बारिश की बदलती तस्वीर और झारखंड के निर्माण कार्यों की परीक्षा: क्या हमारी योजनाएं मौसम के बदलते मिजाज के लिए तैयार हैं?

कहीं मूसलाधार बारिश, कहीं कमी और कहीं बूंदाबांदी—बदलते मौसम के बीच कमजोर निर्माण व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

Jharkahnd News: संजय पांडेय, रांची।

झारखंड में मानसून की तस्वीर इस वर्ष एक समान नहीं है। कहीं तेज बारिश हो रही है, कहीं बारिश अपेक्षाकृत कम है और कई इलाकों में बारिश का स्वरूप लगातार बदलता दिखाई दे रहा है। मौसम का यह असमान और अनिश्चित व्यवहार अब केवल खेती-किसानी की चिंता नहीं रह गया है, बल्कि राज्य की सड़कों, पुलों, नालियों, भवनों और दूसरी सार्वजनिक निर्माण योजनाओं की गुणवत्ता के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या झारखंड में सार्वजनिक निर्माण की योजनाएं बदलते मौसम और अचानक होने वाली तेज बारिश को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही हैं?

बारिश आते ही सामने आने लगती है निर्माण की असली तस्वीर। हर वर्ष मानसून के दौरान राज्य के अलग-अलग हिस्सों से सड़कों के क्षतिग्रस्त होने, डायवर्सन के बहने, जलजमाव और निर्माणाधीन संरचनाओं को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आती हैं। भारी बारिश के दौरान आवागमन बुरी तरह से प्रभावित हुआ। मानसूनी बारिश से क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत की जरूरत सामने आई है।

ये घटनाएं केवल बारिश की ताकत का प्रमाण नहीं हैं। ये यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि निर्माण की योजना बनाते समय जल निकासी, मिट्टी की प्रकृति, संभावित जलप्रवाह, ढलान, वर्षा की तीव्रता और संरचना की दीर्घकालिक मजबूती का पर्याप्त आकलन किया गया था या नहीं।

प्राकृतिक आपदा या निर्माण की कमजोरी?: किसी सड़क, पुल या भवन के क्षतिग्रस्त होने के बाद उसे केवल ‘प्राकृतिक आपदा’ कहकर जिम्मेदारी समाप्त कर देना आसान है।

लेकिन विशेषज्ञ दृष्टि से प्रत्येक मामले में यह देखना जरूरी है कि: क्या DPR तैयार करते समय हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन हुआ था?, क्या मिट्टी की जांच और साइट सर्वेक्षण किया गया था?, क्या जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था थी?, क्या निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप निर्माण हुआ?

क्या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच हुई?, क्या इंजीनियरों ने समय-समय पर साइट निरीक्षण किया?, क्या भुगतान वास्तविक और गुणवत्तापूर्ण कार्य के आधार पर किया गया? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब किसी निर्माण के मजबूत या कमजोर होने की असली तस्वीर सामने ला सकते हैं।

CAG की पुरानी रिपोर्टें भी उठा चुकी हैं गंभीर सवाल

झारखंड में सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी और ठेकेदारों से जुड़े मामलों पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टें पहले भी गंभीर सवाल उठा चुकी हैं। CAG की झारखंड संबंधी एक ऑडिट रिपोर्ट में सड़क निर्माण विभाग के मामलों में अनुबंध की शर्तों के पालन, वसूली और इंजीनियरिंग निगरानी से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट ने योजना चयन, DPR और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए थे।

ये रिपोर्टें भले ही अलग-अलग समय की हों, लेकिन इनसे एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर निकलता है क्या निर्माण व्यवस्था में जवाबदेही और निगरानी की कमियां आज भी पूरी तरह दूर हो पाई हैं ।ठेकेदार–इंजीनियर संबंध पर सवाल, लेकिन आरोप के लिए जांच जरूरी

झारखंड में अक्सर यह चर्चा होती है कि निर्माण कार्यों में ठेकेदार और संबंधित विभागीय अधिकारियों के बीच नजदीकी संबंधों के कारण गुणवत्ता से समझौता हो सकता है। लेकिन किसी भी मामले में ठेकेदार और इंजीनियर के बीच ‘गठजोड़’ को तथ्य के रूप में तभी कहा जा सकता है जब जांच में उसका प्रमाण मिले।

फिर भी व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए यह जरूरी है कि निर्माण कार्यों में थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट, जियो-टैगिंग, डिजिटल माप पुस्तिका, स्वतंत्र तकनीकी जांच और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रगति रिपोर्ट जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए। सरकार की ओर से सड़क निर्माण विभाग की वेबसाइट पर विभिन्न परियोजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृतियां और निर्माण संबंधी सूचनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इससे आगे बढ़कर प्रत्येक बड़े निर्माण कार्य की लागत, ठेकेदार, निर्धारित अवधि, वास्तविक प्रगति, गुणवत्ता जांच और दोष पाए जाने पर की गई कार्रवाई भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। समय पर पूरा नहीं होता निर्माण तो बढ़ती है लागत और घटता है भरोसा

सरकारी भवन, सड़क, पुल या दूसरी सार्वजनिक परियोजना समय पर पूरी नहीं होती तो नुकसान केवल सरकारी खजाने का नहीं होता।

अधूरा निर्माण: जनता की सुविधा रोकता है → लागत बढ़ाता है → मौसम से जोखिम बढ़ाता है → नई मरम्मत की जरूरत पैदा करता है → और अंततः जनता के भरोसे को कमजोर करता है। झारखंड से संबंधित पुराने निर्माण मामलों में परियोजनाओं में देरी, विभागीय स्तर पर विलंब, ठेकेदारों से संबंधित देरी और तकनीकी सर्वेक्षण की कमियों का उल्लेख किया जा चुका है। इसलिए अब समय आ गया है कि ‘समय पर काम पूरा करने’ को केवल प्रशासनिक लक्ष्य नहीं, बल्कि जवाबदेही का कानूनी और वित्तीय मानक बनाया जाए। बदलते मौसम के दौर में बदलनी होगी निर्माण की सोचआज मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। कम समय में अत्यधिक बारिश, अचानक जलप्रवाह और स्थानीय स्तर पर भारी वर्षा जैसी परिस्थितियां पारंपरिक निर्माण व्यवस्था के लिए चुनौती बन रही हैं।

ऐसे में झारखंड में अब यह सवाल केवल नहीं होना चाहिए कि ‘सड़क कितने किलोमीटर बनी?’

सवाल यह भी होना चाहिये। पहली बड़ी बारिश के बाद सड़क कितनी बची?’

इसी तरह भवन के मामले में केवल यह नहीं देखा जाना चाहिए कि ‘भवन बन गया या नहीं’, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उसकी नींव, जल निकासी, छत, दीवार और आसपास की संरचना अत्यधिक बारिश की स्थिति में कितनी सुरक्षित है। जवाबदेही तय करने का समय: सरकार यदि वास्तव में निर्माण कार्यों में गुणवत्ता सुनिश्चित करना चाहती है तो प्रत्येक मानसून के बाद प्रमुख सरकारी परियोजनाओं का पोस्ट-मॉनसून स्ट्रक्चरल और क्वालिटी ऑडिट कराया जा सकता है,जिस सड़क, पुल, नाली, भवन या अन्य संरचना में निर्धारित मानकों के बावजूद नुकसान पाया जाए, वहां केवल मरम्मत कराने के बजाय यह भी तय होना चाहिए कि:

गलती डिजाइन में थी, निर्माण एजेंसी की थी, गुणवत्ता नियंत्रण में थी या निगरानी व्यवस्था में?

यदि ठेकेदार दोषी है तो अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई हो। यदि विभागीय स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। और यदि प्राकृतिक परिस्थिति वास्तव में असाधारण थी, तो तकनीकी जांच के आधार पर उसका स्पष्ट कारण सार्वजनिक किया जाए।झारखंड प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है, लेकिन विकास का अर्थ केवल नई योजनाओं की घोषणा और निर्माण कार्यों का उद्घाटन नहीं हो सकता।मजबूत विकास वही है जो पहली तेज बारिश, पहली बाढ़ और पहली बड़ी प्राकृतिक चुनौती के बाद भी खड़ा रहे।मौसम बदल रहा है। बारिश का स्वरूप बदल रहा है। ऐसे में निर्माण की तकनीक, निगरानी और जवाबदेही भी बदलनी होगी।

वरना हर मानसून के बाद एक ही सवाल दोहराया जाएगा—

करोड़ों रुपये से बनी सड़क, पुल और भवन आखिर बारिश में क्यों टिक नहीं पाए? और इसका जवाब केवल मौसम को देकर सरकारी निर्माण व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी से हमेशा नहीं बच सकती।

 

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