झारखंड में ऑटिज्म से जूझ रहे बच्चों की बढ़ती चुनौती, सरकारी देखभाल और आर्थिक सहायता पर उठ रहे सवाल
₹1,000 की मासिक सहायता के मुकाबले इलाज, थेरेपी और विशेष शिक्षा का खर्च कई परिवारों पर भारी

संजय पांडेय | वरिष्ट पत्रकार : झारखंड में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों की चुनौतियां लगातार गंभीर सार्वजनिक मुद्दा बनती जा रही हैं। ऑटिज्म केवल बच्चे की संचार क्षमता या व्यवहार से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे परिवार की सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दिनचर्या पर पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें सामाजिक संपर्क और संचार में अलग-अलग स्तर की कठिनाइयां हो सकती हैं। हर ऑटिस्टिक बच्चे की जरूरत और क्षमता अलग होती है और कुछ लोगों को जीवनभर सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है।
झारखंड में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य की मौजूदा सहायता व्यवस्था ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप है? वर्तमान सरकारी योजना के तहत पात्र दिव्यांग लाभार्थियों को ₹1,000 प्रतिमाह की सहायता दी जाती है। योजना पांच वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्र दिव्यांग व्यक्तियों के लिए है और इसका संचालन महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग द्वारा किया जाता है।
केवल ₹1,000 से कैसे चलेगा बच्चे का इलाज?
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए कई परिवारों को नियमित स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, बिहेवियरल इंटरवेंशन, विशेष शिक्षा, विकासात्मक मूल्यांकन और अन्य विशेषज्ञ सेवाओं की जरूरत पड़ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार समय पर प्रमाण-आधारित मनोसामाजिक हस्तक्षेप बच्चों के संचार और सामाजिक कौशल को बेहतर बनाने तथा उनके और उनके देखभालकर्ताओं के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
ऐसे में ₹1,000 की मासिक सहायता राशि को लेकर अभिभावकों के बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह राशि वास्तविक खर्चों के अनुपात में पर्याप्त है। राज्य सरकार को इस सहायता राशि को बढ़ाकर कम से कम ₹5,000 प्रतिमाह करने पर विचार करना चाहिए, ताकि गंभीर आर्थिक दबाव झेल रहे परिवारों को कुछ राहत मिल सके। हालांकि यह एक नीतिगत मांग है, वर्तमान सरकारी सहायता की आधिकारिक राशि ₹1,000 प्रतिमाह है।
हर बच्चा बोल नहीं पाता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह समझता नहीं
ऑटिज्म के बारे में समाज में अनेक गलत धारणाएं हैं। सभी ऑटिस्टिक बच्चे बोलने में असमर्थ नहीं होते और सभी बच्चों में लक्षण एक जैसे नहीं होते। कुछ बच्चों को बोलने और सामाजिक संवाद में काफी कठिनाई हो सकती है, जबकि कुछ बच्चे बोल सकते हैं लेकिन सामाजिक संकेतों और संवाद के दूसरे पहलुओं को समझने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं।
WHO के अनुसार ऑटिज्म में क्षमताओं और जरूरतों में काफी विविधता होती है। इसलिए प्रत्येक बच्चे के लिए व्यक्तिगत मूल्यांकन और जरूरत के अनुसार सहायता जरूरी है।
माता-पिता की जिंदगी भी हो जाती है चुनौतीपूर्ण
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चे की देखभाल में परिवार को लंबे समय तक समय, धन और भावनात्मक ऊर्जा लगानी पड़ सकती है। WHO का कहना है कि ऑटिज्म से प्रभावित लोगों के परिवारों और caregivers पर देखभाल की मांग महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है तथा स्वास्थ्य सेवाओं के साथ सामाजिक और शैक्षणिक सहायता भी आवश्यक है।
ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में समस्या और गंभीर हो सकती है, जहां विशेषज्ञ चिकित्सक, स्पीच थेरेपिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट और विशेष शिक्षा सेवाओं तक पहुंच सीमित हो सकती है। ऐसे परिवारों को बच्चे के इलाज और प्रशिक्षण के लिए बार-बार बड़े शहरों का रुख करना पड़ सकता है।
झारखंड को चाहिए Autism Support System
झारखंड में केवल पेंशन या आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं होगी। जरूरत है एक समन्वित Autism Support System की, जिसमें जिला स्तर पर स्क्रीनिंग, समय पर पहचान, रेफरल, थेरेपी, विशेष शिक्षा, अभिभावक प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा को एक साथ जोड़ा जाए।
स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, सामाजिक सुरक्षा तथा शिक्षा विभागों के बीच बेहतर समन्वय से ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है। WHO भी ऑटिज्म की देखभाल में स्वास्थ्य क्षेत्र के साथ शिक्षा, रोजगार और सामाजिक देखभाल क्षेत्रों के सहयोग की आवश्यकता पर जोर देता है।
सबसे पहले बने विश्वसनीय आंकड़े
झारखंड में ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों की वास्तविक संख्या कितनी है, इसका विश्वसनीय और नियमित रूप से अपडेट होने वाला सार्वजनिक राज्यव्यापी आंकड़ा उपलब्ध होना नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। भारत में भी ऑटिज्म की जनसंख्या-आधारित epidemiological जानकारी को लेकर शोधकर्ताओं ने आंकड़ों की कमी को रेखांकित किया है। एक systematic review ने भारत में उच्च गुणवत्ता वाले population-based studies की कमी बताई थी।
इसलिए राज्य सरकार को जिला स्तर पर सर्वेक्षण और स्वास्थ्य अभिलेखों के आधार पर Autism Registry/Data System विकसित करने पर विचार करना चाहिए। इससे यह पता चल सकेगा कि किन जिलों में कितने बच्चे हैं, उनकी उम्र क्या है, कितने बच्चों को प्रमाणपत्र मिला है और कितने बच्चे थेरेपी या विशेष शिक्षा से वंचित हैं।
सरकार से पांच प्रमुख मांगें
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों के लिए राज्य सरकार के सामने पांच प्रमुख मुद्दे रखे जा सकते हैं—
मासिक आर्थिक सहायता ₹1,000 से बढ़ाकर कम से कम ₹5,000 करने पर विचार।
हर जिले में Autism Assessment and Early Intervention Centre की व्यवस्था।
सरकारी अस्पतालों में Speech Therapy और Occupational Therapy की सुविधा।
विशेष शिक्षकों और प्रशिक्षित therapists की संख्या बढ़ाना।
राज्य स्तर पर Autism Registry तैयार कर वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करना।
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चे किसी परिवार के लिए बोझ नहीं हैं। उन्हें समझने, स्वीकार करने और उनकी क्षमता के अनुरूप अवसर देने की जरूरत है। सवाल केवल ₹1,000 या ₹5,000 की सहायता का नहीं है; सवाल यह है कि क्या राज्य ऐसे बच्चों और उनके परिवारों को सम्मान, उपचार, शिक्षा, प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा का समग्र अधिकार उपलब्ध करा पा रहा है।
झारखंड में ऑटिज्म पर अब केवल जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्पष्ट नीति, बजट और जवाबदेह व्यवस्था की जरूरत है।



