कुंड से बोतल तक पहुंचा पानी, अब जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाना होगा : कौशिक मलिक

कैफ़ी आज़मी को समर्पित सांस्कृतिक पाठशाला में जल संकट पर गहन संवाद

विशेष संवाददाता।
मेदिनीनगर : इप्टा द्वारा संचालित सांस्कृतिक पाठशाला की 95वीं कड़ी जनवादी शायर कैफ़ी आज़मी को समर्पित रही। “जल संकट और समाधान की रणनीति” विषय पर आयोजित संवाद में वक्ताओं ने जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में जल संकट के बढ़ते खतरे, उसके कारणों और समाधान पर गंभीर चर्चा हुई।
संवाद को संबोधित करते हुए सेसा के चेयरपर्सन कौशिक मलिक ने कहा कि दुनिया में 70-75 प्रतिशत जल होने के बावजूद मानव और जीव-जगत के उपयोग के लिए मात्र एक प्रतिशत जल ही उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि पहले समाज में कुंड, कुएं, तालाब और पोखरों की परंपरा थी, जो धीरे-धीरे समाप्त होती गई। इसके बाद बोरिंग संस्कृति आई और अब पानी बोतलों में सिमट गया है। “पहले ऊपर का पानी खत्म हुआ, अब नीचे का पानी भी समाप्त होने की कगार पर है। गहराई से निकाला जाने वाला पानी फ्लोराइड और अन्य रासायनिक तत्वों के कारण पीने योग्य नहीं रहेगा,” उन्होंने चेतावनी दी।
कौशिक मलिक ने सुझाव दिया कि हर व्यक्ति अपने घरों में बगीचों के लिए जगह छोड़े, पौधे लगाए और वर्षा जल संचयन की व्यवस्था करे। सरकारी भवनों में भी जल संरक्षण की अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पानी का अनावश्यक बहाव रोका जा सके और वाटर टेबल रिचार्ज हो सके। उन्होंने शहर के तालाबों और कुओं की मैपिंग कर उनके संरक्षण एवं सफाई की योजना बनाने की आवश्यकता बताई।
संवाद की शुरुआत प्रेम प्रकाश ने कैफ़ी आज़मी की कविता “दूसरा बनवास” के पाठ से की। विषय प्रवेश कराते हुए उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आम लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा, तो उद्योगों और बड़े उपभोक्ताओं के लिए पानी कहां से आ रहा है। उन्होंने इसे जनमुद्दा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
इप्टा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य उपेंद्र कुमार मिश्रा ने कहा कि जल संकट से लड़ना आसान है, पानी के संकट लड़ना आसान नहीं क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र में पानी ही नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि इस संकट के समाधान के लिए व्यापक संघर्ष की जरूरत होगी।
घनश्याम कुमार ने नदियों में रबर डैम बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि जल संकट की स्थिति इतनी गंभीर है कि छात्रावासों में रहने वाले छात्र गर्मी के दिनों में पानी की कमी के कारण घर लौटने को मजबूर हो जाते हैं।
आजसू के प्रांतीय नेता विकेश शुक्ला ने कहा कि जल संकट के समाधान के लिए आंदोलन खड़ा करना होगा और प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर ठोस पहल की मांग करनी होगी। उन्होंने बहते पानी को रोकने पर विशेष बल दिया।
शिक्षक गोविंद प्रसाद ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि और पारंपरिक सोच के कारण नदियां एवं तालाब प्रदूषित हो रहे हैं। मृत पशुओं को जलस्रोतों में फेंकना भी जल संकट का बड़ा कारण है। उन्होंने कहा कि आधुनिक निर्माण संरचनाओं के कारण वर्षा का पानी जमीन में अवशोषित नहीं हो पाता।
शिक्षक आयुष कुमार ने कहा कि जल संरक्षण के साथ-साथ लोगों को अपनी आदतों में भी सुधार लाना होगा। वहीं कुलदीप कुमार ने नगर निगम के सभी 35 वार्डों में जाकर जल संकट पर जनजागरूकता अभियान चलाने और आंदोलन की तैयारी करने का सुझाव दिया। इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश सिंह ने कहा कि संवाद को केवल चर्चा तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि कार्यक्रम में हुई चर्चाओं के आधार पर एक मांग पत्र तैयार कर जिला प्रशासन को सौंपा जाए। प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया गया। कार्यक्रम की संयुक्त अध्यक्षता ज्ञान विज्ञान समिति के प्रांतीय अध्यक्ष शिव शंकर प्रसाद एवं सेसा के चेयरपर्सन कौशिक मलिक ने की। संचालन करते हुए शिव शंकर प्रसाद ने कहा कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के ईमानदार प्रयास से जल संकट को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। उन्होंने तालाबों और नदियों पर हो रहे अतिक्रमण को रोकने की आवश्यकता बताई।इस मौके पर अजीत कुमार, प्रेम कुमार सहित अन्य लोग उपस्थित थे।

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