भारत के ईंधन टैंक में एथेनॉल: हरित क्रांति या बढ़ती दुविधा?
Ethanol in India's fuel tanks: Green revolution or growing dilemma?

संजय पांडेय @ राजनीतिक विश्लेषक
दशकों से भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर काफी हद तक निर्भर रही है। मध्य-पूर्व में होने वाले भू-राजनीतिक संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान या कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ता है। यही कारण है कि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल है। इसी दिशा में एथेनॉल मिश्रण (इथेनॉल ब्लेंडिंग) कार्यक्रम को एक बड़े समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
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इस योजना का उद्देश्य है—देश में उत्पादित एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाकर विदेशी तेल आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त आय उपलब्ध कराना, प्रदूषण घटाना और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ना। कागजों पर यह योजना सभी के लिए लाभकारी दिखाई देती है, लेकिन इसके विस्तार के साथ यह बहस भी तेज हुई है कि क्या एथेनॉल वास्तव में उतना ही टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल समाधान है, जितना इसे बताया जा रहा है।एथेनॉल एक नवीकरणीय (Renewable) अल्कोहल आधारित ईंधन है, जिसे गन्ना, मक्का, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न तथा कृषि अवशेषों से तैयार किया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर उपयोग करने से जीवाश्म ईंधन की खपत कम होती है और ऊर्जा का एक वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध होता है।
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भारत ने वर्ष 2003 में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम शुरू किया था, लेकिन शुरुआती वर्षों में इसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पिछले एक दशक में सरकार की नई नीतियों, तेल विपणन कंपनियों द्वारा सुनिश्चित खरीद, नई डिस्टिलरियों की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता तथा बेहतर मूल्य निर्धारण व्यवस्था के कारण एथेनॉल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज भारत लगभग 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर चुका है।
सरकार के लिए एथेनॉल केवल वैकल्पिक ईंधन नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में देश में उत्पादित एथेनॉल के उपयोग से विदेशी मुद्रा की बचत होती है तथा वैश्विक तेल बाजार की अनिश्चितताओं का असर कम होता है।
इस नीति से कृषि क्षेत्र को भी लाभ मिला है। पहले चीनी मिलों को अधिक उत्पादन और किसानों के बकाये भुगतान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। अब गन्ने से एथेनॉल उत्पादन के कारण उन्हें एक नया बाजार मिला है, जिससे किसानों का भुगतान बेहतर हुआ है और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी एथेनॉल को लाभकारी माना जाता है। इसके उपयोग से कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम होता है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है और इस दिशा में एथेनॉल को एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन ईंधन माना जा रहा है।
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हालांकि इसके कई गंभीर पक्ष भी हैं।
सबसे बड़ी चिंता खाद्य सुरक्षा को लेकर है। एथेनॉल उत्पादन के लिए मुख्य रूप से गन्ना और मक्का जैसी खाद्य फसलों का उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में ईंधन के लिए इन फसलों की मांग लगातार बढ़ती रही तो खाद्यान्न उपलब्धता और कीमतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
दूसरी बड़ी चुनौती जल संसाधनों की है। गन्ना भारत की सबसे अधिक पानी मांगने वाली फसलों में शामिल है। ऐसे क्षेत्रों में जहां पहले से ही भूजल संकट और सूखे की समस्या है, वहां गन्ने की खेती बढ़ाने से जल संकट और गहरा सकता है। इसलिए पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हरित ईंधन की चर्चा करते समय जल संसाधनों की स्थिरता को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
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इसी प्रकार मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से मक्का की कीमतों में वृद्धि हुई है। इससे किसानों को लाभ जरूर मिला है, लेकिन पोल्ट्री उद्योग, पशुपालन और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की लागत बढ़ गई है।
उपभोक्ताओं की भी अपनी चिंताएँ हैं। एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है, इसलिए अधिक मिश्रण वाले ईंधन में वाहनों का माइलेज कुछ कम हो सकता है। नए E20 अनुकूल वाहन इसके लिए तैयार हैं, लेकिन देश में अभी भी बड़ी संख्या में पुराने वाहन चल रहे हैं, जिनके लिए अधिक एथेनॉल मिश्रण उपयुक्त नहीं है।
इसके अलावा एथेनॉल उत्पादन की पूरी प्रक्रिया भी पर्यावरण पर प्रभाव डालती है। यदि इसके लिए अत्यधिक सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों और ऊर्जा-प्रधान प्रसंस्करण का उपयोग किया जाए तो इसका कार्बन फुटप्रिंट भी बढ़ सकता है। इसके विपरीत कृषि अवशेषों और गैर-खाद्य जैविक पदार्थों से बनने वाला दूसरी पीढ़ी (2G) का एथेनॉल अधिक टिकाऊ माना जाता है।
इसी कारण सरकार अब दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल उत्पादन पर विशेष जोर दे रही है, जिसे धान एवं गेहूं के पुआल, बांस, गन्ने के अवशेष (बैगास) तथा नगरों के जैविक कचरे से तैयार किया जाता है। इससे फसल अवशेष जलाने की समस्या भी कम हो सकती है और वायु प्रदूषण में कमी आएगी।
ब्राज़ील और अमेरिका जैसे देशों ने एथेनॉल के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, लेकिन भारत की परिस्थितियाँ अलग हैं। सीमित कृषि भूमि, बड़ी आबादी, खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी और जल संकट जैसी चुनौतियों को देखते हुए भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप संतुलित नीति अपनानी होगी।
एथेनॉल को लेकर बहस समर्थकों और विरोधियों के बीच नहीं, बल्कि इस बात पर है कि इसका विस्तार कितनी तेजी से और किन शर्तों के साथ किया जाए। समर्थकों का मानना है कि इससे ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, किसानों को लाभ होगा और प्रदूषण कम होगा। वहीं आलोचकों का कहना है कि यदि सावधानी नहीं बरती गई तो खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और कृषि स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
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भारत की ऊर्जा सुरक्षा केवल एथेनॉल पर निर्भर नहीं होगी। इलेक्ट्रिक वाहन, हरित हाइड्रोजन, संपीड़ित बायोगैस, टिकाऊ विमान ईंधन तथा बेहतर सार्वजनिक परिवहन भी समान रूप से महत्वपूर्ण होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि एथेनॉल को एक संतुलित ऊर्जा नीति का हिस्सा बनाया जाए।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एथेनॉल निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है। इसकी वास्तविक सफलता केवल मिश्रण प्रतिशत बढ़ाने से नहीं, बल्कि ऐसी नीतियों से तय होगी जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन को भी समान महत्व दें।
(लेखक संजय पांडेय आइडियल पत्रकार संगठन और भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)



