झारखंड: खेती और भविष्य दोनों दांव पर, समय रहते ठोस निदान की दरकार ​

Jharkhand: Farming and future at stake, a timely and concrete solution is needed.

झारखंड प्रदेश बने 2 वर्ष हो गए इस बीच करोड़ों की योजनाओं पर राशि खर्च की गई बावजूद लोग पानी के लिए तरा रहे हैं। ​झारखंड, जिसे अपनी कल-कल बहती नदियों और झरनों के लिए जाना जाता था, आज कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां प्यास की चपेट में है अधिसंख्य लोग। राज्य के शहरी इलाकों से लेकर सुदूर गांवों तक भू-जल स्तर (Groundwater Level) में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की जा रही है। विशेषकर इस साल की भीषण गर्मी और अनियंत्रित कंक्रीट के विस्तार ने राज्य को एक गंभीर पारिस्थितिक संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। हम बात करते हैं राज्य के
पलामू की तो पलामू ‘डार्क जोन’ की ओर बढ़ता जा रहा है। पलामू प्रमंडल ​इस संकट का सबसे भयावह चेहरा पलामू जिले में देखने को मिल रहा है। पलामू का बड़ा हिस्सा पठारी और पथरीला होने के कारण यहाँ प्राकृतिक रूप से जल संचयन की क्षमता कम है। पलामू के अधिकतर प्रखंडों में कुएं और चापाकल गर्मी शुरू होने से पहले ही जवाब देने लगे हैं। पानी के अभाव में रबी और खरीफ दोनों फसलें प्रभावित हो रही हैं, जिससे पलामू और गढ़वा के ग्रामीण इलाकों से मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। केवल इंसान ही नहीं, बल्कि पलामू के जंगलों और गांवों में पशुओं के लिए पीने के पानी का अकाल पड़ गया है। वहीं राज्य के ​रांची और धनबाद की बात करें तो ​राजधानी रांची में पिछले एक दशक में वॉटर टेबल 50 से 80 फीट नीचे चला गया है। अपार्टमेंट संस्कृति के कारण हजारों डीप बोरिंग ने पाताल का पानी भी सोख लिया है। एक समय रांची को ‘तालाबों का शहर’ कहा जाता था, लेकिन आज अधिकांश तालाबों पर बहुमंजिला इमारतें खड़ी हैं।

​संकट का समाधान: पलामू और झारखंड के लिए क्या है निदान? ​भू-गर्भ वैज्ञानिकों और जल विशेषज्ञों ने इस संकट से उबरने के लिए निम्नलिखित ‘एक्शन प्लान’ का सुझाव दिया है जो इस प्रकार है। पलामू के लिए विशेष ‘कनहर-सोन’ पाइपलाइन: पलामू जैसे शुष्क क्षेत्रों के लिए सोन और कनहर नदियों के अधिशेष जल को पाइपलाइन के जरिए जलाशयों तक पहुँचाना एकमात्र दीर्घकालिक समाधान है।

चेक डैम और ‘डोभा’ का जाल: पठारी इलाकों में बहते हुए वर्षा जल को रोकने के लिए हर छोटे-बड़े नाले पर चेक डैम का निर्माण अनिवार्य है। नदियों से अवैध बालू उठाव बंद करना होगा, क्योंकि बालू ही पानी को सोखकर भू-जल स्तर को बनाए रखता है।अनिवार्य रेन वॉटर

हार्वेस्टिंग: शहरी क्षेत्रों में केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर हर घर में हार्वेस्टिंग सिस्टम की सख्त निगरानी होनी चाहिए। पारंपरिक जलस्रोतों का

जीर्णोद्धार: पुराने तालाबों और अहर-पाइन (पारंपरिक सिंचाई प्रणाली) की खुदाई और मरम्मत कर उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ानी होगी। विशेषज्ञों की चेतावनी पर गंभीरता के साथ राज्य सरकार को लेनी चाहिए। ​भू-गर्भ वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अगले 5 वर्षों में पलामू और रांची जैसे क्षेत्रों के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यहाँ हजारों फीट नीचे भी पानी मिलना नामुमकिन होगा। बताते चलें कि झारखंड के लिए “जल ही जीवन है” अब केवल स्लोगन नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की चुनौती है। खनिज संपदा से समृद्ध यह प्रदेश यदि पानी को नहीं बचा पाया, तो आने वाली पीढ़ियों को हम केवल बंजर जमीन और सूखी नदियाँ ही विरासत में देंगे। अभी भी वक्त है कि युद्ध स्तर पर एक ठोस एक्शन प्लान पर कार्य शुरू कर दिया जाए साथ ही पूर्व में जल संचय के नाम पर करोड़ों खर्च किए गए उन सभी का आंकलन की जाए कि किस योजना का लाभ कितने समय तक मिलनी चाहिए थी और कितनी मिली की शून्य मिली। शून्य वाली योजनाएं पर कार्य करने वाले सभी लोगों पर तत्काल एफआईआर की जानी चाहिए रही आगे योजनाओं को वास्तविक रूप से अमलीजामा पहनाई जा सके।
(लेखक संजय पांडेय वरिष्ट पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ हैं)

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