Jharkhand News: संसाधनों की प्रचुरता के बीच औद्योगिक पिछड़ेपन का दंश झेलता पलामू
संजय पांडेय @पॉलिटिकल एडिटर द इमर्जिंग वर्ल्ड
पलायन का दंश झेलता पलामू: कब बदलेगी पत्थरों और जंगलों की तकदीर?
पलामू में आखिर अब तक एक भी उद्योग क्यों नहीं स्थापित हो सका?
झारखंड राज्य का पलामू इतिहास गवाह है कि यह क्षेत्र हमेशा से राजनीतिक उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार रहा है। प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन होने के बाद भी यहाँ एक भी बड़ा उद्योग स्थापित न होने के पीछे कई प्रमुख कारण है जिसपर राज्य सरकार को मंथन करना जरूरी है।
इच्छाशक्ति का अभाव और राजनीतिक उपेक्षा एक बड़ा कारण है। स्थानीय नेतृत्व और नीति निर्माताओं ने पलामू के औद्योगिक विकास के लिए कभी कोई ठोस विजन या ‘इच्छाशक्ति’ नहीं दिखाई। नीतियां केवल फाइलों तक सीमित रह गईं।
वहीं बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की कमी साफ दिखती है। उद्योगों के संचालन के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति, बेहतर सड़क नेटवर्क और पानी की उपलब्धता अनिवार्य है। पलामू लंबे समय से जल संकट और जर्जर बुनियादी ढांचे से जूझ रहा है। वैसे भी पलामू में
नक्सलवाद और सुरक्षा का डर भी एक कारण रहा है। अतीत के पन्नों में इस क्षेत्र में उग्रवाद (नक्सलवाद) का प्रभाव होने के कारण बड़े उद्योगपतियों ने यहाँ पूंजी निवेश करने से परहेज किया। हालांकि अब स्थितियों में बहुत सुधार है, लोग अब बिना भय के भ्रमण कर रहे हैं। नक्सली अपनी मंद में घुस कर संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन जो पूर्व में रहा भय आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। राज्य सरकार का
सिंगल विंडो सिस्टम की विफलता से भी एंकर नहीं किया जा सकता है। उद्यमियों को उद्योग शुरू करने के लिए जरूरी क्लीयरेंस (पर्यावरण, भूमि आदि) मिलने में वही सिस्टम की विफलता है कि आज भी लंबा समय लगता है। पलामू में खनिज संपदा की बहुलता से इंकार नहीं किया जा सकता है।
पलामू और आसपास का क्षेत्र खनिज संपदा के मामले में बेहद धनी है। यदि इनका सही उपयोग हो, तो यहाँ निम्नलिखित उद्योगों की शृंखला खड़ी की जा सकती है: पलामू में देश का एक बड़ा ग्रेफाइट रिजर्व मौजूद है। यहाँ ग्रेफाइट प्रोसेसिंग प्लांट, बैटरी निर्माण उद्योग, पेंसिल और लुब्रिकेंट्स बनाने वाली फैक्ट्रियां आसानी से स्थापित हो सकती हैं। क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाला चूना पत्थर पाया जाता है। यहां आसपास के इलाकों में मिनी और बड़े सीमेंट प्लांट लगाने की अपार संभावनाएं हैं।
डोलोमाइट का उपयोग लोहा और इस्पात उद्योग में होता है। स्थानीय स्तर पर क्रशर और प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाकर हजारों युवाओं को रोजगार दिया जा सकता है। पलामू की पहाड़ियों में बेहतरीन क्वालिटी का ग्रेनाइट उपलब्ध है। यहाँ आधुनिक स्टोन कटिंग और पॉलिशिंग इकाइयां स्थापित कर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ा जा सकता है। इसके अलावे वन संपदा पर आधारित रोजगार और कुटीर उद्योग पलामू संभाग का एक बड़ा हिस्सा वनों से आच्छादित है। वनोपज (Minor Forest Produce) पर आधारित रोजगार यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदल सकते हैं:
लौह (Laccifer lacca) और चूड़ी निर्माण उद्योग: पलामू में पलाश और कुसुम के पेड़ों की भरमार है, जो लाह उत्पादन के लिए सर्वोत्तम हैं। यहाँ लाह प्रोसेसिंग प्लांट और चूड़ी निर्माण के कुटीर उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं।
केन्दू पत्ता संग्रहण यहाँ के आदिवासियों की आजीविका का मुख्य साधन है। आधुनिक पैकेजिंग और दोना-पत्तल (महुआ और सखुआ पत्तों से) बनाने वाली लघु इकाइयां महिलाओं को आत्मनिर्भर बना सकती हैं। महुआ के फूलों से केवल शराब ही नहीं, बल्कि जैम, जेली, कुकीज और औषधीय उत्पाद बनाने वाले उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। यहां बांस और स्थानीय लकड़ियों से बेहतरीन फर्नीचर, कलाकृतियां और चटाई बनाने का प्रशिक्षण देकर ग्रामीण युवाओं को सीधे बाजार से जोड़ा जा सकता है। पलामू का सच यह भी है कि किसी भी क्षेत्र का विकास तब तक संभव नहीं है, जब तक वहाँ की जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न हो। संविधान हमें ‘गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार’ देता है, जिसमें रोजगार की उपलब्धता भी शामिल है। पलामू को ‘भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण कानूनों’ के सरलीकरण के साथ-साथ एक विशेष ‘औद्योगिक पैकेज’ की सख्त जरूरत है।
झारखंड का पलामू संभाग, जिसे प्राकृतिक रूप से ‘रत्नागर्भा’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन विडंबना देखिए, जिस धरती की कोख में अरबों का ग्रेफाइट, डोलोमाइट और चूना पत्थर छिपा है, उसी धरती के नौजवान हर साल रोजगार की तलाश में ईंट-भट्टों और दूसरे राज्यों के महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। स्थानीय अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पलामू में कच्चे माल की कोई कमी नहीं है। कमी है तो बस एक मजबूत ‘पॉलिसी ड्राइव’ की। यदि सरकार यहाँ ‘रूरल इंडस्ट्रियल हब’ या ‘स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज क्लस्टर’ विकसित करे, तो पलामू न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि पूरे झारखंड के राजस्व में रिकॉर्ड बढ़ोतरी करेगा। अब समय आ गया है कि पलामू के खनिज और वन संपदा का दोहन बाहर भेजने के बजाय, यहीं पर वैल्यू एडिशन (Value Addition) करके किया जाए, ताकि स्थानीय युवाओं के हाथों को काम मिल सके।



