तानाशाह का भविष्य : विष्णु नागर
चिट्ठी मोदी जी के नाम, ताली-थाली बजवाना भूल न जाना! : राजेंद्र शर्मा

राजनैतिक व्यंग्य-समागम
वैसे तो मेरे वे दोस्त बहुत ज्ञानी हैं, मगर उन्हें न जाने क्या सूझी कि उन्होंने मुझसे पूछा कि हमारा तानाशाह जो कुछ कर रहा है, वह सब आज नहीं, कल नहीं, परसों नहीं, बरसों नहीं, मगर कभी तो सामने आएगा? पचास साल बाद तो सामने आएगा?
मैंने कहा, आएगा और जल्दी ही सामने आएगा। इसने ऐसी स्थिति में अपने को डाल दिया है कि इसका पतन अब कोई ताकत अधिक समय तक रोक नहीं सकती। फिर भी सुविधा के लिए मान लें कि दस बरस बाद यह जाएगा। तब सब कुछ सामने आएगा। इसका ही नहीं, इसके साथ के सब लोगों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा। एक-एक चीज़ आज दर्ज की जा रही है। इसे वे भी दर्ज कर रहे हैं, जो आज इसके अपने हैं।उनके मन में डर है कि कल पांसा पलट गया, तो उनका गला भी नापा जा सकता है और कब, कौन-सी चिनगारी आग बन जाएगी, यह कोई नहीं जानता!
ऐसा नहीं कि तानाशाह खुद यह बात नहीं जानता। जानता है, मगर फिलहाल उसकी चिंता सत्ता पर अपनी पकड़ को और मजबूत बनाना है, अपने मजबूत विरोधियों को कुचलना है। उन्हें विभिन्न माध्यमों से इतना बदनाम कर देना है कि वे जनता के सामने जाने से भी डरें और नहीं डरें, तो इसका नतीजा भुगतें।
हर तानाशाह यह मानता है कि वह इतना कुशल है कि जीते-जी उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। बाद मरने के उसके बारे में क्या-क्या सामने आता है, क्या-क्या राज खुलते हैं, इसकी उसे चिंता नहीं, क्योंकि वह तो अपनी पारी सफलता से खेल चुका है। उसका सारा खेल, उसकी सारी राजनीति आज के लिए है। उसे आज उसकी छवि बनाना है। वह जानता है कि उसके जीते-जी भी उसकी बनाई छवि टूटती रहती है, उसमें वह पैबंद लगाता रहता है। हमारा तानाशाह जान चुका है कि ईमानदारी से वह चुनाव नहीं जीत सकता, इसलिए चुनाव आयोग को उसने सरकार के एक सरकारी विभाग में बदल दिया है। इस तरह वह मानता है कि वह टिका रहेगा। फिर राज्य की शक्ति उसके पास है, उसका इस्तेमाल कर वह विपरीत जनमत को भी सकारात्मक वोट में बदल सकता है। फिलहाल हमारे तानाशाह का जोर पूरे भारत की राजनीति पर कब्जा करना है और अपने को निर्विकल्प बनाना है।
तानाशाह जानते हैं कि उनका भविष्य क्या है। लोग उन्हें कल किस रूप में याद करेंगे। उन्हें मालूम है कि उनकी पूजा नहीं होगी। उनकी तुलना महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से नहीं होगी। उन्हें उसी तरह देखा जाएगा, जिस तरह देखा जाना किसी तानाशाह को पसंद नहीं आता। उनकी कोशिश यह होती है कि ऐसी नौबत नहीं आए, जो हिटलर और मुसोलिनी के सामने आई थी। पर कौन जानता है, कौन तय कर सकता है कि कल उसके साथ क्या होगा।
मगर तानाशाह ने जितना नुकसान किया होता है, उसकी भरपाई आसानी से नहीं होती। युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है, तानाशाह के किये नुकसान की बहुत मुश्किल होती है। पीढ़ियां लग जाती हैं, बहुत कुछ दुरुस्त करने में!
(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
2. चिट्ठी मोदी जी के नाम, ताली-थाली बजवाना भूल न जाना! : राजेंद्र शर्मा
देवतुल्य मोदी जी को एक पक्के भक्त का दंडवत प्रणाम पहुंचे! अपने परिचय में अपने मुंह से क्या कहूं। बस इतना समझ लीजिए कि आपने जो विदेश यात्रा पर निकलते-निकलते पेट्रोल-डीजल-सीएनजी के दाम तीन-तीन रुपया बढ़ाए हैं, उस पर कोई आपके खिलाफ कुछ कहता है, तो वह कौन है, यह मैं नहीं देखता, सीधे उससे भिड़ जाता हूं। कम से कम दस रुपये बढ़ाने को राष्ट्रहित में एकदम जरूरी बताता हूं। आखिर में मुकाबले से यह कहे बिना पलटकर नहीं आता हूं कि पेट्रोल चाहे चार सौ रुपये पार चला जाए, हम गद्दी पर मोदी जी को ही बैठाएंगे — बार-बार, हर बार, लगातार!
आज जब आप वहां गोरों के देशों में जाकर भी भारतीयों को ही भारत के बारे में बता रहे हैं, भारतीयों के ही नाच-गानों के साथ भारतीयों से ही अपना स्वागत करा रहे हैं और हरेक तस्वीर में हरेक एंगल से इतने खुश नजर आ रहे हैं, आपका मजा किरकिरा करने के लिए आपको यह चिट्ठी लिखने का सच पूछिए, तो मेरा जरा-सा भी मन नहीं था। पर आप जो जाते-जाते देश को त्याग का इतना महान संदेश देकर गए हैं, आपके विरोधियों के उसकी हंसी उड़ाने पर मुंंह सिलकर भी तो नहीं बैठ सकता था।
वैसे तो आप सर्वज्ञाता हैं, फिर भी सोचा आप के संज्ञान में ला दूं कि आपके विरोधी यानी राष्ट्र विरोधी, आपके उपदेश का कैसे मजाक उड़ा रहे हैं? इसे त्याग की महत्ता का बोध नहीं, देश को संकट में, गंभीर संकट में फंसा देने का कबूलनामा बता रहे हैं। यूरोप की ठंडी हवाओं से भारत की झुलसाने वाली गर्मी में वापस आएंगे, तो आपको इन विरोधियों के मुंंह बंद कराने वाले जवाब तैयार करके आना होगा, बस यही सोचकर यह भक्त आपके रंग में भंग करने की जुर्रत कर रहा है।
आप जी ने भारतवासियों से कितनी अच्छी बात कही है। अच्छी क्या, एकदम संस्कारी बात कही है। भारतीय संस्कृति और धर्म में रची-बसी बात कही है। संस्कारों में ऊंची, पर करने में एकदम आसान बात कही है। पब्लिक से सादगी का जीवन जीने की बात कही है। विराट संकट का सामना करना है, फिर भी पब्लिक से एकदम छोटे-छोटे त्याग करने की बात कही है। जलाने का तेल, कम से कम जलाओ ; न मोटर, न मोटर साइकिल, साइकिल पर आओ-जाओ। खाने का तेल भी कम से कम खाओ। खुद तो कम खाओ ही, अपने साथ-साथ खेतों को भी कम खाद खिलाओ। विदेशी चीजें मत खरीदो। विदेशी मुद्रा बचाओ। कुछ भी बहाना हो, एक साल सोना मत खरीदो। एक साल सैर-सपाटे पर विदेश मत जाओ। बताइए इतने छोटे-छोटे त्याग। और वह भी पब्लिक को ही स्वास्थ्य लाभ समेत कई-कई लाभ पहुंचाने वाले त्याग मांगे हैं।
बाकी तो छोड़ ही दीजिए, लाल बहादुर शास्त्री की तरह, हफ्ते में एक वक्त के खाने का त्याग तक नहीं मांगा। और तो और, अस्सी करोड़ से राशन का त्याग तक नहीं मांगा। चीनी का त्याग नहीं मांगा। मसाले-वसाले का त्याग भी नहीं मांगा। रसोई में से मांगा भी तो सिर्फ खाने के तेल का त्याग और बेशक, पकाने की गैस का त्याग। विरोधियों को इत्ते से त्याग पर हुज्जत करनी चाहिए क्या?
पर हुज्जत कर रहे हैं। पहले कह रहे थे कि ये त्याग के उपदेश तो सिर्फ पब्लिक के लिए हैं, खुद ये सब त्याग के दिखाएं, तो जानें। ये तो पर उपदेश कुशल बहुतेरे का मामला है। लेकिन, आप जी का आदेश मानकर, भगवा पार्टी के नेतागण बेचारे जरा-सी सादगी अपना भी रहे हैं, तो इसमें भी विपक्षी मीन-मेख निकालने लगे। पहले मंत्रियों से लेकर संतरियों तक, हमारे नेता दर्जनों गाड़ियों के काफिले में चलते थे, तब इन्हें प्राब्लम थी कि काफिले में क्यों चलते हैं? पब्लिक को हर वक्त अपना राजा-पन क्यों दिखाते हैं? और तो और, विरोधियों ने तो आपके त्याग के उपदेश के अगले दिन से ही इसके ताने भी देने शुरू कर दिए थे कि मोदी जी पब्लिक से तो तेल बचाने की मांग कर रहे हैं और खुद उनकी पार्टी और राज के छोटे-छोटे प्यादे तक, खामखां में दर्जनों गाड़ियों में तेल फूंक रहे हैं। और अब, जब आपके भक्तगण सादगी अपना रहे हैं, कोई बस से, तो कोई मेट्रो से, कोई मोटर साइकिल से, तो कोई टुकटुक से और कोई-कोई तो साइकिल तक से इधर-उधर जाते सोशल मीडिया पर नजर आ रहे हैं, तो विरोधी उसमें भी खोट निकाल रहे हैं।
देखना तो चाहिए यह कि सत्ता कुल के लोग काफिले से दूर, अकेले बस, मेट्रो, मोटर साइकिल वगैरह से आ-जा रहे हैं, पर वह न देखकर अपनी नकारात्मकता में वे सिर्फ यह देख रहे हैं कि इनमें से हरेक की सवारी के आगे-पीछे, गाड़ियों का काफिला तो ज्यों का त्यों चल रहा है ; तेल तो पहले से भी ज्यादा जल रहा है! सत्ता कुल के त्याग से प्रेरणा लेकर खुद भी तेल बचाने के बजाए, कह रहे हैं कि यह तो सिर्फ दिखावा है। यह सादगी रीयल तेल बचाने के लिए नहीं, तेल बचाने की रील बनाने के लिए है!
शुक्र है कि आप जी के भक्त भी आप की ही तरह इन विपक्षियों की बातों की परवाह नहीं करते हैं। और क्यों करें? उनके भगवान का संदेश, काफिले तस्वीर से बाहर करने का है और सो वे बखूबी कर रहे हैं। अपनी सादगी को जम कर
वायरल भी कर रहे हैं।
रही विपक्षियों की बात, तो ये तो उनके भगवान में भी खोट निकालते हैं। आप जी ने अपने चुनावी शो, रोड शो, हवाई शो वगैरह से फुर्सत मिलते ही, विदेश यात्रा पर निकलने से पहले ही, एक अपनी, एक सुरक्षा की, एक कैमरे वालों की, कुल तीन गाड़ियों के काफिले में लुटियन की दिल्ली में घूमने का वीडियो बनाकर भी दिखा दिया, फिर भी विरोधियों को आपकी सादगी और तेल की कम खर्ची दिखाई ही नहीं दी। उल्टे आप जी की विदेश यात्रा पर ही सवाल उठाने लग गए ; एक साल विदेश यात्रा न करने का त्याग, क्या दूसरों के लिए ही है?
बहुत अच्छा है कि इन विरोधियों की न आप जी परवाह करते हैं और न आपके भक्त! ये विरोधी हैं ही इसी मांजने के। ये भारतीय संस्कृति और संस्कारों को न जानते हैं और न मानते हैं, बल्कि जान-बूझकर उनका तिरस्कार करते हैं, हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए। वर्ना जब हाथ की पांच उंगलियां भी बराबर नहीं होतीं, तो राजा और प्रजा कैसे बराबर हो जाएंगे? प्रजा वाली बंदिशें राजा पर कौन लगाता है, जी!
और हां, आप जी ने यह बहुत अच्छा किया विदेश से ही इसकी अफवाहों का खंडन कर दिया कि एक साल नहीं खरीदने की अपील करने के बाद जैसे आप जी की सरकार ने सोने पर टैक्स बढ़ाया है, वैसे ही विदेश यात्रा करने वालों पर भी टैक्स लगाने वाली है। सोने की बात दूसरी है, भारत में प्रजा भी थोड़ा-बहुत मुंह मार ही लेती है। और कुछ नहीं तो मंगलसूत्र ही सही। पर विदेश यात्रा पर टैक्स — कभी नहीं! विदेश यात्रा के बिना राष्ट्र सेठ का कारोबार दुनिया भर में फैल पाएगा क्या? घूसखोरी के मामले में अमेरिकी अदालत में हुए सौदे का भुगतान हो पाएगा? और हां! न पौने दो करोड़ डालर के जुर्माने में और न अमेरिका में 10 खरब डालर के निवेश में, विदेशी मुद्रा बचाने का सवाल कोई नहीं उठाएगा।
राजा का धर्म राजा को निभाना चाहिए और प्रजा का धर्म प्रजा को ; अपना-अपना धर्म सभी को निभाना चाहिए। और जो अपना धर्म न निभाए, उस प्रजा को राजदंड उसका धर्म सिखाए ; यही भारतीय संस्कृति का संस्कार है। सो यही विनती है कि यूरोप से अपना राजदंड जरा और पैना कराते लाएं, पब्लिक से त्याग कराने के लिए उसकी काफी जरूरत पड़ेगी। और हां! अब की बार पब्लिक से त्याग करवाएं, तो ताली-थाली बजवाने को न भूलें। माहौल बनता है।
शेष सब कुशल है
आपका एक अनन्य भक्त।
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)



