतिक दबाव या संभावित जनप्रतिक्रिया के अनुमान के आधार पर।
यदि कोई एफआईआर अवैध, दुर्भावनापूर्ण या शुरू से ही कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है, तो उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उसे समाप्त किया जा सकता है। किसी निर्दोष व्यक्ति को अनुचित आपराधिक मुकदमे से बचाना न्याय की अवधारणा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लेकिन यदि आपराधिक मामले केवल इस कारण वापस लिए जाएं कि वे व्यापक जनविरोध पैदा कर सकते हैं, तो कानून के शासन की निष्पक्षता और राज्य की संस्थागत विश्वसनीयता दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
लोकतंत्र का अर्थ है कि सरकार जनता से संवाद करे और सुशासन का अर्थ है कि गलत निर्णयों को सुधारा जाए। लेकिन यदि कानून के प्रयोग की दिशा जनदबाव से तय होने लगे, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए अत्यंत अस्थिर करने वाली मिसाल बन सकती है।
क्योंकि यदि आज दबाव के माध्यम से कानून की दिशा बदली जा सकती है, तो कल हर संगठन दबाव को एक संवैधानिक अधिकार की तरह देखने लगेगा।
लोकतंत्र में सरकार निश्चित रूप से जनता के प्रति जवाबदेह है, लेकिन जनता और सरकार—दोनों कानून के प्रति समान रूप से जवाबदेह हैं।
दबाव की राजनीति और कानून
आज मांग किसी एफआईआर को वापस लेने की हो सकती है, कल जांच रोकने की मांग उठ सकती है, उसके अगले दिन गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग हो सकती है और अंततः किसी न्यायिक निर्णय में परिवर्तन का दबाव भी बनाया जा सकता है।
मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन मांगों के दबाव से कानून के शासन को संचालित करना लोकतंत्र नहीं है।
दबाव की राजनीति की कोई निश्चित संवैधानिक सीमा नहीं होती। जैसे ही राज्य कानून के प्रयोग को जनदबाव से जोड़ना शुरू करता है, कानूनी व्यवस्था की निष्पक्षता और संस्थागत स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में जन आंदोलनों और सरकारी सत्ता के बीच तीखे संघर्ष अनेक बार देखे गए हैं। 1974 का गुजरात नव निर्माण आंदोलन इस बात का उल्लेखनीय उदाहरण है कि किस प्रकार छात्र असंतोष एक व्यापक जन आंदोलन में बदल सकता है। इसके बाद जयप्रकाश नारायण के बिहार आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला।
उस दौर में राज्य ने कठोर कानूनी प्रतिबंध लगाने, गिरफ्तारियां करने और आपराधिक मुकदमे चलाने में कोई संकोच नहीं किया।
निस्संदेह, 1974 और 2026 की राजनीतिक, संवैधानिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों की यांत्रिक तुलना करना उचित नहीं होगा। लेकिन राज्य के निर्णयों का आधार क्या होना चाहिए—यह मूल प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
कानून के शासन के अनुसार आपराधिक कार्यवाही, उसकी वापसी अथवा न्यायालय का हस्तक्षेप कानून, तथ्यों और स्थापित प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए, न कि संभावित जनदबाव के राजनीतिक अनुमान पर।
लोकतंत्र में जन आंदोलन सरकारों को जवाबदेह बनाते हैं, लेकिन कानून के प्रशासन को नियंत्रित नहीं कर सकते। इसकी अंतिम दिशा संविधान को तय करनी चाहिए।
लोकतंत्र के सामने वास्तविक चुनौती
किसी सरकार का राजनीतिक रूप से कमजोर होना एक अस्थायी राजनीतिक घटना हो सकती है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर जनता के विश्वास का कम होना कहीं अधिक गंभीर संस्थागत संकट का संकेत है।
जब नागरिक यह मानने लगते हैं कि न्याय उचित कानूनी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि सड़कों पर दबाव बनाकर प्राप्त किया जा सकता है, तब स्थिति चिंताजनक हो जाती है।
उसी तरह, जब राज्य यह महसूस करने लगे कि किसी कानूनी कार्रवाई का समाधान न्यायिक समीक्षा के बजाय राजनीतिक परिस्थितियों के दबाव के आधार पर तलाशना चाहिए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
संविधान ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का संतुलन इसलिए स्थापित किया है ताकि प्रत्येक संस्था अपनी संवैधानिक सीमाओं और जिम्मेदारियों के भीतर कार्य करे।
न्यायपालिका का कार्य कानून की व्याख्या करना और न्याय सुनिश्चित करना है। सरकार का कार्य कानून के अनुसार शासन करना है और नागरिकों को शांतिपूर्ण एवं कानूनी तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता है।
जब राजनीतिक सुविधा, जनदबाव और कानूनी व्यवस्था की सीमाएं आपस में घुलने-मिलने लगती हैं, तब संस्थाओं की वैधता और अधिकार दोनों पर गंभीर प्रश्न उठने लगते हैं।
लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि सड़क राज्य के सामने झुक जाए या राज्य सड़क के सामने झुक जाए। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ यह है कि अंततः दोनों को संविधान के सामने झुकना चाहिए।
इस मुद्दे पर छात्रों का समर्थन या विरोध करना आवश्यक नहीं है। न ही यह लेख उनके विरुद्ध दर्ज एफआईआर की कानूनी वैधता के बारे में कोई अंतिम निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।
यदि किसी छात्र के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई दुर्भावना से प्रेरित थी, अनुपातहीन थी अथवा स्थापित कानूनी मानदंडों का उल्लंघन करती थी, तो न्याय और कानून के शासन के हित में उसे समाप्त किया जाना चाहिए। केवल लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के कारण किसी नागरिक का भविष्य बर्बाद नहीं किया जा सकता।
लेकिन संवैधानिक लोकतंत्र में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—सरकार को यह कानूनी समझ आखिर कब आई?
क्या एफआईआर दर्ज किए जाने के समय? या फिर तब, जब 5 सितंबर को एक और बड़े प्रदर्शन की संभावना ने नया राजनीतिक दबाव पैदा कर दिया?
यदि दूसरा कारण अधिक सही है, तो समस्या केवल एफआईआर वापस लेने तक सीमित नहीं रह जाती। तब मूल प्रश्न यह बन जाता है कि राज्य ने अपना निर्णय तथ्यों और कानून के आधार पर लिया या जनदबाव के कारण।
निष्कर्ष: अंततः कौन झुका?
नागरिकों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन यदि कानूनी प्रक्रियाएं राजनीतिक दबाव के जवाब में बदलती हुई दिखाई दें, तो यह संस्थागत कमजोरी का संकेत हो सकता है।
उसी प्रकार, अनुच्छेद 142, जिसका उद्देश्य कभी राजनीतिक विवादों का समाधान करना नहीं था, सर्वोच्च न्यायालय को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए असाधारण संवैधानिक शक्ति प्रदान करता है।
इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि इस घटनाक्रम में सरकार जीती, छात्र जीते या न्यायालय जीता।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारी संस्थाएं अपने संवैधानिक दायित्वों और सीमाओं के भीतर निर्णय ले रही हैं?
क्योंकि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए केवल चुनाव पर्याप्त नहीं हैं। लोकतंत्र न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कानून के शासन और संस्थागत वैधता पर भी समान रूप से निर्भर करता है।
(लेखक संजय पांडेय राजनीतिक विश्लेषक के साथ विधिक सलाहकार हैं)



