Palamu News: पलामू में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली: आखिर गंभीर मरीज जाएं तो जाएं कहां?

मधुलता पांडेय, झारखंड प्रभारी महिला विंग आइडियल पत्रकार संगठन

स्वास्थ्य सेवाओं को किसी भी सभ्य समाज की रीढ़ माना जाता है। सरकारें बेहतर चिकित्सा व्यवस्था का दावा करती हैं, करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, नई योजनाओं का उद्घाटन होता है और स्वास्थ्य मंत्री मंचों से आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता का दावा करते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कितनी मेल खाती है, इसका जवाब पलामू की स्वास्थ्य व्यवस्था की वर्तमान स्थिति देती है। पलामू प्रमंडल का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (MMCH) आज खुद गंभीर बीमारियों से जूझता नजर आता है। करोड़ों रुपये की लागत से बने इस संस्थान से लाखों लोगों की उम्मीदें जुड़ी हैं, लेकिन जब किसी मरीज को सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है, तब अक्सर व्यवस्था जवाब दे देती है।

वेंटिलेटर हैं, लेकिन मरीजों के लिए नहीं: सबसे बड़ा सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक भी वेंटिलेटर प्रभावी रूप से काम क्यों नहीं कर रहा? यदि कोई मरीज सड़क दुर्घटना, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक या गंभीर श्वसन संबंधी बीमारी का शिकार होकर अस्पताल पहुंचता है तो उसके परिजनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसे जीवित रखने की होती है।
स्थानीय लोगों और मरीजों के परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में उपलब्ध वेंटिलेटर या तो खराब पड़े हैं या फिर उनका उपयोग नहीं हो पा रहा। ऐसे में गंभीर मरीजों को रांची, वाराणसी या निजी अस्पतालों की ओर रेफर कर दिया जाता है। सवाल उठता है कि करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गई मशीनें आखिर किस काम की हैं, यदि संकट की घड़ी में मरीज को उनका लाभ नहीं मिल पा रहा?

जरूरी दवाएं और इंजेक्शन भी नहीं मिलते: MMCH में इलाज कराने आने वाले मरीजों की एक और बड़ी परेशानी है दवाओं की अनुपलब्धता। डॉक्टर कई बार ऐसी महंगी और विशेष दवाएं या इंजेक्शन लिख देते हैं जो पूरे पलामू जिले के मेडिकल स्टोरों में उपलब्ध नहीं होते। मरीजों के परिजन घंटों और कई बार दिनों तक दवा की तलाश में भटकते रहते हैं। इस दौरान मरीज की हालत बिगड़ती जाती है। गरीब परिवारों के लिए यह स्थिति और भी भयावह होती है, क्योंकि उनके पास न तो बड़े शहर जाने की क्षमता होती है और न ही महंगी निजी चिकित्सा का खर्च उठाने की ताकत।

अधिकारियों से संपर्क करना भी मुश्किल: स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। लोगों का आरोप है कि जब किसी आपात स्थिति में विभागीय अधिकारियों को फोन किया जाता है तो अधिकांश मामलों में कॉल रिसीव नहीं होती। यदि स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के लिए है तो संकट के समय जिम्मेदार अधिकारी उपलब्ध क्यों नहीं रहते? क्या स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारी और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इस वास्तविकता से अवगत नहीं हैं, या फिर शिकायतों को अनसुना किया जा रहा है?

खेत बिक रहे, घर गिरवी पड़ रहे: पलामू के गांवों में आज भी ऐसी अनेक कहानियां मिल जाएंगी जहां गंभीर बीमारी के कारण परिवार आर्थिक रूप से तबाह हो गए। किसी ने इलाज के लिए अपनी खेती की जमीन बेच दी, किसी ने गहने गिरवी रख दिए और किसी ने साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लिया। सरकारी अस्पतालों में समुचित इलाज नहीं मिलने के कारण मरीजों को मजबूरन निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। वहां इलाज का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है। नतीजतन वर्षों की मेहनत से अर्जित संपत्ति कुछ दिनों के इलाज में समाप्त हो जाती है।

आखिर किस बात का दावा?: जब वेंटिलेटर काम नहीं कर रहे हों, जरूरी दवाएं उपलब्ध न हों, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी हो, अधिकारी फोन न उठाते हों और मरीजों को रेफर करने की मजबूरी बनी रहती हो, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि स्वास्थ्य मंत्री आखिर किस आधार पर बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था का दावा करते हैं? सरकार की उपलब्धियों का वास्तविक मूल्यांकन आंकड़ों से नहीं बल्कि अस्पतालों में इलाज कराने वाले आम मरीजों के अनुभवों से होना चाहिए।

तय होनी चाहिए जवाबदेही: पलामू जैसे पिछड़े और संसाधन-वंचित क्षेत्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा कोई सुविधा नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु का प्रश्न है। इसलिए आवश्यक है कि: MMCH के सभी वेंटिलेटरों की तत्काल तकनीकी जांच कर उन्हें चालू कराया जाए।
जीवनरक्षक दवाओं और इंजेक्शनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
आपातकालीन हेल्पलाइन और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
विशेषज्ञ डॉक्टरों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी दूर की जाए।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्वतंत्र सामाजिक एवं प्रशासनिक ऑडिट कराई जाए।
पलामू के लोग सरकार से किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे। वे केवल इतना चाहते हैं कि बीमारी की स्थिति में उन्हें समय पर इलाज मिल सके और किसी गरीब किसान को अपने बच्चे या परिजन की जान बचाने के लिए अपनी जमीन न बेचनी पड़े। स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य केवल भवन बनाना नहीं, बल्कि जीवन बचाना है। जब अस्पतालों में मशीनें खामोश हों, दवाएं गायब हों और मरीज बेबस हों, तब विकास के दावे खोखले प्रतीत होते हैं। अब समय आ गया है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग पलामू की वास्तविक स्थिति पर गंभीरता से ध्यान दें, क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता का मूल्य आम जनता अपनी जिंदगी देकर चुकाती है।

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