Jharkahnd News झारखंड में निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर बड़े सवाल: क्या गंभीर मरीजों की जिंदगी आर्थिक बोझ तले दबती जा रही है?
Jharkhand News: Big questions on the accountability of private hospitals in Jharkhand: Are the lives of critical patients being crushed under financial burden?
संजय पांडेय वरिष्ट पत्रकार।
रांची। स्वास्थ्य सेवा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियों में से एक मानी जाती है। जब कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी या दुर्घटना का शिकार होता है, तब उसकी पहली अपेक्षा होती है कि उसे बिना विलंब और बिना अनावश्यक आर्थिक दबाव के उपचार मिले। लेकिन झारखंड में निजी अस्पतालों को लेकर लगातार सामने आ रही शिकायतें इस उम्मीद पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों से समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि गंभीर सीरियस मरीजों को निजी अस्पताल में भर्ती कराने के तुरंत बाद परिजनों से बड़ी राशि जमा कराने का दबाव बनाया जाता है। परिजनों का कहना है कि इलाज शुरू होने के साथ ही एडवांस जमा करने, महंगी जांच कराने और लगातार बढ़ते बिलों का सामना करना पड़ता है। इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, क्योंकि हर अस्पताल और हर मामला एक जैसा नहीं होता। फिर भी यदि ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो सरकार के लिए उन्हें गंभीरता से लेना जरूरी हो जाता है। वहीं राज्य में कुछेक निजी अस्पताल सेवा की भावना के साथ भी मरीजों को चिकित्सा का लाभ देने में लगे हैं, लेकिन मरीजों के ऐसे अस्पतालों के बारे में जानकारी नहीं हों पाती।
सबसे बड़ी चिंता उन परिवारों की है जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर होती है। एक गंभीर मरीज के अस्पताल पहुंचते ही परिवार का पूरा ध्यान इलाज से हटकर पैसों की व्यवस्था करने में लग जाता है। कई मामलों में रिश्तेदारों से उधार, बैंक ऋण, जेवर गिरवी रखने या संपत्ति बेचने जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होने की बातें सामने आती हैं। यदि मरीज कई दिनों तक आईसीयू या वेंटिलेटर पर रहे तो उपचार का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसे हालात किसी भी परिवार को आर्थिक रूप से तोड़ सकते हैं। निस्संदेह, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, अत्याधुनिक मशीनों, प्रशिक्षित विशेषज्ञों और गहन चिकित्सा सेवाओं की लागत अधिक होती है। इसलिए हर ऊंचे अस्पताल बिल को स्वतः अनुचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन पारदर्शिता, उचित शुल्क, स्पष्ट बिलिंग और मरीजों के अधिकारों का संरक्षण उतना ही आवश्यक है। यदि कहीं अनावश्यक जांच, अस्पष्ट बिलिंग या नियमों के उल्लंघन की शिकायत है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और आवश्यक कार्रवाई होनी चाहिए। झारखंड ने Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act को अपनाया है, जिसका उद्देश्य निजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों का पंजीकरण, न्यूनतम मानकों का पालन और नियमन सुनिश्चित करना है। केवल कानून का अस्तित्व पर्याप्त नहीं है; उसका प्रभावी क्रियान्वयन, नियमित निरीक्षण और शिकायतों का त्वरित निस्तारण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अस्पतालों के निर्माण से मजबूत नहीं होती। उसकी वास्तविक मजबूती इस बात से तय होती है कि मरीज को समय पर, सम्मानजनक और पारदर्शी उपचार मिले। यदि जनता के बीच यह धारणा बन रही है कि गंभीर बीमारी आर्थिक संकट में बदल जाती है, तो यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था का नहीं बल्कि शासन-प्रशासन के लिए भी चिंता का विषय है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कई अवसरों पर यह कह चुके हैं कि राज्य के प्रत्येक नागरिक तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचनी चाहिए। यदि जमीनी स्तर पर लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, तो आवश्यक है कि सरकार स्वतंत्र रूप से इसकी समीक्षा करे और यह आकलन करे कि नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच कहीं कोई अंतर तो नहीं रह गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र फैक्ट-फाइंडिंग समिति गठित की जा सकती है, जिसमें स्वास्थ्य प्रशासन, चिकित्सा विशेषज्ञ, चार्टर्ड अकाउंटेंट, उपभोक्ता अधिकार विशेषज्ञ और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। यह समिति अस्पतालों की बिलिंग प्रणाली, आपातकालीन उपचार की व्यवस्था, शिकायतों के निस्तारण और नियामकीय अनुपालन की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप सकती है।
इसके साथ ही मुख्यमंत्री कार्यालय के अधीन एक डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जा सकता है, जहां मरीज या उनके परिजन ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकें, अस्पतालों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों का विश्लेषण हो और समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जाए। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों मजबूत होंगी।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि सरकार निजी अस्पतालों के साथ संवाद बनाए रखे। कई निजी अस्पताल यह तर्क देते रहे हैं कि अत्याधुनिक उपचार, विशेषज्ञ चिकित्सकों, उपकरणों और बीमा योजनाओं के भुगतान में देरी जैसी चुनौतियां भी उनके संचालन को प्रभावित करती हैं। इसलिए किसी भी सुधार प्रक्रिया में मरीजों के हितों के साथ-साथ स्वास्थ्य संस्थानों की व्यावहारिक चुनौतियों का भी संतुलित समाधान तलाशना होगा। झारखंड जैसे विकासशील राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था पर जनता का भरोसा सर्वोपरि होना चाहिए। यदि लोगों को यह विश्वास हो कि बीमारी की स्थिति में उन्हें गुणवत्तापूर्ण और न्यायसंगत उपचार मिलेगा, तभी स्वास्थ्य प्रणाली अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा कर सकेगी।
सरकार, स्वास्थ्य विभाग, नियामक संस्थाएं और निजी अस्पताल सभी की साझा जिम्मेदारी है कि मरीज को केवल उपचार ही नहीं, बल्कि सम्मान, पारदर्शिता और विश्वास भी मिले। यही किसी भी संवेदनशील और जवाबदेह स्वास्थ्य व्यवस्था की पहचान है।
(लेखक आइडियल पत्रकार संगठन के राष्ट्रीय सलाहकार सह झारखंड प्रदेश अध्यक्ष हैं)



