जौहर यूनिवर्सिटी के समर्थन में एक सुर में बोले मौलाना अरशद मदनी और असदुद्दीन ओवैसी, छात्र-छात्राओं के मुस्तकबिल की उठाई मजबूत आवाज

Maulana Arshad Madani and Asaduddin Owaisi spoke in unison in support of Jauhar University, raising strong voices for the future of students.

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लखनऊ/सहारनपुर। उत्तर प्रदेश में मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। एक ओर राजधानी लखनऊ में आयोजित हिंदू-मुस्लिम एकता सम्मेलन में जमीयत उलमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने विश्वविद्यालय को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि किसी कार्रवाई के तहत विश्वविद्यालय को ध्वस्त किया गया तो वहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हजारों छात्रों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। दूसरी ओर सहारनपुर पहुंचे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मुद्दे को शिक्षा, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़ा बताते हुए कहा कि किसी भी परिस्थिति में छात्रों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए।दोनों नेताओं ने अलग-अलग मंचों से दिए गए अपने वक्तव्यों में सरकार से अपील की कि यदि विश्वविद्यालय से जुड़ा कोई कानूनी या प्रशासनिक विवाद है तो उसका समाधान कानून के अनुसार किया जाए, लेकिन ऐसे कदमों से बचा जाए जिनका सीधा असर हजारों छात्रों के भविष्य पर पड़े। दोनों नेताओं के बयान ऐसे समय आए हैं जब जौहर विश्वविद्यालय से जुड़ा विवाद लगातार चर्चा में बना हुआ है।

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लखनऊ के सम्मेलन में जौहर यूनिवर्सिटी का उठा मुद्दा

राजधानी लखनऊ के अटल बिहारी वाजपेयी साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में जमीयत उलमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश की ओर से आयोजित हिंदू-मुस्लिम एकता सम्मेलन में बड़ी संख्या में विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी मौजूद थे। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सौहार्द, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना था। इसी मंच से मौलाना अरशद मदनी ने देश में बढ़ती नफरत की राजनीति, मदरसों को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम और जौहर विश्वविद्यालय के मुद्दे पर विस्तार से अपनी बात रखी।उन्होंने कहा कि यदि किसी भवन का निर्माण बिना स्वीकृत नक्शे के हुआ है या निर्माण संबंधी नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। जुर्माना लगाया जा सकता है, वैधानिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, लेकिन पूरे विश्वविद्यालय को ध्वस्त कर देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। उनका कहना था कि इस प्रकार की कार्रवाई का सबसे अधिक नुकसान उन हजारों छात्रों को होगा, जिनका भविष्य उस संस्थान से जुड़ा हुआ है।मौलाना मदनी ने कहा कि शिक्षा किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि किसी शिक्षा संस्थान पर कार्रवाई करनी भी हो तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि छात्रों की पढ़ाई बाधित न हो और उनके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ उचित नहीं

मौलाना मदनी ने अपने संबोधन में स्पष्ट शब्दों में कहा कि जौहर विश्वविद्यालय में हजारों छात्र अध्ययन कर रहे हैं। इनमें ऐसे विद्यार्थी भी हैं जो दूर-दराज के इलाकों से बेहतर शिक्षा की उम्मीद लेकर यहां पहुंचे हैं। यदि विश्वविद्यालय को नुकसान पहुंचता है तो सबसे बड़ा नुकसान इन छात्रों का होगा।उन्होंने कहा कि प्रशासनिक और कानूनी विवाद अपनी जगह हैं, लेकिन शिक्षा का अधिकार और छात्रों का भविष्य उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। सरकार को ऐसा समाधान निकालना चाहिए जिससे कानून का पालन भी हो और विद्यार्थियों की शिक्षा भी प्रभावित न हो।

मदरसों को लेकर फैल रही गलतफहमियों पर भी बोले मदनी

अपने संबोधन में मौलाना अरशद मदनी ने मदरसों को लेकर समाज में फैलाए जा रहे भ्रम पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज कई तरह की भ्रांतियां जानबूझकर फैलाई जा रही हैं। इन गलतफहमियों को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका पारदर्शिता है।उन्होंने सुझाव दिया कि देश के प्रत्येक मदरसे में वर्ष में कम से कम दो बार आसपास के लोगों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और विभिन्न समुदायों के नागरिकों को आमंत्रित किया जाए ताकि वे स्वयं आकर देखें कि वहां क्या पढ़ाया जाता है। इससे अफवाहों और भ्रम की राजनीति को समाप्त करने में मदद मिलेगी तथा समाज में विश्वास बढ़ेगा।

देश में बढ़ती नफरत पर चिंता

मौलाना मदनी ने कहा कि आज देश ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां नफरत की राजनीति समाज को बांटने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि पहले केवल मुसलमानों को निशाना बनाया जाता था, लेकिन अब इस्लाम को भी निशाना बनाया जा रहा है।उन्होंने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिन्द का उद्देश्य समाज में मोहब्बत, भाईचारा और आपसी विश्वास को मजबूत करना है। इसी सोच के साथ हिंदू-मुस्लिम एकता सम्मेलन आयोजित किया गया ताकि सभी धर्मों के लोग एक साथ बैठकर देश की एकता और अखंडता के लिए काम करें।उन्होंने यह भी कहा कि यदि देश को मजबूत बनाना है तो सभी धर्मों और समुदायों के लोगों को साथ लेकर चलना होगा। नफरत किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती।

स्वतंत्रता आंदोलन में मदरसों की भूमिका का किया उल्लेख

अपने भाषण के दौरान मौलाना मदनी ने स्वतंत्रता आंदोलन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में मदरसों और उलेमा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने हजरत शाह अब्दुल अजीज मुहद्दिस देहलवी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने सबसे पहले अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई थी। अरशद मौलाना मदनी ने कहा कि हजारों उलेमा ने आजादी की लड़ाई में अपनी जान की कुर्बानी दी थी। इसलिए मदरसों को केवल धार्मिक शिक्षा का केंद्र मानना इतिहास के साथ अन्याय होगा।

सम्मेलन में एकता और संविधान पर जोर

सम्मेलन में संकट मोचन मंदिर, वाराणसी के महंत डॉ. बिशंभर नाथ मिश्र ने कहा कि भारत की आजादी में सभी धर्मों और समुदायों का समान योगदान रहा है। इस देश की मिट्टी में सभी का खून शामिल है और किसी को अलग नहीं किया जा सकता।वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने संविधान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

सहारनपुर में ओवैसी ने भी उठाया जौहर यूनिवर्सिटी का मुद्दा

उधर, सहारनपुर पहुंचे AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भी जौहर विश्वविद्यालय को लेकर सरकार को घेरा। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह केवल एक विश्वविद्यालय का मामला नहीं बल्कि शिक्षा, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय का प्रश्न है।उन्होंने कहा कि यदि विश्वविद्यालय से संबंधित कोई विवाद है तो उसका समाधान कानून और संविधान के अनुसार होना चाहिए। किसी भी कीमत पर छात्रों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

करीब तीन हजार छात्र कर रहे हैं पढ़ाई

ओवैसी ने कहा कि जौहर विश्वविद्यालय में लगभग तीन हजार छात्र अध्ययनरत हैं। यदि किसी प्रशासनिक कार्रवाई के कारण उनकी शिक्षा बाधित होती है तो इसका दूरगामी असर उनके जीवन और करियर पर पड़ेगा।उन्होंने कहा कि सरकार का दायित्व शिक्षा के अवसर बढ़ाना है, न कि उन्हें कम करना। किसी भी शिक्षा संस्थान के भविष्य पर निर्णय लेते समय वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

शिक्षा को बताया सामाजिक विकास की कुंजी

ओवैसी ने कहा कि शिक्षा किसी भी समाज की प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि समाज के कमजोर वर्गों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचेगी तभी सामाजिक और आर्थिक विकास संभव होगा।उन्होंने मुस्लिम समुदाय की शिक्षा की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा को लेकर गंभीर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी रखी राय

ओवैसी ने कहा कि लोकतंत्र में केवल प्रतिनिधियों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि यह भी आवश्यक है कि जनप्रतिनिधि जनता के मुद्दों को निर्भीकता से उठाएं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब निर्वाचित प्रतिनिधि बिना किसी दबाव के जनता की आवाज बनें।उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं और जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे उन अधिकारों की रक्षा करें।

दोनों नेताओं के बयानों का साझा संदेश

हालांकि मौलाना अरशद मदनी और असदुद्दीन ओवैसी अलग-अलग संगठनों और मंचों से जुड़े हैं, लेकिन जौहर विश्वविद्यालय के मुद्दे पर दोनों नेताओं के बयानों में एक समान संदेश दिखाई दिया। दोनों ने कहा कि शिक्षा संस्थानों से जुड़े विवादों का समाधान कानून के तहत होना चाहिए, लेकिन छात्रों का भविष्य किसी भी हाल में प्रभावित नहीं होना चाहिए।दोनों नेताओं ने शिक्षा को समाज के विकास का आधार बताते हुए कहा कि सरकारों को शिक्षा संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में कार्य करना चाहिए। उनका मानना है कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में विद्यार्थियों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

शिक्षा और सामाजिक सौहार्द दोनों पर दिया जोर

लखनऊ और सहारनपुर में दिए गए इन दोनों बयानों ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि शिक्षा संस्थानों से जुड़े विवादों का समाधान किस प्रकार किया जाए ताकि कानून का पालन भी हो और छात्रों के हित भी सुरक्षित रहें। एक ओर मौलाना अरशद मदनी ने सामाजिक सौहार्द, मदरसों को लेकर पारदर्शिता और जौहर विश्वविद्यालय के संरक्षण की बात कही, वहीं दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी ने शिक्षा के अधिकार, संवैधानिक मूल्यों और छात्रों के भविष्य को सर्वोपरि बताया।दोनों नेताओं ने अपने-अपने तरीके से यह संदेश दिया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती शिक्षा, समान अवसर, सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा में निहित है।जौहर विश्वविद्यालय का मुद्दा केवल एक संस्थान का विवाद नहीं, बल्कि उससे जुड़े हजारों छात्रों, उनके परिवारों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है। ऐसे में आगे होने वाली किसी भी कार्रवाई पर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश की निगाहें बनी रहेंगी।

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