सत्ता से कठिन सवाल पूछना और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देना ही असली चुनौती है: संजय पांडेय

The real challenge is to ask tough questions to the powers that be and prioritize issues of public interest: Sanjay Pandey

वरिष्ठ पत्रकार एवं अधिवक्ता संजय कुमार पांडेय का पत्रकारिता के विद्यार्थियों को गुरुमंत्र

​पलामू। सूचना तकनीक के इस युग में जहाँ सूचनाएँ उंगलियों पर उपलब्ध हैं, वहीं पत्रकारिता का मूल स्वरूप ‘विश्वसनीयता’ के संकट से जूझ रहा है। इस गंभीर विषय पर ऑनलाइन क्लास के मध्य से वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार पांडेय ने पत्रकारिता के विद्यार्थियों और नवागत पत्रकारों के लिए एक विस्तृत मार्गदर्शिका साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक अटूट जिम्मेदारी है। कहा कि पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी चुनौती
​संजय पांडेय ने कहा कि आज का दौर ‘सनसनीखेज’ पत्रकारिता का है, जहाँ ‘सबसे पहले’ की होड़ में ‘सबसे सटीक’ की बलि चढ़ाई जा रही है। उन्होंने कहा, “एक पत्रकार का काम केवल घटना को रिपोर्ट करना नहीं, बल्कि उसके पीछे के ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को खोजना है। आज हमें चाटुकारिता और निष्पक्षता के बीच की महीन रेखा को समझना होगा। सत्ता से कठिन सवाल पूछना और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देना ही असली चुनौती है। कहा कि कॉपी-पेस्ट’ संस्कृति एक तरह से बौद्धिक संपदा का विनाश है। ​आधुनिक पत्रकारिता में बढ़ते ‘कट-कॉपी-पेस्ट’ के चलन पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति पत्रकार की अपनी सोचने और लिखने की शक्ति को कुंद कर देती है। यदि हम अपने लेखन कार्य में किसी और के शब्दों को अपना बताकर पेश कर रहे हैं, तो आप पाठक का विश्वास तोड़ रहे हैं। लेखन में मौलिकता और शब्दों की अपनी शैली ही आपको भीड़ से अलग बनाती है। संजय पांडेय ने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे फील्ड में उतरें, लोगों से बात करें और अपनी आँखों देखी घटनाओं को अपने शब्दों में पिरोएं। साथ ही आज प्रेस कानून और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की समझ सभी को होनी ही चाहिए।

​पत्रकारिता के साथ विधि में भी समुचित जानकारी रखने वाले संजय पांडेय ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि एक पत्रकार को कानून का ज्ञान होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि अक्सर जानकारी के अभाव में पत्रकार मानहानि (Defamation), प्राइवेसी के उल्लंघन या सरकारी गोपनीयता कानून (Official Secrets Act) की चपेट में आ जाते हैं। कहा कि नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत भी पत्रकारों को अपनी रिपोर्टिंग की सीमाओं और अधिकारों को समझना चाहिए। कानून की जानकारी न केवल आपको सुरक्षित रखती है, बल्कि आपकी खबर को और अधिक वजनदार और तथ्यात्मक बनाती है। आज फेक न्यूज’ का जाल और वेरिफिकेशन का महत्वपूर्ण स्थान है।

​सोशल मीडिया पर तैरती भ्रामक जानकारियों (Fake News) को आज की सबसे बड़ी बुराई बताते हुए उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को ‘संदेहवादी’ होना चाहिए। जब तक किसी सूचना के तीन अलग-अलग स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि न हो जाए, उसे समाचार न मानें। उन्होंने ‘फैक्ट चेक’ के डिजिटल टूल्स के इस्तेमाल को आज के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की वकालत की।
उन्होंने लेखन में चौकसी बरतने की सलाह दी।
​उन्होंने बताया कि एक छोटी सी टाइपिंग मिस्टेक या गलत शब्द का चुनाव पूरी खबर का अर्थ बदल सकता है। खबर में नाम, पद, तारीख और स्थान की शुद्धता सर्वोच्च होनी चाहिए। हमेशा खबर के दोनों पक्षों को स्थान दें। एकांगी पत्रकारिता न्यायपूर्ण नहीं होती। लिखने के बाद अपनी ही कॉपी को एक संपादक की नज़र से पढ़ें और अनावश्यक विस्तार को काटें।

बताते चलें कि ​एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में संजय कुमार पांडेय जाने जाते हैं। उन्होंने आपने कानून (LL.B) की बारीकियों को समझने के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में स्नातक (BJMC) और परास्नातक (MJMC) की उपाधियां प्राप्त की हैं। साथ ही ‘द पत्रकारिता के माध्यम से शासन-प्रशासन की कमियों और विकास कार्यों पर पैनी नज़र रखते हैं।
आप भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं और झारखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त आवाज़ बन चुके हैं। संजय पांडेय मानते हैं कि पत्रकारिता का भविष्य उन युवाओं के हाथ में है जो तकनीक का सहारा तो लें, लेकिन अपनी नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं को कभी न खोएं।

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