केतार मंदिर का इतिहास काफी रोचक है
पलामू प्रमंडल अंतगर्त गढ़वा जिले का विख्यात केतार मंदिर का इतिहास बहुत रोचक है. इस मंदिर की महत्ता के बारे में कहा जाता है तीन सौ वर्षो पहले सोनपुर स्टेट के राजा तथा जीवनाथ बैगा को एक ही रात स्वपन हुआ तथा पुरे ईलाको में घडघराहटन की अवाज सुनाई पड़ी । सोनपुर के राजा के द्वारा सुबह में अपने सैनिको तथा जीवनाथ बैगा के साथ बाजे -गाजे के साथ उस महिसघाट पहुॅचे । वहाॅ सैनिको द्वारा मिट्टी की खोदाई कराने पर 2 मुर्ति मिली । पहली मुर्ति कोई उठा नही सका दुसरी काली वाली मुर्ति को राजा के 32 आदमीयों के समुह तथा हाथी के सहयोग से उस मुर्ति को डोली में उठाया गया । 7 जहगो पर रखते हुए तेदुआं पेड के हाथी जैसे ही पहुचा वहाॅ हाथी बैट गया । और माॅ की मूर्ति भी वही रह गया । लाख राजा के प्रयास करने के बाद भी मुर्ति टस -से मस नही हुआ । अनतः राजा के द्वारा बैगा एवं पण्डित के द्वारा पुजा करना शुरू कर दिया गया । सर्वप्रथम भवनाथपुर के रामस्वरूप सिहं उर्फ जोखु सिंह केा कोई संतान नही था उन्हाने माॅ से मन्नत मागी उन्को माॅ के द्वारा एक पुत्र की प्राप्ति हुई । बाकारो स्टील माईंस के इजींनयर के रूप में पदस्थापित टाउनशीप भवनाथपुर के मधुसुदन पोदार मधुप तथा दयाशंकर मिश्रा ने माॅ का दर्शन करने पहुचे तथा उस मंदिर के भक्तिमय होकर स्थानीय गा्रमीणो के सहयोग से दुर -दराज तक चंदा किया । मंदिर की पहली बैठक 11 मार्च 1987 दिन बुधवार को रामचरित्र पाठक उर्फ दरोगा जी की अध्यक्षता मेें बैठक हुई इसमें मदिर जिर्णोद्वार कमिटि का गठन किया गया । जिसमें महासंचालक मधुसुदन पोदार मधुप,अध्यक्ष रामचरित्र पाठक उपाध्यक्ष डा. ओकारनाथ शर्मा तथा महामंत्री मुखिया स्व. बैजनाथ प्रसाद एवं सुचना मंत्री पत्रकार सीताराम पाठक को बनाया गया । 2 मई 1997 को मंदिर का जिर्णाद्वार कार्य शुरू किया गया । 19 फरवरी 1988 को मंदिर का मुख्य द्वार तथा सांकेतिक गोमज की ढलाई की गई । यही से नामाकरण माॅ चर्तुभुजी काली मंदिर का नाम दिया गया । 6 मई 1990 दिन रविवार को रामचरित्र पाठक द्वारा मंदिर के सामने शिवशंकर की प्रतिमा बनारस से लाकर आर्चाय विजयानन्द तथ देवराज गौतम के मंत्रोउच्चारण से सम्पंन हुआ । वर्ष 2003 में पूर्व मंत्री रामचन्द्र केशरी ने दुर्गा जी प्रतिमा दान में दिया । इसी प्रकार पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही 2005-6 में पर्यटनविभाग से यात्रि निवास तथा अभी ने माॅ की चांदी के छतरी तथा मुख्य गेट बनवाने का जिम्मा लिया है इसी प्रकार मंदिर दिन प्रतिदिनआगे बढ़ता जा रहा है. इस मंदिर की तीन निम्न इस प्रकार विशेषता है:
मंदिर का लोकप्रियता : इस मंदिर चारो तरफ पहाडों से घिरा है पहाड़ो के निकट होने से लोगो को खास बना देता है । यह मंदिर तीन राज्य बिहार, उतरप्रदेश, झारखण्ड के सीमावर्ती है जो भक्त लोगो को आने के लिए बाई सडक की व्यवस्था है जो आने पर मजबुर कर देता है ।
मंदिर की आस्था : मंदिर पूजारियों के कथनानुसार इस माॅ काली मंदिर में जो भक्त सभी जगहो से थक-हारकर पूत्रप्राप्ति की आस्था लेकर आता है उसे माॅ उसकी इच्छा जरूर पुरी करती है ।
नवरात्र में खास आयोजन : इस मंदिर में नवरात्र पूजा के अवसर पर माॅ दूर्गे की पाठ, भक्ती जागरण, भागवत कथा का आयोजन किया जाता है । चढावा में माॅ के मंदिर में लाईची दाना, नारियल सिंदुर तथा चैत रामनवमी के मेले मे खंसी की बली दी जाती है । मंदिर की संचालन संचालन तथा आय- व्यय का काम हर वर्ष मंदिर निमार्ण कमिटि द्वारा किया जाता है तथा अभी सरकारी पदाधिकारी, जनप्रतिनिधी तथा आम ग्रामीणों को चार कमिटि में रखकर व्यवस्था का संचालन किया जा रहा है। दर्शन करने के लिए नगर उटाॅरी से 26 किमी दुरी पर है जो सड़क मार्ग से मिनट- मिनट मे यातायात की सुविधा उपलब्ध है जो कभी भी दर्शन करके आ जा सकते है । वही उतरप्रदेश भी बाई सडक तथा बिहार से बाई सडक की व्यवस्था उपलब्ध है ।



