पलामू की खनिज संपदा पर आधारित संभावनाएं को तलाशने की है जरूरत
संजय पांडेय वरिष्ट पत्रकार की रिपोर्ट।
पलामू, झारखंड
झारखंड का पलामू प्रमंडल न केवल अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और बेशकीमती खनिजों का भी गढ़ है। विडंबना यह है कि “रत्नों की जननी” कहे जाने वाली इस धरती पर खनिजों की प्रचुरता के बावजूद, औद्योगिक विकास और स्थानीय रोजगार के मोर्चे पर अब तक कोई ठोस या सकारात्मक पहल नहीं दिखती। पलामू में मौजूद खनिज संपदा का अवलोकन करने के बाद निम्न पहलू उभर कर सामने आता है: ग्रेफाइट (Graphite)
पलामू को ‘ग्रेफाइट का हब’ माना जाता है। यहाँ उच्च गुणवत्ता वाला ग्रेफाइट प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इसका
प्रमुख क्षेत्र सतबरवा, बकोरिया और चैनपुर के इलाके वाला है। इसका उपयोग पेंसिल बनाने, लुब्रिकेंट्स, और परमाणु भट्टियों में मंदक के रूप में होता है। वर्तमान में यहाँ कुछ प्रोसेसिंग इकाइयां तो हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर वैल्यू एडिशन (Value Addition) की बहुत कमी है। चूना पत्थर (Limestone)
सीमेंट उद्योग के लिए रीढ़ माना जाने वाला चूना पत्थर पलामू में बड़े भंडार के रूप में मौजूद है। इसका प्रमुख क्षेत्र भवनाथपुर (गढ़वा-पलामू सीमा) और पांकी के आसपास के क्षेत्र है। इसका उपयोग मुख्य रूप से सीमेंट निर्माण और लौह-इस्पात उद्योग में फ्लक्स के रूप में उपयोग किया जाता है। यहाँ सीमेंट फैक्ट्री की अपार संभावनाएं हैं, जो स्थानीय युवाओं को रोजगार दे सकती हैं। डोलोमाइट (Dolomite)
पलामू के डालटनगंज और आसपास के क्षेत्रों में डोलोमाइट का विशाल भंडार है। इसकी विशेषता है कि यहाँ का डोलोमाइट काफी शुद्ध माना जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से इस्पात कारखानों में रिफ्रेक्ट्रीज और उर्वरक उद्योग में किया जाता है। कोयला (Coal)
पलामू प्रमंडल के अंतर्गत आने वाले राजहरा और अमानत नदी के तटीय क्षेत्रों में कोयले की खदानें हैं। राजहरा कोलियरी देश की सबसे पुरानी कोयला खदानों में से एक है। यहाँ बिजली उत्पादन इकाइयों के लिए कच्चा माल उपलब्ध है, लेकिन तकनीक और प्रबंधन के अभाव में उत्पादन क्षमता का पूर्ण दोहन सही और आधुनिक तकनीक से नहीं हो पा रहा है। मैग्नेटाइट और लौह अयस्क (Magnetite & Iron Ore)
पलामू के कुछ हिस्सों में चुंबकीय लौह अयस्क (मैग्नेटाइट) के भंडार पाए जाते हैं। यदि इन क्षेत्रों में बेहतर सर्वेक्षण और उत्खनन की नीति अपनाई जाए, तो लघु इस्पात संयंत्र (Mini Steel Plants) लगाए जा सकते हैं। लाल
इनके अलावा पलामू में निम्नलिखित खनिज भी पाए जाते हैं। पत्थर चिप्स (Stone Chips): निर्माण कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर पत्थर का खनन होता है। अग्निसह मिट्टी (Fire Clay): ईंट और भट्ठी निर्माण में उपयोगी।
खनिजों की इस लंबी सूची के बावजूद पलामू पिछड़ा क्यों है? यह सवाल आज सभी के जेहन मैं है। इसके कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
औद्योगिक नीति का अभाव: कच्चे माल को सीधे दूसरे राज्यों में भेज दिया जाता है। यदि पलामू में ही प्रोसेसिंग प्लांट लगाए जाएं, तो स्थानीय राजस्व में भारी वृद्धि होगी।
बुनियादी ढांचे की कमी: बिजली की अनियमित आपूर्ति और परिवहन (रेलवे कनेक्टिविटी) की धीमी गति बड़े निवेशकों को आकर्षित करने में बाधक है।
पलायन की समस्या: उद्योगों के अभाव में यहाँ का कुशल और अकुशल मजदूर दूसरे राज्यों (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र) जाने को मजबूर है।
प्रशासनिक उदासीनता: दशकों से फाइलों में दबे प्रस्तावों पर कोई प्रभावी अमल नहीं हुआ है।
निष्कर्ष
पलामू की धरती सोना उगलने की क्षमता रखती है, बस जरूरत है एक “सकारात्मक पहल” और इच्छाशक्ति की। खनिज आधारित उद्योगों की स्थापना से न केवल पलामू, बल्कि पूरे झारखंड की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है।



