कांग्रेस की नजर 200 सीटों पर, सपा के लिए सीट शेयरिंग बनी चुनौती; यूपी में नए गठबंधन की आहट
Congress eyes 200 seats, seat-sharing poses challenge for SP; new alliance looms in UP
रिपोर्टर रोशन लाल
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले विपक्षी INDIA गठबंधन के दो प्रमुख सहयोगियों कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान तेज होती दिखाई दे रही है। कांग्रेस अब यूपी में समाजवादी पार्टी की छोटी सहयोगी की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी ने सीटों में बड़ी हिस्सेदारी के साथ-साथ गठबंधन में ‘बराबर सम्मान और बराबर हिस्सेदारी’ की मांग रखी है। कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने साफ किया है कि उन्होंने 150 नहीं, बल्कि 200 विधानसभा सीटों की बात की थी।उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। ऐसे में कांग्रेस की 200 सीटों की मांग का अर्थ है कि पार्टी गठबंधन में लगभग आधी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। हालांकि, यह अभी बातचीत में रखा गया दावा है और अंतिम सीट शेयरिंग फॉर्मूला तय नहीं हुआ है। कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि सीट बंटवारे पर फैसला जल्द होना चाहिए, ताकि उम्मीदवारों को चुनावी तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
‘छोटे भाई’ की भूमिका से आगे बढ़ना चाहती है कांग्रेस
कांग्रेस की मौजूदा रणनीति सिर्फ समाजवादी पार्टी से सीटें लेने तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी यूपी में अपना संगठन मजबूत करने और उन छोटे दलों व नेताओं को साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है, जिनका अलग-अलग सामाजिक समूहों में प्रभाव है।राजेंद्र पाल गौतम लगातार ‘बराबरी’ और ‘सम्मान’ की बात कर रहे हैं। जुलाई में भी उन्होंने संकेत दिया था कि कांग्रेस और सपा के बीच सीटों का बंटवारा बराबरी और सम्मान के आधार पर होना चाहिए।कांग्रेस की यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन में थी। उस चुनाव में यूपी की 80 लोकसभा सीटों में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीती थीं। दोनों दलों ने मिलकर 43 सीटें हासिल की थीं।
सपा का फोकस ‘जीत’ और संगठन पर
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी सीटों की संख्या को लेकर कांग्रेस की मांग से सहमत दिखाई नहीं दे रही है। सपा नेताओं की दलील है कि सीटों का बंटवारा पार्टी की जमीनी ताकत और चुनावी क्षमता के आधार पर होना चाहिए।सपा सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने कांग्रेस की 150 सीटों की कथित मांग पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पार्टी को अपनी चुनावी और संगठनात्मक ताकत के अनुपात में सीटें मांगनी चाहिए। वहीं, अखिलेश यादव ने भी सीटों की संख्या के बजाय जीत को प्राथमिकता देने की बात कही है।अब सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कांग्रेस नेताओं को सलाह दी है कि सीट शेयरिंग से जुड़ी मांगों को मीडिया में रखने के बजाय सीधे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने उठाया जाए। इससे साफ है कि सपा सीट बंटवारे की बातचीत को सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच रखना चाहती है।4
बीजेपी की ‘छोटी पार्टियों’ वाली रणनीति से कांग्रेस ने क्या सीखा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी ने लंबे समय से छोटे दलों के साथ गठबंधन के जरिए अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई है। खासकर गैर-यादव OBC और अन्य पिछड़े तथा दलित समूहों के बीच प्रभाव रखने वाली पार्टियों के साथ गठबंधन बीजेपी के सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा रहा है।2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटें जीती थीं। 2022 में उसकी सीटों की संख्या घटकर 255 हुई, लेकिन पार्टी बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रही। 2022 में बीजेपी ने निषाद पार्टी और अपना दल (सोनेलाल) जैसे सहयोगियों के साथ चुनाव लड़ा था।कांग्रेस अब इसी तरह अपने गठबंधन का दायरा बढ़ाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। पार्टी की कोशिश है कि सपा के साथ तालमेल के अलावा छोटे दलों और प्रभावशाली नेताओं को भी विपक्षी गठबंधन में जोड़ा जाए।
स्वामी प्रसाद मौर्य की एंट्री से बढ़ी हलचल
इस बीच पूर्व मंत्री और OBC नेता स्वामी प्रसाद मौर्य की राहुल गांधी से मुलाकात ने यूपी की सियासत में नई चर्चा शुरू कर दी है। मौर्य ने दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात के बाद अपनी पार्टी ‘अपनी जनता पार्टी’ के INDIA गठबंधन के साथ रहने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि गठबंधन की रणनीति और सीटों की संख्या पर फैसला बाद में होगा।स्वामी प्रसाद मौर्य इससे पहले बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों के साथ रह चुके हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी छोड़कर सपा का दामन थामा था और फाजिलनगर से चुनाव लड़ा था, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा।मौर्य की राहुल गांधी से मुलाकात ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस यूपी में अपना सामाजिक और राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, छोटे दलों को कितनी सीटें मिलेंगी और कांग्रेस के हिस्से से सीटें दी जाएंगी या सपा के हिस्से से, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
असली पेंच कहां है?
कांग्रेस की 200 सीटों की मांग और सपा की जमीनी ताकत के दावे के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि अंतिम सीट शेयरिंग फॉर्मूला क्या होगा? कांग्रेस चाहती है कि उसे इतनी सीटें मिलें जहां वह अपने संगठन और उम्मीदवारों के दम पर चुनावी मुकाबले में उतर सके। वहीं सपा के सामने अपने मौजूदा विधायकों, संभावित उम्मीदवारों और संगठनात्मक हितों को संतुलित करने की चुनौती है।इसके अलावा यदि कांग्रेस अपने हिस्से की सीटों में छोटे दलों और नए सहयोगियों को भी जगह देना चाहती है, तो सीटों का गणित और जटिल हो सकता है। यानी बातचीत सिर्फ कांग्रेस बनाम सपा के बीच सीटों की संख्या तय करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि गठबंधन के संभावित विस्तार का असर भी फॉर्मूले पर पड़ सकता है।
समय पर फैसला चाहती है कांग्रेस
कांग्रेस का जोर इस बात पर है कि सीटों का बंटवारा चुनाव के काफी करीब आने से पहले तय हो। पार्टी का तर्क है कि उम्मीदवारों को अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन खड़ा करने और चुनावी तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। कांग्रेस ने 403 विधानसभा सीटों पर संगठनात्मक तैयारी शुरू करने की बात भी कही है।वहीं, सपा की ओर से संकेत है कि सीटों का बंटवारा बातचीत और आपसी सहमति से होना चाहिए। फिलहाल दोनों दलों के बीच संवाद का रास्ता खुला है, लेकिन सीटों की संख्या पर मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं।
200 सीटों की मांग क्यों अहम है?
कांग्रेस की 200 सीटों की मांग महज संख्या का मामला नहीं है। यह इस बात का संकेत भी है कि पार्टी यूपी में गठबंधन के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका को बड़ा करना चाहती है। दूसरी तरफ, सपा के लिए चुनौती यह है कि वह कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए रखते हुए अपने संगठन और मौजूदा राजनीतिक आधार से जुड़े दावों को कैसे संतुलित करती है।आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों दल ‘बराबर सम्मान’ बनाम ‘जमीनी ताकत’ के अपने तर्कों के बीच किस तरह का समझौता करते हैं। फिलहाल 200 सीटों की कांग्रेस की मांग ने 2027 के चुनाव से पहले INDIA गठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग को यूपी की राजनीति का एक अहम मुद्दा जरूर बना दिया है।



