Jharkhand News: कुदरत के अनमोल दृश्यों की मूक गवाह: पलामू की वादियां
संजय पांडेय, पॉलिटिकल एडिटर द इमर्जिंग वर्ल्ड
पलाश के लाल फूलों की ऊष्मा, सखुआ के जंगलों की मखमली छांव और चेरो राजवंश के पराक्रम की गूंज। झारखंड का पलामू प्रमंडल का क्षेत्र जहां सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति और इतिहास का एक ऐसा जीवंत कोलाज है, जिसका हर पन्ना एक नई कहानी बयां करता है। आज जब दुनिया ‘स्लो ट्रैवल’ और ‘इको-टूरिज्म’ की ओर बढ़ रही है, तब पलामू अपने भीतर पर्यटन का एक ऐसा महासागर समेटे हुए है, जिसकी लहरें अभी वैश्विक पटल पर उतनी तेजी से नहीं पहुंची हैं, जितनी पहुंचनी चाहिए थीं। हम पलामू के उन अनछुए दृश्यों की गहराई में उतरते हैं और समझते हैं कि इस प्राकृतिक हुस्न को दुनिया के सामने कैसे सलीके से परोसा जा सकता है।
इतिहास के झरोखे से देखने पर पता चलता है कि चेरो साम्राज्य के मूक प्रहरी
पलामू का पुराना और नया किला सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि 17वीं सदी के चेरो राजा मेदिनी राय के स्वर्णिम काल का जीवंत दस्तावेज है। औरंगा नदी के तट पर, घने जंगलों के बीच खड़े इन किलों की दीवारें आज भी गवाही देती हैं कि कभी यह क्षेत्र कितना समृद्ध रहा होगा। विशेषकर नए किले का नागपुरी दरवाजा, जो सफेद संगमरमर जैसी नक्काशीदार कलाकृति से सुसज्जित है, वास्तुकला प्रेमियों के लिए किसी शोध संस्थान से कम नहीं है।
यहां की शांति में जब हवाएं चलती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे इतिहास खुद फुसफुसाकर अपनी गाथा सुना रहा हो। बेतला राष्ट्रीय उद्यान की बात ही निराली है। जहां कदम-कदम पर है रोमांच
भारत के शुरुआती बाघ अभ्यारण्यों में शुमार बेतला नेशनल पार्क पलामू संभाग की धड़कन है। साल, महुआ और बांस के झुरमुटों के बीच से जब सूरज की किरणें छनकर जमीन पर आती हैं, तो वह दृश्य अलौकिक होता है। यहां सफारी के दौरान जंगली हाथियों का अपनी मस्ती में घूमना, चीतलों की चौकड़ी, कोटरा, गौर (सफेद पीठ वाले बैल) और भालू का दिखना आम बात है।
बर्ड वॉचर्स के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है, जहां हॉर्नबिल से लेकर कई प्रवासी पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है।
जलप्रपातों और बांधों का सुरीला संगीत
पलामू का पानी पत्थरों से टकराकर जो संगीत पैदा करता है, वह ध्यान (Meditation) जैसा सुकून देता है। सुगा बांध: पहाड़ों को चीरकर बहती नदी ने यहाँ पत्थरों पर ऐसी नक्काशी की है जैसे किसी मूर्तिकार ने महीनों तराशा हो। इसके गहरे पानी और आस-पास के ऊंचे पहाड़ों का कंट्रास्ट फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए मुफीद है।
तातापानी (गर्म जलकुंड): पलामू क्षेत्र का यह एक ऐसा अनमोल दृश्य है जहां जमीन से स्वतः ही औषधीय गुणों से युक्त गर्म पानी निकलता है। सर्दियों में यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है।
4. कोयल नदी का कैनवास
उत्तरी कोयल नदी के तट पर शाम गुजारना पलामू यात्रा का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। ढलती दोपहर में जब सूरज की किरणें नदी की लहरों पर तैरती हैं, तो पानी सोने की तरह चमक उठता है। नदी के बैकग्राउंड में फैली पहाड़ियों की श्रृंखला इस दृश्य को पूर्णता देती है।
झारखंड पर्यटन विभाग को सुझाव: पलामू को वैश्विक मानचित्र पर लाने का रोडमैप
प्रकृति ने पलामू को सब कुछ दिया, लेकिन नीतिगत स्तर पर पलामू हमेशा हाशिए पर रहा। यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो पलामू न केवल झारखंड बल्कि देश का एक प्रमुख टूरिज्म हब बन सकता है।”
पर्यटन विभाग को इस दिशा में निम्नलिखित व्यावहारिक कदम उठाने की आवश्यकता है जिस पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है। सर्किट टूरिज्म का विकास (Palamu Circuit)
विभाग को रांची-नेतरहाट-बेतला-पलामू किला-तातापानी को जोड़ते हुए एक “हेरिटेज एंड वाइल्डलाइफ सर्किट” तैयार करना चाहिए। सैलानियों को एक ही पैकेज में जंगल, इतिहास और जलप्रपात देखने की सुविधा मिलनी चाहिए। हेरिटेज वॉक और गाइडों का पेशेवर प्रशिक्षण
पलामू किले के आसपास व्यवस्थित ‘हेरिटेज वॉक’ की शुरुआत हो। स्थानीय युवाओं को गाइड के रूप में प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगार से जोड़ा जाए, जिससे वे आगंतुकों को चेरो राजवंश का सही और प्रामाणिक इतिहास बता सकें। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे होम-स्टे’ (Home-Stay) नीति को धरातल पर उतारना होगा। बेतला और उसके आसपास के गांवों में ग्रामीण पर्यटन (Rural Tourism) को बढ़ावा दिया जाए। पर्यटकों के लिए बड़े होटलों के बजाय स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों के घरों में ‘होम-स्टे’ की व्यवस्था हो, ताकि सैलानी पलामू की स्थानीय संस्कृति, खान-पान (जैसे धुस्का, छिलका रोटी, महुआ के व्यंजन) और लोक कलाओं से रूबरू हो सकें। बुनियादी ढांचा और सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण
सड़कें और लाइटिंग व्यवस्था जरूरी है। किलों और सुगा बांध तक पहुंचने वाले रास्तों को दुरुस्त किया जाए। किलों के आसपास शाम के समय ‘लाइट एंड साउंड शो’ की व्यवस्था हो। विदेशी और बाहरी पर्यटकों के मन में सुरक्षा का भाव पैदा करने के लिए पर्यटन स्थलों पर ‘टूरिस्ट पुलिस’ की तैनाती सुनिश्चित की जाए। डिजिटल ब्रांडिंग और ‘पलाश महोत्सव’
सोशल मीडिया के इस दौर में पलामू के अनछुए दृश्यों की रील्स, डॉक्यूमेंट्री और तस्वीरें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर आक्रामक तरीके से प्रमोट की जाएं। वसंत ऋतु में जब पूरा पलामू लाल रंग में रंग जाता है, तब विभाग को राष्ट्रीय स्तर पर ‘पलामू पलाश महोत्सव’ का आयोजन करना चाहिए, जो पर्यटकों को आकर्षित करने का एक बड़ा जरिया बन सकता है।
पलामू का प्राकृतिक हुस्न चीख-चीख कर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। अब जरूरत इस मूक सौंदर्य को प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवाज देने की है। अगर पर्यटन विभाग इन सुझावों पर संजीदगी से काम करे, तो वह दिन दूर नहीं जब पलामू की पहचान सिर्फ पिछड़ेपन से नहीं, बल्कि इसके समृद्ध और खूबसूरत पर्यटन उद्योग से होगी।



